कश्मीर पहुंच रहे सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल पर घाटी में शांति का माहौल बनाने के साथ ही वहां की समस्याओं के समाधान का सिरा तलाशने की भी जिम्मेदारी है। इस जिम्मेदारी का निर्वहन ठीक से तभी हो सकेगा जब उसके और कश्मीरी जनता का नेतृत्व कर रहे विभिन्न पक्षों से बीच कोई सार्थक बातचीत की सूरत बनेगी। कश्मीर और खासकर दक्षिणी कश्मीरी करीब एक माह से उपद्रव और अशांति से घिरा है। पत्थरबाजी और इस दौरान पुलिस एवं सुरक्षा बलों के जवानों और उनके ठिकानों पर हमला दैनिक कार्यक्रम का हिस्सा बन गया है। यह महज गुस्से का नतीजा नहीं, किसी सोची-समझी रणनीति का हिस्सा अधिक जान पड़ता है। यह अच्छा हुआ कि कश्मीर रवाना होने के पहले प्रतिनिधिमंडल में इस पर आम सहमति बन गई कि बातचीत सभी से होगी। इनमें अलगाववादी एवं पाकिस्तान परस्त संगठन हुर्रियत कांफ्रेंस के नेता भी शामिल हैं। जब लक्ष्य बातचीत के जरिये समस्या का हल निकालना हो तो फिर सभी संबंधित पक्षों से बात करने में हर्ज नहीं। हुर्रियत कांफ्रेंस के नेताओं से बात करने की जरूरत इसलिए भी समझ भी आती है, क्योंकि एक तो वे ही अशांति के मौजूदा दौर के लिए जिम्मेदार हैं और दूसरे खुद मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती यह आग्रह कर रही हैं कि इस संगठन के नेताओं से अवश्य बात की जानी चाहिए। विपक्षी दलों के कई नेता भी विभिन्न मसलों पर करीब-करीब वही भाषा बोल रहे हैं जो हुर्रियत नेता गिलानी बोल रहे हैं। यह विवाद का विषय हो सकता है कि गिलानी और उनके साथी कितने प्रतिशत कश्मीरियों का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं, लेकिन इतना तो है ही कि उनके साथ कुछ लोग हैं। इसी तरह इसमें भी कोई दो राय नहीं कि उन्हें पाकिस्तान का सहयोग, समर्थन और संरक्षण भी हासिल है।

हुर्रियत और ऐसे ही कुछ अन्य संगठन आजादी की मांग करने में लगे हुए है। यह कोई नई मांग नहीं है, लेकिन यह स्पष्ट नहीं कि आजादी से उनका आशय क्या है? बेहतर हो कि सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल आजादी की मांग का वास्तविक अर्थ समझने की कोशिश करे। इस प्रक्रिया में उसे यह स्पष्ट करने में कहीं कोई संकोच नहीं दिखाना चाहिए कि आजादी के नाम पर कश्मीर के भारत से अलग होने के मामले पर कहीं कोई चर्चा नहीं हो सकती। सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल को अलगाववादी नेताओं और कश्मीर की जनता के समक्ष दो टूक ढंग से यह स्पष्ट करना होगा कि वे उस संसद का प्रतिनिधित्व करते हैं जिसने एक प्रस्ताव पारित कर यह संकल्प व्यक्त किया है कि जम्मू-कश्मीर भारत का अटूट हिस्सा है। यह संभव है कि बातचीत के पहले दौर में किसी ठोस नतीजे पर न पहुंचा जा सके, लेकिन गिलानी और ऐसे ही अन्य लोगों को उनकी हद तो बता ही दी जानी चाहिए। भारत से अलग होने की मांग कर रहे लोगों के दिमाग में यह बात घर कराना आवश्यक है कि उनकी मांग कितनी बेतुकी है और वे दिवास्वप्न देख रहे हैं। प्रतिनिधिमंडल को पूरी एकजुटता और दृढ़ता से यह स्पष्ट करना होगा कि अलगाववादी नेर्ता ंहसा के जरिये कुछ भी हासिल नहीं कर सकते और उल्टे नुकसान उठा सकते हैं। ऐसा इसलिए आवश्यक है, क्योंकि यदि अलगाववादी नेताओं के अडिय़ल रुख के चलते बात नहीं बन पाती तो फिर दूसरे विकल्पों पर विचार करना होगा। कश्मीर पहुंच रहे प्रतिनिधिमंडल ने जो काम अपने हाथों में लिया है वह सही से तभी पूरा कर सकेगा जब दलगत हितों से ऊपर उठकर काम करेगा।

[ मुख्य संपादकीय ]

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