सिरसा के डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख गुरमीत राम रहीम सिंह के दुष्कर्म के जुर्म में जेल जाने के बाद उससे या डेरे से जुड़े मामले अब दोबारा खुलने लगे हैं। डेरों के कई राज अब सामने आने लगे हैं तो सभी हैरान हो रहे हैं। पंजाब में पूर्व में हुई कई घटनाओं में इस डेरे या प्रमुख का नाम कई मामलों या घटनाओं में आया तो वे सुरक्षा या सियासी कारणों से शांत कर दिए गए। अब जब डेरा प्रमुख जेल में है तो यह मामले फिर उभरने लगे हैं। यह सभी को मालूम है कि इस डेरा प्रमुख द्वारा 2007 में श्री गुरु गोबिंद सिंह जी की नकल करते हुए, उनके जैसा लिबास धारण कर अपने अनुयायियों को जाम-ए-इंसां पिलाया गया था तो सिखों ने उसका डटकर विरोध किया था। हालात काफी तनावपूर्ण हो गए थे। हैरानी की बात है कि न केवल उस मामले में पुलिस ने क्लोजर रिपोर्ट दे दी थी बल्कि उसके बाद 2015 में श्री अकाल तख्त द्वारा डेरा प्रमुख को माफी देने के पश्चात फरीदकोट के बुर्ज जवाहर सिंह वाला में सिख विरोधी पोस्टर लगाए जाने के मामले को भी पुलिस ने ठंडे बस्ते में डाल दिया था। पुलिस की इस हीलाहवाली से यह संशय होना स्वाभाविक है कि उस पर सियासी दबाव था जिसके चलते इस मामले में कुछ नहीं किया गया। अगर वाकई ऐसा है कि डेरा की नाराजगी मोल न लेने के लिए इस मामले को दबा दिया तो यह ठीक नहीं है। अब इस मामले की परतें दोबारा खुलने जा रही हैं तो दूध का दूध पानी का पानी होना चाहिए। हालांकि पुलिस ने कहा है कि पोस्टरों की शब्दावली के जरिए शरारती तत्वों की पहचान की जाएगी और आरोपियों पर सख्त कार्रवाई की जाएगी लेकिन माना तभी जाएगा जब कुछ हो जाए। ऐसे मामलों में अभी तक का अनुभव तो यही बताता है कि होता कुछ नहीं, केवल ढिंढोरा पीटा जाता है। शोर खत्म होते ही मामले भी शांत हो जाते हैं। इस बार हो सकता है कि दोषियों तक पुलिस पहुंच पाए और धार्मिक भावनाओं को भड़काने, आपसी भाईचारे में कड़वाहट पैदा करने की कोशिश करने वाले पकड़े जाएं। सख्ती तो बरतनी होगी। यह इसलिए जरूरी है ताकि भविष्य में कोई इस तरह का दुस्साहस करने से पहले सौ बार सोचे। ऐसे तत्वों को सियासी संरक्षण कतई नहीं होना चाहिए। वोट के लिए डेरों व उनके अनुयायियों को इस्तेमाल करने वालों भी बाज आना होगा। जनता एक दिन उन्हें भी माफ नहीं करेगी।

[ स्थानीय संपादकीय: पंजाब ]

Posted By: Bhupendra Singh

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