संविधान दिवस पर आयोजित एक कार्यक्रम में प्रधानमंत्री ने बिना नाम लिए परिवारवादी राजनीतिक दलों को निशाने पर लेकर बिल्कुल सही किया। परिवारवाद को बढ़ावा दे रहे दलों को कठघरे में खड़ा करने की जरूरत इसलिए है, क्योंकि ऐसे दल लोकतंत्र और संविधान की भावना को केवल चोट ही नहीं पहुंचा रहे हैं, बल्कि एक किस्म की सामंतशाही को भी पाल-पोस रहे हैं।

परिवारवादी दलों से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वे लोकतांत्रिक मूल्यों और मान्यताओं को मजबूत करने का काम करेंगे। वे ऐसा कर भी नहीं रहे हैं। अपने दलों को निजी दुकान की तरह चलाने वाले परिवारवादी नेता जब समानता, लोकतंत्र, सत्ता में जनता की भागीदारी की बातें करते हैं, तब वे वास्तव में इन सबका उपहास ही उड़ा रहे होते हैं।

नि:संदेह प्रधानमंत्री की बातों से परिवारवादी दलों को बुरा लगेगा, लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं कि वे लोकतंत्र के लिए नासूर बनते जा रहे हैं। समय के साथ परिवारवादी दल बढ़ते जा रहे हैं। राष्ट्रीय दलों में भाजपा और वाम दलों को छोड़ दें तो कोई भी ऐसा नहीं, जो परिवारवाद पर आश्रित न हो। कांग्रेस तो परिवारवाद का पर्याय ही बन गई है।

वास्तव में उसने ही परिवारवाद की राजनीति का बीज बोया। एक समय गैर कांग्रेसी दल परिवारवाद को प्रश्रय देने के कारण कांग्रेस का विरोध करते थे, लेकिन धीरे-धीरे ऐसे दल न केवल उसकी शरण में जाते गए, बल्कि खुद भी परिवारवादी बन गए। आज एक-दो क्षेत्रीय दलों को छोड़कर कोई भी ऐसा नहीं, जो परिवारवाद को पोषित न कर रहा हो। कुछ तो ऐसे हैं, जिनमें दल की स्थापना करने वाले नेता की दूसरी-तीसरी-चौथी पीढ़ी राजनीति में खप चुकी है।

ऐसे दलों में समय के साथ परिवार के सदस्य लगातार बढ़ते जा रहे हैं। चूंकि वे परिवार के सदस्य होते हैं इसलिए तत्काल प्रभाव से महत्वपूर्ण पदों पर काबिज हो जाते हैं। इस मामले में उत्तर से लेकर दक्षिण और पूर्व से लेकर पश्चिम भारत तक के क्षेत्रीय दलों में अद्भुत समानता देखने को मिलती है। अब तो ऐसे दल परिवारवाद के पक्ष में कुतर्को से भी लैस हो गए हैं।

एक परिवार से एक से ज्यादा लोगों का राजनीति में सक्रिय होना उतनी बड़ी समस्या नहीं, जितनी पार्टी पर एक ही परिवार का कब्जा होना है। अब तो यह कब्जा पीढ़ी दर पीढ़ी बरकरार रहता है। ऐसा तो राजशाही में होता था। आखिर राजशाही की तरह संचालित होने वाले दल लोकतंत्र के लिए कल्याणकारी कैसे हो सकते हैं? यह वह सवाल है, जिस पर आम जनता को विचार करना होगा, क्योंकि परिवारवादी राजनीति के पोषक तो यह काम कभी नहीं करने वाले।

Edited By: Kamal Verma