दस वर्ष पहले तमिलों के अतिवादी संगठन लिट्टे के खात्मे के बाद शांति और स्थिरता की ओर बढ़ रहा श्रीलंका जैसे भीषण आतंकी हमले से दो-चार हुआ वह इस छोटे से देश के साथ पूरी दुनिया के लिए बेहद खौफनाक है। तीन चर्चो और इतने ही होटलों के साथ कुछ और स्थानों को निशाना बनाकर किए गए आतंकी हमले में दो सौ से अधिक लोगों का मारा जाना यह बताता है कि ये हमले किसी बड़ी सुनियोजित साजिश का हिस्सा थे। अंतरराष्ट्रीय पर्यटकों से भरे रहने वाले होटलों के साथ जिस तरह चर्चो को खासतौर पर निशाना बनाया गया उससे यह साफ है कि आतंकी ईसाई समुदाय के लोगों को निशाना बनाना चाह रहे थे। इसीलिए चर्चो में तब विस्फोट किए गए जब वहां ईस्टर की विशेष प्रार्थना हो रही थी।

अतीत में श्रीलंका के सिंहली बौद्धों का तमिलों और मुसलमानों से तो टकराव रहा है, लेकिन अल्प संख्या वाले ईसाई समुदाय का किसी अन्य समुदाय के साथ कोई बड़ा तनाव नहीं रहा। स्पष्ट है कि तत्काल इस नतीजे पर पहुंचना मुश्किल है कि ये भयावह हमले किसने अंजाम दिए? अगर इन हमलों के पीछे किसी बाहरी आतंकी समूह का हाथ है तो भी सवाल है कि आखिर श्रीलंका को क्यों चुना गया। यह देश अंतरराष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में होने के बजाय बीते कुछ समय से अपनी ही राजनीतिक उठापटक से त्रस्त है। कहीं ऐसा तो नहीं कि इसी उठापटक का फायदा किसी नए-पुराने अतिवादी समूह ने उठा लिया? जो भी हो, यह एक हकीकत है कि जब किसी देश में शासन व्यवस्था सुदृढ़ न हो और राजनीतिक अस्थिरता का अंदेशा हो तो अराजक, अतिवादी और आतंकी ताकतों को सिर उठाने का मौका मिलता है।

पश्चिम एशिया और साथ ही आए दिन आतंकी हमलों से जूझने वाले देशों को छोड़ दें तो श्रीलंका न्यूजीलैंड के बाद सबसे भयानक हमले का शिकार बना है। न्यूजीलैंड के मुकाबले श्रीलंका में चार गुना ज्यादा लोग मारे गए हैं। घायलों की संख्या भी कहीं अधिक है। श्रीलंका को दहलाने वाले आतंकी हमले भारत के लिए भी चिंता का कारण हैं, क्योंकि एक तो ये ऐसे पड़ोसी देश में हुए जहां हमारे हित निहित हैं और दूसरे ये हमले 1993 में मुंबई में हुए सिलसिलेवार बम धमाकों की याद दिला रहे हैं। विडंबना यह है कि तब से लेकर आज तक विश्व समुदाय आतंकवाद की परिभाषा भी तय नहीं कर पाया है।

लहूलुहान श्रीलंका एक बार फिर यह बता रहा है कि आतंकवाद मानवता के लिए सबसे बड़ा खतरा बना हुआ है। केवल इतना ही पर्याप्त नहीं कि पूरी दुनिया अपने पैरों पर खड़े होने की कोशिश कर रहे श्रीलंका को दिलासा और सहारा दे, बल्कि यह भी देखे कि किस्म-किस्म के आतंकवाद से कैसे निपटा जाए? ऐसा करते समय इस पर भी ध्यान देना होगा कि आतंकवाद से लड़ाई के तौर-तरीके सफल कम हो रहे हैं, अतिवाद को हवा अधिक दे रहे हैं। यह अतिवाद शांति और सहिष्णुता की बलि लेने के साथ विभिन्न वगरें के बीच अविश्वास बढ़ा रहा है। त्रासदी यह है कि ऐसे समय भी चीन जैसे देश पाकिस्तान में पल रहे आतंकी सरगना की ढाल बनना पसंद कर रहे हैं।

Posted By: Bhupendra Singh

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