खादी के प्रति राज्य सरकार का सम्मान आर्थिक के साथ-साथ सामाजिक और वैचारिक विकास को संबल देगा। महात्मा गांधी ने कहा था कि खादी वस्त्र नहीं विचार है। इस विचार को बिहार ने शिद्दत से अपनाया है। बिहार की खादी संस्थाएं बड़ी संख्या में खादी के साथ-साथ ग्रामोद्योगी वस्तुओं के उत्पादन के लिए मशहूर रही हैं। खादी से जुड़े लोगों के प्रति समाज का बड़ा ही सम्मान का भाव रहा है। खादी सामाजिक ताने-बाने को समरसता में पिरोये रखने का उद्यम है। यदि इसे नवजीवन देने के प्रति राज्य सरकार आग्रही है और बिहार खादी नीति बनाने जा रही है तो यह स्वागतयोग्य कदम है। इसके लिए जरूरी है कि खादी के प्रति लोगों की समझ बढ़े। आज बड़ी संख्या में खादी के नाम पर बिक्री केंद्र खुल गए हैं। कोई जरूरी नहीं कि उन केंद्रों पर खादी के नाम पर बेचे जाने वाले वस्त्र वास्तव में खादी ही हों। बिना किसी मिलावट के निर्मल भाव से तैयार किए गए कपास के सूत, सिल्क और शुद्ध ऊन के वस्त्र ही वास्तव में खादी है। इसमें स्वचालित उपकरणों का उपयोग न के बराबर होता है। इसका उद्देश्य ही है ज्यादा से ज्यादा हाथों को रोजगार मिले। चालाक लोगों ने मूल्य के इस अंतर का काफी फायदा उठाया और खादी की पहचान बदलती चली गई।

बहुतायत आज खादी के नाम पर बाजार में उपलब्ध वस्त्र शुद्ध खादी नहीं हैं। सर्व प्रथम तो खादी जगत से इस चालाकी को किनारे करने के उपाय ढूंढने होंगे। यह भी सच है कि आधुनिक युग के उपभोक्ताओं की मांग के अनुरूप खादी ने खुद को नहीं बदला। थोड़े-बहुत बदलाव हुए, लेकिन खादी के कमजोर पड़ने की सबसे बड़ी वजह रही विचार का लोप होना। मूलत: खादी से जुड़ी संस्थाएं लागत मूल्य पर व्यवस्था खर्च जोड़कर अपने उत्पाद को उपभोक्ताओं तक पहुंचाती हैं। मशीन का उपयोग न किए जाने की वजह से प्रतिस्पर्धा के बाजार में ये उत्पाद थोड़े महंगे रहे। यदि इसके महंगे होने की वजह आमजन को बताई जाती तो खादी पर आज जैसा संकट नहीं होता। लोगों के बीच मजबूती के साथ यह संदेश नहीं पहुंचाया जा सका कि खादी के शुद्ध उत्पादों का उद्देश्य व्यापार नहीं, बल्कि ज्यादा से ज्यादा हाथों को रोजगार देना है। सरकार ने खादी स्कूल खोलने की भी योजना बनाई है। उम्मीद की जानी चाहिए कि इसके पाठ्यक्रम महात्मा गांधी के विचारों पर आधारित होंगे।

[ स्थानीय संपादकीय: बिहार ]

Posted By: Bhupendra Singh