रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच बातचीत के बाद दोनों देशों के साझा बयान में जिस तरह सीमापार आतंकवाद के खिलाफ बिना किसी दोहरे मानदंड के निर्णायक लड़ाई का आह्वान किया गया, वह पाकिस्तान के साथ-साथ अमेरिका के लिए भी यह नसीहत है कि उसे इस मामले में अपनी रीति-नीति बदलनी होगी। इसमें संदेह है कि इस संदेश का पाकिस्तान पर कहीं कोई असर पड़ेगा, लेकिन अमेरिका को इस पर अवश्य विचार करना चाहिए कि वह भारत और रूस सरीखे देशों को इस पर आश्वस्त क्यों नहीं कर पा रहा है कि आतंकवाद से निपटने के मामले में उसकी नीतियों में कहीं कोई भिन्नता नहीं है? यह ठीक है कि हाल के समय में अमेरिका ने पाकिस्तान पर आतंकवाद के खिलाफ सख्ती करने के लिए दबाव डाला है और इस क्रम में उसे मिलने वाली सहायता को भी आतंकियों और उनके संगठनों के खिलाफ कार्रवाई की शर्त से जोड़ दिया है, लेकिन यह कहना कठिन है कि उसे जितनी चिंता अमेरिकी हितों को लेकर है उतनी ही भारतीय हितों की भी।

इस संदेह का एक बड़ा कारण यह है कि अमेरिका अपने लिए खतरा बने आतंकी संगठनों को लेकर तो पाकिस्तान पर सख्ती बरत रहा है, लेकिन वैसी ही गंभीरता लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मुहम्मद जैसे उन आतंकी संगठनों के खिलाफ नहीं दिखाई जा रही है जो भारतीय हितों को नुकसान पहुंचाने में लगे हैं। इससे संतुष्ट नहीं हुआ जा सकता कि अमेरिका ने आतंकवाद के खिलाफ अपनी नई नीति में अन्य अनेक संगठनों के साथ बब्बर खालसा और लश्कर को भी अपने लिए खतरे के रूप में रेखांकित किया। अमेरिका को यह महसूस करना चाहिए कि ऐसे संगठन पूरी दुनिया के लिए खतरा हैं। हर कोई इससे भी परिचित है कि ऐसे संगठन कहां फल-फूल रहे हैं।

आतंकवाद को लेकर अमेरिका की तरह ही चीन का रवैया भी दोहरे मानदंडों वाला है। वह जैश सरगना मसूद अजहर को वैश्विक आतंकवादी घोषित किए जाने की पहल पर हर बार इस या उस बहाने अड़ंगा लगा देता है। उसे कभी इस पहल में कोई तकनीकी कमी नजर आती है तो कभी वह और सुबूतों की मांग करने लगता है। यही वह रवैया है, जिसके चलते आतंकवाद के खिलाफ दुनिया की साझा लड़ाई उतनी प्रभावशाली नहीं हो पा रही है, जितनी उसे होना चाहिए। जो भी हो, भारत और रूस ने जिस तरह अमेरिका की चेतावनी को नजरअंदाज करते हुए अपने रक्षा सहयोग को एक नए आयाम पर पहुंचाते हुए एस-400 वायु रक्षा प्रणाली के सौदे को अंतिम रूप दिया वह भारत की प्रतिरक्षा तैयारियों के लिए बेहद अहम है। इस सौदे ने भारत के एक महत्वपूर्ण और भरोसेमंद रक्षा सहयोगी के रूप में रूस की भूमिका पर नए सिरे से मुहर लगाई है। रूस से एस-400 वायु रक्षा प्रणाली की खरीद का समझौता करके भारत ने यह संकेत दे दिया है कि वह किसी के भी दबाव की परवाह किए बिना अपने राष्ट्रीय हितों को सर्वोच्च प्राथमिकता देगा। इस सौदे के बाद अमेरिका की प्रतिक्रिया जो भी हो, भारत को उसके समक्ष यह साफ करने में संकोच नहीं करना चाहिए कि नई दिल्ली को अपनी रक्षा जरूरतें पूरी करने के लिए हर आवश्यक कदम उठाने का पूरा अधिकार है।

Posted By: Nancy Bajpai

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