सात निश्चय की योजनाओं के प्रति गंभीर नीतीश सरकार का छात्र-छात्रओं को निगम के माध्यम से ऋण उपलब्ध कराने का निर्णय स्वागत योग्य है। बैंकों के भरोसे चल रही स्टूडेंट क्रेडिट कार्ड योजना बहुत ही दयनीय हालत में पहुंच चुकी थी। अब छात्रों को बैंकों का चक्कर नहीं लगाना होगा। उनके आवेदन राज्य शिक्षा वित्त निगम में जमा होंगे। ऋण प्राप्त करना अब आसान होगा। इस कवायद से बेहतरी की उम्मीद की जा सकती है। यदि सरकार ने यह निर्णय एक साल के आकलन के बाद ही ले लिया होता तो हालात कुछ और होते। यह योजना महात्मा गांधी के जन्मदिन पर 2 अक्टूबर 2016 को लागू हुई थी। सरकार की ओर से बैंकों को लगातार योजना की गति बढ़ाने को कहा जा रहा था, लेकिन परिणाम काफी निराशाजनक रहा। चूंकि महागठबंधन की सरकार में तालमेल का भी अभाव था, इस कारण संभवत: इस मुद्दे पर ठोस निर्णय नहीं लिया जा सका था। परिणाम यह हुआ कि बिना गारंटी के मिलने वाला यह ऋण मजह दो फीसद ही लक्ष्य हासिल कर सका। चालू वित्तीय वर्ष में छह लाख छात्र-छात्रओं को ऋण दिलाने का लक्ष्य था। इनमें 12 हजार अभ्यर्थियों को ही ऋण दिया जा सका।

सरकार की यह तत्परता भी सराहना के लायक है कि निगम की स्थापना को मंत्रिमंडल में मंजूरी दे दी गई। यह निगम एक अप्रैल से काम करने लगेगा। इस योजना के तहत चार लाख रुपये तक का ऋण दिया जाता है। बैंकों के रवैये से हुए नुकसान पर भी मंथन की जरूरत है, क्योंकि इससे सरकार की साख जुड़ी हुई है। अन्य योजनाओं में भी ऋण वितरण को लेकर बैंकों की उदासीनता सामने आती रही है। इसकी वजह से चिन्हित बैंकों में सरकारी राशि न रखने की चेतावनी भी सरकार की ओर से दी जाती रही है, लेकिन इसका कोई खास असर नहीं दिखता। किसी वजह से सरकार की साख पर सवाल खड़ा होता है तो इसे गंभीरता से लेते हुए समीक्षा की जानी चाहिए। साथ ही बैंकों को भी चाहिए कि राज्य की प्रगति में सहायक बनने के लिए जोखिम उठाने की क्षमता बढ़ाएं। योजनाओं के क्रियान्वयन के लिए जरूरी है कि जरूरतमंद को सहजता से ऋण मिले। इसके अभाव में कई छोटी-बड़ी परियोजनाएं दम तोड़ देती हैं। इसका सीधा असर राज्य के विकास पर पड़ता है। विशेषकर लघु एवं कुटीर उद्योगों के ऋण के मामले में बैंकों की भूमिका ठीक नहीं कही जा सकती। जरूरत है इन हालातों की समीक्षा कर सुगम रास्ता निकालने की।

[ स्थानीय संपादकीय: बिहार ] 

By Sanjay Pokhriyal