पंजाब के सरकारी स्कूलों में कुछ न कुछ ऐसा होता रहता है, जिससे इसमें सुधार की उम्मीदें धूमिल हो जाती हैं। अब इन स्कूलों में वर्दी की खरीद में भी जीएसटी के रूप में लाखों का गोलमाल हो गया। इसका पता तब चला जब स्कूलों की तरफ से राज्य शिक्षा विभाग को वर्दी खरीद के बिल भेजे गए। इसमें पता चला कि बड़ी संख्या में स्कूलों ने कच्चे बिल पर वर्दी की खरीद दिखाई है। यही कारण है कि डायरेक्टर जनरल स्कूल एजुकेशन प्रशांत कुमार गोयल को यह हिदायत जारी करनी पड़ी कि भविष्य में कोई भी खरीद कच्चे बिल पर न की जाए। प्रश्न यह है कि आखिर यह परिस्थिति आई ही क्यों? वर्दी खरीद की जिम्मेदारी अध्यापकों की होती है और यदि उनकी मानें तो सरकार की तरफ से एक बच्चे की वर्दी, जुराब, टोपी की खरीद के लिए 400 रुपये जारी किए जाते हैं, जोकि बहुत कम राशि है। इस राशि पर जीएसटी लगकर यह और कम हो जाती है।

सरकार को इस बात की भी पड़ताल करवानी चाहिए और यदि वास्तव में ऐसा है तो इसे बढ़ाया जाना चाहिए। वहीं यदि कच्चे बिल के नाम पर घोटाला किया गया है तो ऐसा करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए। बात सिर्फ वर्दी खरीद की ही नहीं है, सरकार की तरफ से स्कूलों की मरम्मत आदि के लिए भी राशि जारी की जाती है, लेकिन अधिकतर स्कूल इसमें भी गोलमाल कर जाते हैं। कदाचित यही कारण है कि प्रदेश के अधिकतर सरकारी स्कूलों में बच्चों के बैठने, पीने के पानी और शौचालय जैसी मूलभूत सुविधा भी समुचित तरीके से उपलब्ध नहीं है। अंततोगत्वा इसका लाभ निजी स्कूलों को मिलता है और नुकसान अभिभावकों, खासकर बच्चों की शिक्षा के लिए सरकारी स्कूलों पर निर्भर गरीब तबके के लोगों को उठाना पड़ता है। सरकार को सख्ती बरतनी चाहिए, लापरवाही व भ्रष्टाचार रोकने के लिए ठोस कदम उठाना चाहिए, तभी हालात में सुधार की उम्मीद की जा सकती है।

[ स्थानीय संपादकीय: पंजाब ]

Posted By: Bhupendra Singh

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