विभिन्न विपक्षी नेताओं की ओर से ईवीएम को लेकर जैसे शरारत भरे बयान दिए जा रहे हैैं उन्हें देखते हुए केंद्रीय गृह मंत्रालय के लिए राज्यों को ऐसे निर्देश देना आवश्यक हो गया था कि मतगणना के वक्त कहीं पर किसी तरह की हिंसा न होने पाए। मतगणना के दौरान हिंसा का अंदेशा इसलिए उभर आया है, क्योंकि कई विपक्षी नेता खुले आम उत्पात मचाने की धमकियां दे रहे हैैं। केंद्र में मंत्री रहे राष्ट्रीय लोक समता पार्टी के नेता उपेंद्र कुशवाहा ने एक्जिट पोल के आंकड़ों को चुनाव नतीजों को प्रभावित करने की साजिश करार देते हुए खून की नदियां बहाने की बात की तो ईवीएम के खिलाफ दुष्प्रचार करते रहे आम आदमी पार्टी के एक नेता ने कहा कि चुनाव आयोग दंगे कराने और देश को गृहयुद्ध में धकेलने का काम कर रहा है। इसकी भी अनदेखी न करें कि ऐसे बेजा बयानों के बीच ईवीएम को संदिग्ध बताने का सिलसिला कायम है। ईवीएम के खिलाफ माहौल बनाने के लिए पहले चुनाव आयोग के समक्ष बेजा मांगें रखी जाती हैैं और फिर उन्हें ठुकराए जाने पर अन्याय होने का शोर मचाया जाता है।

चिंताजनक यह है कि यह काम बड़े नेता भी करने में लगे हुए हैैं। वे एक्जिट पोल को तो किसी साजिश का हिस्सा बता ही रहे हैैं, यह भी रेखांकित कर रहे हैैं कि ईवीएम अब भरोसेमंद नहीं रह गई हैैं। समझना कठिन है कि जब इसके पहले मतदान बाद पर्चियों की गिनती मतगणना के बाद ही होती रही है तो फिर यह मांग क्यों की जा रही है कि इस बार पहले इन पर्चियों को गिना जाए? कहीं इसलिए तो नहीं कि अगर कोई विसंगति दिखे तो हंगामा खड़ा करने में आसानी हो?

यह लज्जा की बात है कि वे विपक्षी नेता भी जानबूझकर ईवीएम को बदनाम करते हुए दिख रहे हैैं जो इसी मशीन के सहारे अतीत में सत्ता हासिल कर चुके हैैं? वे ऐसा तब कर रहे हैैं जब बीते कुछ वर्षों में ईवीएम को और अधिक विश्वसनीय बनाने का काम किया गया है। हार-जीत चुनाव प्रक्रिया का एक हिस्सा है, लेकिन यह पहली बार है जब हार की आशंका से ईवीएम और चुनाव आयोग के साथ भारतीय लोकतंत्र को बदनाम करने का काम सुनियोजित तरीके से किया जा रहा है। ईवीएम विरोधी अभियान को तूल दे रहे नेता अपने प्रलाप से देश को नीचा दिखाने के साथ ही मतदाताओं का भी निरादर करने में लगे हुए हैैं। ऐसा करके वे अपनी अपरिपक्वता का ही परिचय दे रहे हैैं।

यह खेद की बात है कि बिना किसी सुबूत ईवीएम पर संदेह जताने वाले नेताओं के सुर में पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने भी अपना सुर मिला दिया। आखिर उन्हें यह कहने की क्या जरूरत थी कि जनादेश को लेकर कोई संशय नहीं होना चाहिए और चुनाव आयोग ईवीएम की सुरक्षा को लेकर लगाई जा रही अटकलों पर विराम लगाए? यदि किसी का मकसद ही बेवजह के सवाल खड़े करना और अटकलबाजी करना हो तो फिर उसे दुनिया की कोई ताकत संतुष्ट नहीं कर सकती। अच्छा होता कि पूर्व राष्ट्रपति रुदन कर रहे विपक्ष को हिदायत देना बेहतर समझते।

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