भारत सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक के बीच मतभेद बढ़ना कोई शुभ संकेत नहीं। दोनों को कोशिश करनी चाहिए कि मतभेद रहते हुए भी मिलकर काम करने और अर्थव्यवस्था को संबल देने की सूरत कैसे बने। आखिर जब दोनों का उद्देश्य अर्थव्यवस्था को गति देना है तब फिर ऐसी कोई राह निकालना कठिन क्यों होना चाहिए जिससे सभी के हितों की पूर्ति हो? यह सही है कि रिजर्व बैंक एक स्वायत्त नियामक संस्था है, लेकिन उसकी भी जवाबदेही बनती है। उसकी जवाबदेही शासन के प्रति भी बनती है, क्योंकि यदि अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर कोई समस्या उत्पन्न होती है तो जवाब-तलब चुनी गई सरकार से ही किया जाएगा।

सरकार और रिजर्व बैंक के बीच मतभेद नए नहीं हैं। अभी हाल में दोनों के बीच मतभेद तब उभर आए थे जब पंजाब नेशनल बैंक में एक बड़ा घोटाला सामने आया था। तब रिजर्व बैंक ने अधिकारों की कमी का सवाल उठाया था जिस पर सरकार की ओर से कहा गया था कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की नियामक संस्था वही है और वह सभी वांछित अधिकारों से लैस भी है। रिजर्व बैंक इससे सहमत नहीं दिखा, लेकिन जब यह माना जा रहा था कि मतभेद दूर हो गए हैं तब वे फिर से न केवल उभर आए, बल्कि एक तरह के टकराव में भी तब्दील होते दिख रहे हैं।

इस बार मतभेद के कारण करीब दर्जन भर मसले बताए जा रहे हैं। पता नहीं सच क्या है, लेकिन यदि हर मामले में दोनों का रुख-रवैया एक-दूसरे के विपरीत दिखेगा तो फिर इसी नतीजे पर पहुंचने में आसानी होगी कि किसी न किसी स्तर पर विवाद बढ़ाने की कोशिश हो रही है। मतभेदों की स्थिति में सहमति की राह खोजना तभी कठिन होता है जब बीच का रास्ता निकालने की कोशिश नहीं की जाती।

बैंकों के घोटाले और डूबे हुए कर्ज के मामले में रिजर्व बैंक की दलील कुछ भी हो, आम धारणा यही है कि बैंकों की निगरानी और नियमन का काम सही तरीके से नहीं किया जा सका। आखिर इस सवाल का जवाब रिजर्व बैंक नहीं तो और कौन देगा कि संदिग्ध किस्म के तथाकथित उद्यमियों को बड़े पैमाने पर कर्ज कैसे बंटते रहे? नि:संदेह बढ़ते एनपीए के चलते ऐसे उपाय समय की मांग हैं कि कर्ज एनपीए में तब्दील न होने पाए, लेकिन अगर सख्त उपायों के कारण कर्ज मिलने ही मुश्किल हो जाएंगे तो फिर अभीष्ट की पूर्ति होने वाली नहीं है।

यह ठीक नहीं कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के बाद गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों के नियमन को लेकर सरकार और रिजर्व बैंक विपरीत छोर पर दिख रहे हैं। यह स्थिति गैर बैंकिग क्षेत्र की प्रमुख कंपनी आइएल एंड एफएस के संकट में फंसने के बाद बनी है। ऐसा लगता है कि समस्या फैसलों को लेकर नहीं, बल्कि उन्हें लागू करने के तरीकों को लेकर अधिक है। यह ऐसी समस्या नहीं जिसका समाधान न हो सके, लेकिन इसके लिए दोनों ही पक्षों को समाधान तलाशने को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी होगी। कारोबारी सुगमता सूचकांक में एक और लंबी छलांग के बीच यह बिल्कुल भी ठीक नहीं कि सरकार और रिजर्व बैंक में तनातनी दिखे।

Posted By: Bhupendra Singh