जैसे माहौल में क्वाड शिखर सम्मेलन आयोजित हुआ, उसे देखते हुए इस मंच की ओर से कोई प्रभावी संदेश दिया जाना आवश्यक ही था। यह राहत की बात है कि क्वाड ने एक बड़ी हद तक यह काम किया। भारत के साथ अमेरिका, जापान और आस्ट्रेलिया की सदस्यता वाले इस संगठन ने जिस तरह चीन को एक तरह से सख्त चेतावनी दी, वह समय की मांग थी। टोक्यो में जुटे क्वाड देशों के शासनाध्यक्षों का इस नतीजे पर पहुंचना आवश्यक हो गया था कि अंतरराष्ट्रीय नियम-कानूनों को धता बताने, पाकिस्तान एवं उत्तर कोरिया जैसे गैर जिम्मेदार देशों की ढाल बनने और अपने पड़ोसी देशों को तंग करने वाला चीन निंदा-आलोचना मात्र से सही रास्ते पर आने वाला नहीं।

उम्मीद की जानी चाहिए कि क्वाड ने जिस तरह यूरोपीय देशों से सहयोग बढ़ाने और समुद्री सीमा से जुड़े संयुक्त राष्ट्र के कानूनों के पालन को सुनिश्चित कराने को लेकर प्रतिबद्धता जताई, उससे चीन को यह समझने में आसानी होगी कि अब उसकी दादागीरी सहन नहीं की जाएगी। हिंद प्रशांत क्षेत्र में दूसरे देशों की सामुद्रिक सीमाओं में मछली मारने की गतिविधियों पर रोक लगाने के लिए एक विशेष कार्यक्रम चलाने की घोषणा यही बताती है कि चीन को उसकी हद में रखने के लिए कमर कसी जा रही है। इस कार्यक्रम को जितनी जल्दी संभव हो, कारगर ढंग से आगे बढ़ाया जाए। इससे ही चीन को यह समझ आएगा कि उसे समुद्री क्षेत्र में अपनी ताकत का मनमाना इस्तेमाल नहीं करने दिया जाएगा।

वास्तव में यह सुनिश्चित करके ही हिंद-प्रशांत क्षेत्र में शांति एवं स्थिरता कायम करने में मदद मिलेगी। यह भी अच्छा हुआ कि क्वाड ने दूसरे देशों को कर्ज के जाल में फंसाने के चीन के नापाक इरादों से निपटने के लिए भी कदम बढ़ाने के साथ यह तय किया कि इस क्षेत्र में कनेक्टिविटी बढ़ाने वाली परियोजनाओं को गति दी जाएगी। इससे ही दुनिया को यह संदेश जाएगा कि चीन की बेल्ट एंड रोड परियोजना औपनिवेशिक मानसिकता वाली है। इस परियोजना से विभिन्न देशों को केवल आगाह करना ही पर्याप्त नहीं। इसके साथ ही उन्हें विकल्प भी उपलब्ध कराने होंगे।

क्वाड शिखर सम्मेलन भारत के लिए इसलिए विशेष रूप से उल्लेखनीय रहा कि इस संगठन ने आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई को भी अपने एजेंडे में शामिल किया और मुंबई एवं पठानकोट में हुए आतंकी हमलों का जिक्र किया। स्पष्ट है कि चीन के साथ पाकिस्तान को भी निशाने पर लिया गया। भारत को न केवल इसके लिए तत्पर रहना होगा कि क्वाड अपने उद्देश्यों की पूर्ति में सफल रहे, बल्कि अन्य वैश्विक संगठनों से तालमेल भी बढ़े। इससे ही हिंद प्रशांत क्षेत्र के साथ पूरी दुनिया में शांति को बल मिलेगा और समान सोच वाले सभी देशों में सहयोग बढ़ेगा।

Edited By: Tilakraj