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विधायक प्राथमिकता में पहली बार सड़क, बिजली, पानी से बढ़कर रोजगार मुहैया करवाने वाली व पर्यटन संभावनाएं तलाशने पर बल दिया।

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हिमाचल में विकास का खाका खींचने के लिए हर साल की तरह इस बार भी विधायक प्राथमिकता बैठक में जनप्रतिनिधियों ने अपने-अपने क्षेत्र के विकास की चिंता जताई। हालांकि इस बार चिंता की लकीरें कुछ अलग तरह की दिखीं। पहली बार विधायक प्राथमिकता नए अंदाज में नजर आई। प्रदेश की कई सड़कें भले ही बदहाल हों लेकिन विधायक सड़क पानी से आगे सोच रहे हैं...उनकी नजर धार्मिक पर्यटन पर है...वे अधिकाधिक रोजगार चाहते हैं... यानी अब वे कुछ नया चाहते हैं। कुछ विधायकों ने राज्य के सीमावर्ती क्षेत्रों में औद्योगिक विस्तार भी मांगा। इस बैठक में हर बार बिजली, पानी और सड़क के अधिक मुद्दे छाए रहते थे, लेकिन पहली बार जनप्रतिनिधियों ने क्षेत्र में रोजगार देने के लिए कोई प्रोजेक्ट या उद्योग लगाने की मांग रखी।

प्रदेश में वर्तमान में बेरोजगारी का आंकड़ा दस लाख के आसपास पहुंच चुका है, इसलिए जनप्रतिनिधियों की पीड़ा भी जायज है। यह भी सही है कि प्रदेश की भौगोलिक परिस्थितियों के अनुसार हर हलके में उद्योग लगाना संभव नहीं है, लेकिन सरकार को ऐसे प्रयास करने की जरूरत है, जिससे बेरोजगारी के बढ़ते आंकड़े को कम किया जा सके। हालांकि बैठक के दौरान यह चिंता भी उभर कर सामने आई कि हर साल सिंचाई स्कीमों की प्राथमिकताएं विधायकों से ली जाती हैं, लेकिन उनपर किसी प्रकार का काम नहीं होता।

विडंबना यह है कि पांवटा डिवीजन के तहत 11 योजनाओं के टेंडर दस साल पहले हो चुके थे, लेकिन अभी तक एक भी योजना का निर्माण कार्य पूरा नहीं हुआ। इसी तरह से चौपाल क्षेत्र में प्राथमिकता में दी गई सड़क योजनाएं अभी तक पूरी नहीं हो पाई है। यह तो कुछ विधायकों की पीड़ा बैठक में सामने आई अन्यथा कई ऐसे मामले हैं, जिनपर मंजूरी के बाद भी काम नहीं हो पाता है। सत्ता बदलने के साथ विपक्ष से जुड़े विधायक के क्षेत्र से भेदभाव के आरोप तो लगते ही रहते हैं। विकास कार्यों के नाम पर राजनीति का कोई स्थान नहीं होना चाहिए। हालांकि यह राहत देने वाली बात है कि बैठक में मुख्यमंत्री ने कहा कि विधायकों की प्राथमिकताओं की प्रगति की समीक्षा के लिए वार्षिक योजना बैठकें अब साल में दो बार होंगी। इन कार्यों की प्रगति के लिए जब तक अफसरशाही दिलचस्पी नहीं दिखाएगी तब तक बेहतर कल की उम्मीद नहीं की जा सकती है।

[ स्थानीय संपादकीय: हिमाचल प्रदेश ]

Posted By: Bhupendra Singh