यह अच्छा हुआ कि सुप्रीम कोर्ट ने रेवड़ी संस्कृति को एक गंभीर विषय बताते हुए उसे खत्म करने के लिए केंद्र सरकार और निर्वाचन आयोग से न केवल सुझाव मांगे, बल्कि एक विशेषज्ञ निकाय बनाने का निर्देश भी दिया। उसने इस निकाय में केंद्र सरकार और निर्वाचन आयोग के साथ विभिन्न दलों, नीति आयोग, रिजर्व बैंक आदि को शामिल करने को भी कहा। ऐसे किसी निकाय को गठित कर सबसे पहले रेवड़ी संस्कृति को परिभाषित करना होगा, क्योंकि कई दल अपनी लोक-लुभावन घोषणाओं को जन कल्याणकारी योजनाओं की संज्ञा देने लगे हैं।

इसी कारण निर्वाचन आयोग ऐसे दलों पर लगाम लगाने में समर्थ नहीं, जो अपने घोषणा पत्रों में मनमानी लोक-लुभावन घोषणाएं करते हैं। रेवड़ी संस्कृति की शुरुआत तमिलनाडु से हुई और फिर वह पूरे देश में फैल गई। आज स्थिति यह है कि करीब-करीब प्रत्येक दल चुनाव के मौके पर लोक-लुभावन घोषणाएं करने लगा है। ऐसा करते समय राजनीतिक दल इसकी परवाह नहीं करते कि वे अपने लोक-लुभावन वायदों को पूरा कैसे करेंगे? वे इसका भी कोई आकलन नहीं करते कि क्या आर्थिक स्थिति उन्हें उनके वायदे पूरे करने की सुविधा प्रदान कर रही है?

इसका कोई अर्थ नहीं कि राजनीतिक दल चुनावी लाभ के लिए आमदनी अठन्नी-खर्चा रुपैया वाली कहावत चरितार्थ करें। राजस्व की अनदेखी कर रेवड़ी संस्कृति को अपनाना कितना घातक हो सकता है, इसका ताजा उदाहरण है श्रीलंका। वह इसीलिए तबाह हो गया, क्योंकि उसने अपनी दयनीय आर्थिक दशा के बाद भी लोगों को रियायत देने का सिलसिला कायम रखा। यह चिंता की बात है कि श्रीलंका जैसा काम अपने देश की कुछ राज्य सरकारें भी करने में लगी हुई हैं। रेवड़ी संस्कृति केवल अर्थव्यवस्था की समस्याएं ही नहीं बढ़ाती, बल्कि वह मुफ्तखोरी को बढ़ावा भी देती है।

ऐसी किसी योजना को जनकल्याणकारी नहीं कहा जा सकता, जो लोगों को मुफ्तखोर बनाए। जनकल्याणकारी योजना तो उसे ही कहा जा सकता है, जो लोगों की उत्पादकता बढ़ाए और उनके जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं को पूरा करने के साथ ही उनकी आर्थिक क्षमता बढ़ाने में सहायक हो।

इससे इन्कार नहीं कि देश में एक ऐसा वर्ग है, जो आर्थिक रूप से कमजोर है और उसे राहत एवं रियायत देने की आवश्यकता है, लेकिन इसका यह मतलब भी नहीं कि राजनीतिक दल आर्थिक नियमों की अनदेखी कर चुनाव के मौके पर रेवड़‍ियां बांटने की घोषणा करें। चूंकि कई बार ऐसी घोषणाएं एक तरह से वोट खरीदने की कोशिश और साथ ही भ्रष्ट चुनावी तौर-तरीकों का पर्याय दिखती हैं, इसलिए उन पर रोक लगनी ही चाहिए।

Edited By: Praveen Prasad Singh