मोदी सरकार - 2.0 के 100 दिन

बीते कुछ समय से कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी एक के बाद एक बड़े-बड़े एलान करने में लगे हुए हैैं। इसी क्रम में उन्होंने घोषणा की कि अगर कांग्रेस सत्ता में आई तो नीति आयोग को खत्म कर दिया जाएगा। इसके पहले वह जीएसटी में भी बड़े बदलाव की घोषणा कर चुके हैैं। इसके अलावा यह भी कह चुके हैैं कि कांग्रेस के सत्ता में आने पर देश के 20 प्रतिशत सबसे गरीब परिवारों के लिए न्यूनतम आय की योजना लागू की जाएगी। जैसे इस योजना को लेकर यह सवाल उठ रहा है कि क्या इसका एलान करने के पहले आवश्यक विचार-विमर्श किया गया उसी तरह इस पर भी सवाल खड़े हों तो हैरानी नहीं कि आखिर नीति आयोग को खत्म करने की घोषणा किस आधार पर की जा रही है? इससे भी बड़ा सवाल यह है कि नीति आयोग को खत्म करके फिर से योजना आयोग का निर्माण करने से क्या हासिल होगा?

यह ठीक है कि राहुल गांधी ने यह स्पष्ट किया कि भावी योजना आयोग में जाने-माने अर्थशास्त्रियों और विशेषज्ञों को रखा जाएगा और इन अर्थशास्त्रियों एवं विशेषज्ञों के साथ कुल स्टाफ की संख्या सौ से कम होगी, लेकिन क्या वह यह कहना चाह रहे हैैं कि नीति आयोग में ऐसे लोगों की कमी है? नि:संदेह यह भी समझना कठिन है कि सौ से कम संख्या इतनी महत्वपूर्ण क्यों है? क्या पहले वाला योजना आयोग इसीलिए अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतरा कि उसमें स्टाफ की संख्या सौ से कम नहीं थी? पता नहीं राहुल गांधी क्या कहना और करना चाहते हैैं, लेकिन आवश्यकता इस बात की है कि संस्थाओं को सक्षम बनाने वाले विचार सामने रखें जाएं और उनमें फेरबदल करने की जरूरत के पीछे ठोस कारण गिनाए जाएं। राहुल गांधी ने ऐसा कुछ करने के बजाय सिर्फ एक ट्वीट कर दिया, जबकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने योजना आयोग की जगह नीति आयोग बनाने की घोषणा लाल किले की प्राचीर से की थी।

इस पर हैरानी नहीं कि राहुल गांधी ने योजना आयोग की जगह बने नीति आयोग को सिरे से खारिज कर दिया, लेकिन उन्हें यह भी स्मरण होना चाहिए कि एक समय राजीव गांधी ने भी योजना आयोग के कामकाज से नाखुशी जताते हुए कहा था कि आखिर यह करता क्या है? राहुल गांधी को इसकी भी अनदेखी नहीं करनी चाहिए कि मनमोहन सरकार के समय योजना आयोग को निष्प्रभावी करने का काम एक बड़ी हद तक राष्ट्रीय सलाहकार परिषद ने किया था। यह संभव है कि नीति आयोग राहुल गांधी के मन मुताबिक काम न कर रहा हो, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि उसे खत्म करके वह पुरानी व्यवस्था बहाल करने का वादा किया जाए जिसके बारे में आम धारणा यही थी कि वह अप्रासंगिक हो चुकी है।

बेहतर होता कि राहुल गांधी ऐसा कोई विचार सामने रखते जिससे नीति आयोग को अधिक प्रभावी और उपयोगी बनाने में मदद मिलती। योजना आयोग फिर से बनाने की उनकी घोषणा से तो यही लगता है कि वह हर पुरानी व्यवस्था को बहाल करना बेहतर समझ रहे हैैं। ध्यान रहे कि उन्होंने अपनी न्यूनतम आय योजना को मनरेगा-2 का नाम दिया है।

Posted By: Bhupendra Singh

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