कोरोना वायरस से उपजी कोविड-19 महामारी ने केवल सेहत और कारोबार पर ही बुरा असर नहीं डाला है। उसने जीवन के अन्य क्षेत्रों को भी गहराई से प्रभावित किया है। इनमें एक प्रमुख क्षेत्र है शिक्षा। चीन से निकली इस महामारी ने दुनिया भर को जिस बड़े पैमाने पर अपनी चपेट में लिया उसका सामना करने के लिए कोई भी देश तैयार नहीं था। चूंकि भारत उन देशों में है जहां कोरोना का कहर कहीं व्यापक है इसलिए उसे लोगों की सेहत और कारोबार के साथ इसकी भी चिंता अधिक करनी पड़ रही है कि छात्रों की पढ़ाई को कैसे जारी रखा जाए और रुकी हुई परीक्षाओं को किस तरह संपन्न कराया जाए? पढ़ाई के मामले में ऑनलाइन विकल्प अवश्य आजमाए जा रहे हैं, लेकिन यह स्पष्ट है कि इस तरह की पढ़ाई स्कूल-कॉलेज जाकर किए जाने वाले अध्ययन का स्थान नहीं ले सकती।

स्कूल-कॉलेज जाने वाले छात्र क्षेत्र केवल पठन-पाठन के उपयुक्त वातावरण से ही दो-चार नहीं होते, बल्कि वे व्यक्तित्व विकास के उन तौर-तरीकों से भी परिचित होते हैं जो घर-परिवार में रहकर हासिल नहीं किए जा सकते। अब जब यह स्पष्ट है कि ऑनलाइन अध्ययन परंपरागत पठन-पाठन का विकल्प नहीं बन सकता और ज्यादा से ज्यादा उसमें सहायक ही बन सकता है तब फिर छात्रों, शिक्षकों, अभिभावकों और शिक्षा प्रशासकों को इस पर गहन मंथन करना होगा कि मौजूदा चुनौतियों का सामना कैसे किया जाए?

महामारी से उपजे हालात इस जरूरत को रेखांकित कर रहे हैं कि पाठ्यक्रम में कटौती करने, रुकी हुई परीक्षाओं को आयोजित कराने या फिर बिना परीक्षा छात्रों को उत्तीर्ण करने और अगली कक्षाओं में प्रवेश को लेकर जो भी नियम और दिशानिर्देश बनें उन्हें लेकर कहीं कोई अस्पष्टता न रहे। थोड़ी सी भी अस्पष्टता छात्रों और अभिभावकों की समस्याओं को बढ़ाने का ही काम करेगी। यह बिल्कुल भी ठीक नहीं कि भिन्न-भिन्न शिक्षा बोर्ड पढ़ाई, परीक्षा, परिणाम और पाठ्यक्रम के मामले में अलग-अलग नीति पर चलें। आखिर देश के सभी शिक्षा बोर्ड आपसी विचार-विमर्श के बाद एक जैसे फैसले क्यों नहीं ले सकते?

यह स्पष्ट किए जाने की भी जरूरत है कि किस आधार पर यह मान लिया गया कि विश्वविद्यालयों की परीक्षाएं सितंबर में कराई जा सकती हैं? अगर सितंबर में परीक्षाएं कराने की स्थिति नहीं बनी तो क्या होगा? यह सही है कि अभी कोई नहीं कह सकता कि सितंबर में क्या स्थिति बनेगी, लेकिन उचित यही है कि शिक्षा प्रशासक हर परिस्थिति का सामना करने के लिए तैयार रहें। इसी के साथ यह भी आवश्यक है कि शिक्षक और अभिभावक छात्रों का मनोबल बनाए रखें और उन्हें हर तरह की चुनौतियों का सामना करने के लिए प्रेरित करें।

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