चार वर्ष पूर्व महानगर से सटे दक्षिण 24 परगना जिले में जहरीली शराब पीने से 170 से अधिक लोगों की मौत हुई थी तो पूरे देश में हड़कंप मच गया था। अवैध रूप से देशी शराब का धंधा करने वालों के खिलाफ बड़े पैमाने पर अभियान छेड़ा गया था। अवैध देशी शराब के निर्माण व बिक्री पर पाबंदी लगाने के लिए आबकारी विभाग से लेकर पुलिस तक ने पूरी सक्रियता के साथ अभियान चलाया था, जिसका विरोध करते हुए देशी शराब का अवैध कारोबार करने वालों ने पुनर्वास की मांग की थी। इसके बाद भी जहरीली शराब से कई और जानें गईं और पिछले दो दिनों में पूर्व मेदिनीपुर जिले के मयना में जहरीली शराब के दंश से 11 जानें चली गई। ऐसा नहीं है कि यह पहली घटना है। हर वर्ष जहरीली शराब से लोग मरते हैं लेकिन आज तक इस पर पूरी तरह रोक नहीं लग पाई है। आखिर इसके लिए कौन लोग जिम्मेदार हैं? पुलिस प्रशासन, देशी शराब का अवैध करोबार करने वाले या फिर वे लोग, जो यह जानते हुए उसे पीते हैं कि जान जा सकती है। यह सच है कि नशा करने वालों को यह दिखाई नहीं देता कि वह क्या पीने जा रहा है लेकिन पुलिस प्रशासन तो इसपर रोक लगा सकती है। पर ऐसा नहीं हो रहा। आखिर कब तक बार-बार उसी दंश की चपेट में आकर लोग जान देते रहेंगे? कब तक हमारी प्रशासनिक व्यवस्था अंधी व बहरा बनी रहेगी? आखिर कौन लोग हैं वे जो इस तरह से आम लोगों की जिंदगी से खेल रहे हैं? उनकी पहचान क्या है? चंद रुपये के खातिर वे ऐसी शराब बेचते हैं जिसे पीकर लोग मौत के मुंह में समा रहे हैं। पश्चिम बंगाल सरकार को चाहिए कि ऐसे कारोबार को तत्काल बंद कराए, नहीं तो लोग जहरीली शराब पीकर जान गंवाते रहेंगे। ऐसा नहीं है कि मयना में या फिर राज्य के अन्य हिस्सों में अवैध देशी शराब का जो कारोबार चल रहा है उसकी जानकारी पुलिस व आबकारी विभाग को नहीं होगी। कोई भी अवैध धंधा पुलिस और स्थानीय नेताओं के संरक्षण के बिना नहीं फल-फूल सकता। ऐसे में यह और जरूरी है कि ऐसे तमाम लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए जो ऐसे मौत के कारोबार का संरक्षक बने हुए हैं। अगर ऐसा नहीं हुआ तो लोगों की मौत का सिलसिला थमेगा नहीं। घटना होने के बाद कुछ दिनों तक तो पुलिस व संबंधित विभागों की तत्परता देखते बनती है लेकिन समय बीतते ही फिर वही 'ढाक के तीन पात' वाली कहावत चरितार्थ हो जाती है। यह जरूरी है कि कार्रवाई की प्रक्रिया सालभर समान गति से चलनी चाहिए और दोषियों को ऐसी सजा दी जानी चाहिए कि फिर से कोई मौत का सौदागर न बन सके।

[स्थानीय संपादकीय: पश्चिम बंगाल]

Posted By: Bhupendra Singh