राजनीतिक एवं सामाजिक रुख-रवैये पर व्यापक असर डालने और आरक्षित तबकों के साथ-साथ अनारक्षित तबके को भी समान अवसर उपलब्ध कराने वाले आर्थिक आरक्षण का अधिकांश विपक्षी राजनीतिक दलों ने समर्थन करते हुए जो कुछ सवाल खड़े किए उनकी पूरी तौर पर अनदेखी नहीं की जा सकती। अधिक से अधिक इसी सवाल की अनदेखी की जा सकती है कि आर्थिक आरक्षण संबंधी विधेयक अब क्यों लाया गया? इस सवाल का खास महत्व इसलिए नहीं, क्योंकि अतीत में सरकारें कई महत्वपूर्ण विधेयक इसी तरह अपना कार्यकाल खत्म होने के मौके पर ला चुकी हैैं। पिछली लोकसभा में ही आंध्र प्रदेश के विभाजन एवं नए राज्य तेलंगाना के गठन संबंधी विधेयक को बिल्कुल आखिरी समय लाया गया था।

आर्थिक आरक्षण पर विभिन्न राजनीतिक दलों की ओर से उठाया गया जो सवाल महत्वपूर्ण है वह यह कि एक ऐसे समय जब सरकारी नौकरियां बढ़ नहीं रहीं तब आर्थिक तौर पर कमजोर तबकों के लिए दस प्रतिशत आरक्षण से क्या हासिल होने वाला है? इस सवाल का जवाब महज इसलिए नहीं खोजा जाना चाहिए कि आर्थिक रूप से कमजोर लोगों के लिए दस प्रतिशत आरक्षण लाया जा रहा है, बल्कि इसलिए भी खोजा जाना चाहिए, क्योंकि रोजगार के अवसर बढ़ाकर ही लोगों को आकांक्षाओं को पूरा किया जा सकता है। समस्या केवल यह नहीं है कि सरकारी नौकरियां कम हो रही हैैं, बल्कि यह भी है कि विभिन्न विभागों में बड़ी संख्या में पद रिक्त हैैं। यह स्थिति केवल केंद्रीय सेवाओं में ही नहीं, बल्कि राज्य सरकारों के विभिन्न विभागों में भी है। एक तथ्य यह भी है कि विभिन्न सरकारी विभागों में आरक्षित वर्गों के भी तमाम पद रिक्त हैैं। आखिर इस हालत में आरक्षण का मकसद कैसे पूरा होगा?

रोजगार के अवसरों के मामले में यह किसी से छिपा नहीं कि निजी क्षेत्र में रोजगार के पर्याप्त अवसर पैदा नहीं हो रहे हैैं। चूंकि आने वाले वक्त में निजी क्षेत्र में ही रोजगार के अधिकाधिक अवसर पैदा किए जा सकते हैैं इसलिए इस तरह के स्वर तेज होने पर हैरत नहीं कि इस क्षेत्र में भी आरक्षण लागू किया जाए। एक समय पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इसकी आवश्यकता जताई थी। बेहतर हो कि निजी क्षेत्र अपने स्तर पर ऐसे उपाय करने के बारे में गंभीरता से सोच-विचार करे जिससे वह समाज के सभी तबकों का प्रतिनिधित्व करता हुआ दिखे।

आर्थिक तौर पर कमजोर वर्गों के लिए शिक्षण संस्थाओं और सरकार नौकरियों में आरक्षण भले ही दस प्रतिशत हो, लेकिन पात्रता की ऐसी शर्तों के कारण एक बड़ी संख्या उसके दायरे में आने वाली है कि आठ लाख रुपये सालाना आय वाले लोग इसका लाभ उठा सकेंगे। हालांकि यह आय सीमा वही है जो अन्य पिछड़ा वर्गों के आरक्षण में क्रीमी लेयर वालों के लिए है, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि यह आरक्षण का उपयुक्त प्रावधान है। मुश्किल यह है कि समय के साथ क्रीमी लेयर की सीमा भी बढ़ती जा रही है। विडंबना यह है कि यह उन्हीं राजनीतिक दलों के दबाव में बढ़ रही है जो आज यह सवाल खड़ा कर रहे हैैं कि आखिर आठ लाख सलाना आय वाले को आर्थिक रूप से कमजोर कैसे कह सकते हैैं?

Posted By: Bhupendra Singh

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