विशेष सुरक्षा समूह यानी एसपीजी को लेकर विपक्ष और खासकर कांग्रेस की ओर से जैसा हंगामा खड़ा किया गया उससे यही अधिक प्रकट हुआ कि इस विशेष दस्ते की सुरक्षा विशिष्टता का परिचायक बन गई है। आखिर विशिष्ट व्यक्तियों के लिए सुरक्षा आवश्यक है या फिर किसी खास दस्ते का सुरक्षा घेरा? जो भी सोनिया गांधी परिवार की सुरक्षा व्यवस्था बदले जाने पर आपत्ति जता रहे हैैं वे यह ध्यान रखें तो बेहतर कि प्रारंभ में एसपीजी का गठन प्रधानमंत्री की सुरक्षा के लिए ही किया गया था। बाद में पूर्व प्रधानमंत्रियों और उनके परिजनों को भी उसके दायरे में ले लिया गया। इसी के साथ विशिष्ट व्यक्तियों की सुरक्षा को प्रतिष्ठा का प्रश्न बना दिया गया। एसपीजी सुरक्षा वाले विशिष्ट से अति विशिष्ट और साथ ही कहीं अधिक बड़े कद वाले नेता समझे जाने लगे। यह सोच सुरक्षा को व्यक्ति विशेष की विशिष्टता से जोड़ने का ही नतीजा है कि बड़ा और रसूख वाला नेता वही जिसकी सुरक्षा व्यवस्था खास किस्म की हो।

गांधी परिवार की सुरक्षा बदले जाने को उनकी सुरक्षा से खिलवाड़ बताने वाले शायद यह जानने की जरूरत ही नहीं समझ रहे कि अभी तक कम से कम चार बार एसपीजी संबंधी कानून में संशोधन किए जा चुके हैैं। इनमें से कई संशोधन तब किए गए जब कांग्रेस की या उसके समर्थन वाली सरकार थी। यदि अब यह व्यवस्था की जा रही है कि मौजूदा प्रधानमंत्री के अलावा पूर्व प्रधानमंत्री को पांच साल तक एसपीजी सुरक्षा हासिल होगी तो आखिर इसमें गलत क्या है?

जब गांधी परिवार की सुरक्षा कम करने जैसा कोई कदम उठाया ही नहीं गया तो फिर हंगामा क्यों? यह हंगामा किस तरह गांधी परिवार को अति विशिष्ट बताने के इरादे से किया गया, यह इससे जाहिर होता है कि कुछ समय पहले जब पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की एसपीजी सुरक्षा वापस ली गई थी तो किसी ने सवाल नहीं उठाया। इसके पहले पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर, इंद्र कुमार गुजराल और पीवी नरसिंह राव की भी एसपीजी सुरक्षा वापस ली गई थी। ऐसा तभी किया गया जब इन सबके लिए खतरे का अंदेशा कम हो गया था। वास्तव में यही सही तरीका है।

सुरक्षा का स्तर खतरे की आशंका से तय होना चाहिए, न कि नेता विशेष के हिसाब से। गांधी परिवार की सुरक्षा हटाई नहीं गई है, बल्कि उसे बदला गया है। अब उसे सीआरपीएफ की जेड प्लस सुरक्षा उपलब्ध होगी। आखिर सुरक्षा के जैसे घेरे में गृहमंत्री हैैं उसमें गांधी परिवार क्यों नहीं रहना चाहता? किसी की सुरक्षा का स्तर बदले जाने को इस तरह पेश करना ठीक नहीं कि केंद्र सरकार उसकी सुरक्षा की परवाह नहीं कर रही।

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