पंजाब में शायद कोई ही दिन ऐसा गुजरता होगा जिस दिन एक या दो किसान कर्ज से परेशान होकर खुद को फंदा लगाकर या फिर जहरीला पदार्थ खाकर आत्महत्याएं न करते हों। राज्य में मालवा क्षेत्र किसान आत्महत्याओं के लिए तो जैसे कुख्यात ही होता जा रहा है। आंकड़े गवाह हैं कि सबसे ज्यादा मालवा क्षेत्र में ही किसानों ने बैंकों से लिया कर्ज न चुका पाने की सूरत में आत्महत्या जैसा जघन्य अपराध किया। लगातार आत्महत्याओं के मामले बढ़ने पर सरकार ने इनकी जमीनी हकीकत जानने के लिए पिछले दिनों विधायकों पर आधारित एक विधानसभा कमेटी का गठन किया था। इस विधानसभा कमेटी ने गांव-गांव घूमकर विभिन्न संगठनों, किसान जत्थेबंदियों व पीड़ित परिवारों से मिलकर जो रिपोर्ट तैयार की है और सरकार को सौंपी है उसके तथ्य चौंकाने वाले हैं। कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट कहा है कि अधिकतर किसानों ने कर्ज खेती के लिए नहीं लिया बल्कि खेतों को गिरवी रखकर किसी अन्य कार्य के लिए लिया, जिसमें शादी, मकान से लेकर अन्य कारण शामिल हैं।

किसानों ने बैंकों से पैसा लेकर फिजूलखर्ची तो कर ली परंतु जब बैंक ने पैसा वापस मांगा तो उनके हाथ खड़े हो गए। कर्ज वापसी न होने पर जब जमीन की कुर्की हुई तो किसानों को सामने कोई रास्ता नजर न आता देख सिर्फ एक ही मौत का आखिरी रास्ता नजर आया। यहां पर विधानसभा की कमेटी ने बैंकों की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाएं हैं कि किस प्रकार से बैंकों ने लिमिट से ज्यादा कर्ज किसानों को मुहैया करवाया और उन्हें मरने के लिए मजबूर किया। बैंकों ने अधिकाधिक कर्ज देकर अपने टार्गेट तो पूरे कर लिए परंतु किसानों को सड़क पर ला खड़ा कर दिया। न उनके पास जमीन बची न घर, सब बैंकों के पास गिरवी हो गया। अब भी वक्त है कि किसान दिखावे की संस्कृति से बाहर आकर फिजूलखर्ची पर अंकुश लगाएं। सरकार को भी चाहिए कि वह बैंकों पर लगाम कसे कि वह किसानों को धोखे में रखकर लिमिट से ज्यादा कर्ज न दें।

[ स्थानीय संपादकीय: पंजाब ]

Posted By: Bhupendra Singh

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