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स्थायी नियुक्ति की मांग को लेकर छह माह से आंदोलनरत हैं, लेकिन सरकार गंभीर नहीं दिख रही है, हर माह इन्हें केवल सात हजार मेहनताना मिलता है।
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स्थायी नियुक्ति की मांग को लेकर छह माह से आंदोलन कर रहे प्लस टू कांटे्रक्चुअल लेक्चररों को न्याय न मिल पाना दुखद है। ये शिक्षक क्रमिक भूख हड़ताल पर हैं। विगत दिवस इनके सब्र का बांध टूट गया और शहर के व्यस्त डोगरा चौक में धरना प्रदर्शन पर उतारू हो गए। पुलिस ने उन्हें वहां से खदेड़ दिया। विडंबना यह है कि इनकी मांगों पर सरकार गंभीर नहीं दिख रही है। विडंबना यह है कि यह शिक्षक पंद्रह साल पहले कांट्रेक्ट पर लगे थे। उनको हर माह केवल सात हजार मेहनताना मिलता है, जो महंगाई के दौर में कुछ भी नहीं है। यह वेतन चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी से भी कम है। ऐसे में ये लेक्चरर न आगे बढऩे के रहे हैं और न पीछे जाने के। ये सभी पोस्ट ग्रेजुएट, पीएचडी डिग्री प्राप्त हैं। अगर इनसे अन्याय हुआ तो इसका असर शिक्षा पर भी पड़ेगा। सरकार को चाहिए कि जो लेक्चरर वर्षों से अनुबंध पर सेवाएं दे रहे हैं, उनको तुंरत पक्का किया जाए। कब तक सरकार अनुबंध का सहारा लेगी। इससे तो बेहतर है कि इन्हीं लेक्चररों का साक्षात्कार लेकर नौकरियों में पक्का कर दिया जाए। अगर हड़ताल लंबी खिंचती है तो उसका नुकसान जारी शिक्षा सत्र पर भी पड़ रहा है। इसलिए सरकार को बीच का रास्ता निकालना होगा, क्योंकि शिक्षा मंत्री से लेकर कई नेताओं ने इन्हें नौकरियों में पक्का करने का आश्वासन भी दिया, लेकिन बेनतीजा रहा। अगर शिक्षित बेरोजगार छह माह से सड़कों पर आंदोलन कर रहे हैं तो सरकार को भी चाहिए कि उन्हें नौकरियों में पक्का किया जाए, क्योंकि कई शिक्षक उम्रदराज हो चुके हैं और उनके पास नौकरी का कोई दूसरा विकल्प नहीं है। ऐसे शिक्षकों की संख्या बारह सौ है, जिनमें पांच सौ जम्मू संभाग तो सात सौ कश्मीर के हैं। जब इन्हें कांट्रेक्ट पर रखा गया था तो उम्मीद थी कि वे एक दिन पक्के हो जाएंगे। स्वाभाविक है कि इससे लेक्चररों में अनिश्चितता बढऩे लगी है। शिक्षकों को भी चाहिए कि आंदोलन के लिए दूसरा तरीका अपनाएं। शिक्षकों की जगह क्लास में होती है। अगर समाज को बनाने वाले शिक्षक सड़कों पर उतरेंगे तो देश का भविष्य कैसे संवरेगा।

[ स्थानीय संपादकीय : जम्मू-कश्मीर ]

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