संसद के निचले सदन में विपक्ष की नारेबाजी से आजिज आए लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने जैसे सख्त शब्दों में अपनी नाखुशी जाहिर की, कुछ वैसे ही राज्यसभा में सभापति वेंकैया नायडू ने अपनी नाराजगी प्रकट की। जहां लोकसभा अध्यक्ष ने विपक्षी सांसदों से नारेबाजी की प्रतियोगिता से बाज आने को कहा, वहीं राज्यसभा के सभापति ने संसद सदस्यों को आत्मनिरीक्षण करने और सदन का समय बर्बाद न करने की हिदायत दी। इसमें संदेह है कि इस नाराजगी का कहीं कोई असर विपक्षी दलों के नेताओं पर पड़ेगा। इसके आसार इसलिए नहीं, क्योंकि विपक्षी दलों ने पहले से ही यह तय कर रखा है कि कुछ भी हो जाए, संसद को नहीं चलने देना है। विपक्ष न केवल एकजुटता के अभाव से ग्रस्त दिख रहा है, बल्कि इससे भी कि किन मसलों को प्राथमिकता देनी है और किस तरह? भले ही वह कुछ मुद्दों को तूल देता हुआ दिख रहा हो, लेकिन ऐसा नहीं लगता कि उसे इन मुद्दों पर बहस में दिलचस्पी है। यदि ऐसा कुछ होता तो उसकी ओर से ऐसा माहौल उत्पन्न नहीं किया जाता कि संसद चलने ही न पाए। समझना कठिन है कि विपक्ष संसद की कार्यवाही बाधित कर क्या हासिल करना चाहता है? यदि वह यह समझ रहा है कि संसद न चलने से जनता के बीच कोई अच्छा संदेश जाएगा तो यह संभव नहीं, क्योंकि जनमानस तो राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों पर कोई सार्थक बहस चाहता है।

इस पर आश्चर्य नहीं कि विपक्ष के हंगामा मचाने वाले रवैये का संज्ञान लेते हुए प्रधानमंत्री ने भाजपा सांसदों को उसकी पोल खोलने को कहा। इस दौरान उन्होंने कांग्रेस को खासतौर पर निशाने पर लिया। उनकी मानें तो कांग्र्रेस खुद भी संसद नहीं चलने दे रही और अन्य विपक्षी दलों को भी इसके लिए उकसा रही है। वास्तव में यह देखना दयनीय है कि जब कांग्रेस को विपक्ष का नेतृत्व करते हुए उसे दिशा देनी चाहिए, तब वह खुद दिशाहीन दिख रही है। आखिर यह उसकी दिशाहीनता नहीं तो और क्या है कि उसने जैसे कृषि कानून बनाने का वादा अपने घोषणापत्र में किया था, वैसे ही कानून बन जाने पर उनका विरोध कर रही है? बेहतर हो कि वह 2019 में जारी किए गए अपने घोषणापत्र को फिर से पढ़े या फिर यह स्पष्ट करे कि उसके यू टर्न लेने की वजह क्या है? यदि उसका मकसद किसानों को गुमराह करना नहीं है तो फिर उसे अपना यह घोषणापत्र वापस लेना चाहिए। उसके रवैये से यही पता चलता है कि विरोध के लिए विरोध वाली राजनीति किस तरह सिर चढ़कर बोल रही है। इस राजनीति से किसी का भला होने वाला नहीं-आम जनता का तो बिल्कुल नहीं!

Edited By: Bhupendra Singh