बिहार में राजनीतिक दलों से जुड़े जमीनी कार्यकर्ता हताश हैं, निराश हैं। वे ठगे महसूस कर रहे हैं। मुश्किल यह है कि वे अपनी पीड़ा किससे कहें? हरेक दल में कुछ नेता कार्यकर्ताओं की पीड़ा सुनने के लिए बैठे हुए हैं। लेकिन ये खुद इतने बेचारे हैं कि पीड़ा सुनने के बाद दाएं-बाएं देखकर खांसकर रह जाते हैं। कार्यकर्ता भी उनकी बेचारगी समझते हैं। ये कार्यकर्ता उन नेताओं से अपनी शिकायत भी नहीं कर पाते हैं, जिनके पास निर्णय लेने की क्षमता है। बड़ी कोशिश के बाद इनसे मुलाकात भी हो जाए तो क्या फायदा होना है। कातिल ही मुंसिफ की कुर्सी पर बैठ जाए तो इंसाफ की उम्मीद कौन करे। इस मोर्चे पर वाम दलों को छोड़कर कोई दल अपवाद नहीं है। कायदे से देखिए तो हरेक राजनीतिक दल का कार्यकर्ता ही ऐसा जीव होता है, जिसकी हकमारी के लिए प्रभावशाली लोग हमेशा तैयार रहते हैं। कोई कार्यकर्ता पांच साल तक किसी दल के लिए प्रतिबद्ध रहता है। किसी दल के विरोध में अपनी पार्टी से लोगों को जोड़ता है। अचानक चुनाव के वक्त पता चलता है कि जिस आदमी का उसने पांच साल तक विरोध किया, उसके दुर्गुण गिनाए, अब उसी के लिए वोट मांगना है। उसी का गुणगान करना है। कोई आदमी इन कार्यकर्ताओं की जगह पर खुद खड़ा होकर देखे तो उसकी पीड़ा का अहसास कर सकता है। हम चालू-पुर्जा नस्ल के कार्यकर्ताओं की बात नहीं कर रहे हैं, उनकी बात कह रहे हैं जो जनता की सेवा की गरज से किसी दल से जुड़ते हैं। जनता और दल की बेहतरी के लिए दिन-रात एक किए रहते हैं। दूसरे दल के राजनीतिज्ञ ही नहीं, पूर्व अफसर और बड़े कारोबारी भी आराम से इनका हक मारकर उम्मीदवार बन बैठते हैं। कोई अफसर उम्र भर शान से नौकरी करता है। इस अवधि में जनता से पर्याप्त दूरी बनाकर जीना ही इनकी योग्यता मानी जाती है। यही अफसर सेवा उपरांत अचानक जनता से नजदीकी का दिखावा करते हुए चुनाव मैदान में आ जाते हैं। ऐसे क्षणों में जनता के पास अधिक विकल्प नहीं रहता है।

इस बार भी विभिन्न दलों ने पूर्व अफसरों को उम्मीदवार बनाया है। इनमें से कुछ ऐसे हैं जिनका सेवा काल कभी जनपक्षीय नहीं रहा है। फिर भी ये राजनीति के मालिकों के अच्छे सेवक रहे हैं। इन्होंने अपने सेवा काल में राजनेताओं की खूब सेवा की। यहां तक कि चुनाव के समय खास राजनीतिक दलों के लिए कार्यकर्ताओं की तरह श्रम किया। उनकी इसी संचित सेवा का लाभ सेवा समाप्ति के बाद टिकट के रूप में मिलता है। यह ताज्जुब की बात है कि किसी भी दल में कार्यकर्ताओं की भावना को सुनने और समाधान के लिए उपयुक्त मंच की व्यवस्था नहीं है। राजनीति की इस शैली का असर संगठन पर पड़ा है। धीरे-धीरे जमीनी कार्यकर्ता निराश होकर घर बैठ रहे हैं। उनकी जगह ऐसे लोग ले रहे हैं, जिनके लिए राजनीति सेवा नहीं, कारोबार है। वे धन लगाते हैं। पैरवी-पट्टे के जोर पर लागत पूंजी के हिसाब से मुनाफा वसूलते हैं। ये सदा सुहागन टाइप के जीव होते हैं। सत्ता के साथ इनकी निष्ठा भी बदल जाती है। लेकिन, ये किसी के न होकर सिर्फ खुद के होते हैं।

[स्थानीय संपादकीय: बिहार]

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