बिहार विधानसभा चुनाव में बिजली एक ऐसा मुद्दा बनकर उभरा है, जिसके लिए सत्तारूढ़ जदयू और विपक्षी दल भाजपा, दोनों बेचैन हैं और शोर भी मचा रहे हैं। भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार में बिहार से शामिल दूसरे दलों के मंत्री भी गृह राज्य आने पर बिजली को लेकर नीतीश सरकार को निशाना बना रहे हैं। आरोप ये जड़े जा रहे हैं कि दूसरी बार सत्ता में आने पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपनी धन्यवाद यात्राओं में एलान किया था कि इस बार वे घर-घर बिजली नहीं पहुंचा सके तो वोट मांगने नहीं आएंगे। इन लोगों का दावा है कि मुख्यमंत्री अपना वादा नहीं पूरा कर पाए हैं और सूबे के अधिकांश घरों में अंधेरा है। सात साल तक जदयू के साथ सत्ता में भागीदार रही भाजपा और केंद्र में उसकी अगुवाई वाली सरकार में शामिल बिहार के मंत्रियों का यह कथन भले सही हो कि हर घर में बिजली नहीं पहुंची है, परंतु ये बात किसी को नहीं पचेगी कि बिजली के क्षेत्र में नीतीश सरकार ने काम नहीं किया। नौ साल पहले के बिहार पर नजर डालें तो राजधानी पटना समेत सभी जिलों में दिन में ही नहीं, रात में भी बिजली के गुल रहने की तस्वीर उभर जाती है। जदयू के शासन में बिजली की वह तस्वीर काफी हद तक साफ हुई है। बिजली के क्षेत्र में यह सुधार नए विद्युत घरों के निर्माण के रूप में भी हुआ है, कुछ दिनों पूर्व बाढ़ में एनटीपीसी की इकाई में उत्पादन शुरू हो चुका है। यह इकाई सूबे को भी बिजली दे रही है, जबकि पुरानी इकाइयों में बरौनी और कांटी का भी पुनरोद्धार करने में राज्य सरकार सफल हुई है। औरंगाबाद के नवीनगर में एनटीपीसी की मेगा विद्युत इकाई की स्थापना हो रही है। इस तरह कुछ महीने पूर्व तक बिहार अपनी कुल जरूरत दो हजार मेगावाट के लिए भूटान से बिजली खरीदता था, अब उसकी मांग राज्य के बिजली घरों से पूरी हो रही है।

बिहार घरेलू जरूरत के हिसाब से बिजली का उत्पादन करने में जरूर सक्षम हुआ है, परंतु औद्योगिक इकाइयों की मांग और नए उद्योगों का जाल बिछाने के लिए अगले वर्ष तक राज्य को तीन हजार मेगावाट बिजली की जरूरत पड़ेगी और इसके लिए उसे नई इकाइयों में उत्पादन के लिए मशक्कत करनी होगी। नीतीश सरकार ने इसे महसूस करते हुए तीन हजार करोड़ की लागत से बिजली परियोजनाओं को अमली जामा पहनाने की कोशिश शुरू कर दी है। राज्य मंत्रिमंडल की शनिवार को हुई बैठक में बरौनी ïथर्मल के विस्तार परियोजना के तहत 250 मेगावाट की दो इकाइयों के लिए 1592.42 करोड़ रुपये स्वीकृत किए गए हैं। बरौनी की दोनों यूनिटों (110-110 मेगावाट) के आधुनिकीकरण के लिए बिहार स्टेट पावर जेनरेशन कंपनी को 81 करोड़ रुपये उपलब्ध कराए गए हैं। नीतीश के घर-घर बिजली पहुंचाने के वादे के सौ फीसद पूरा न होने की प्रमुख वजह ट्रांसमिशन लाइन का विस्तार न होना एक वजह हो सकती है। इसे महसूस करते हुए दीन दयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना में अलग कृषि फीडर निर्माण, वितरण एवं संचरण लाइन की मजबूती, विस्तारीकरण एवं मीटरीकरण के लिए नोडल एजेंसी को अनुदान के रूप में दस प्रतिशत राज्यांश उपलब्ध कराने को मंत्रिमंडल ने दस करोड़ रुपये स्वीकृत किए हैं। मेट्रो बन रही राजधानी पटना और उसके आसपास विद्युत संचरण लाइन की मजबूती के लिए भी 226.25 करोड़ रुपये की योजना को स्वीकृति दी गई है। नीतीश सरकार ने बिजली पर विपक्ष के व्यंग्य बाणों से निबटने के लिए खजाना भले खोल दिया है, परंतु उसके कदम देर से उठे है। लिहाजा चुनाव में इसे मुद्दा बनाने से रोक पाना संभव नहीं लगता।

[स्थानीय संपादकीय: बिहार]

Posted By: Bhupendra Singh