इससे बेहतर और कुछ नहीं कि निर्वाचन आयोग आपराधिक छवि वालों को चुनाव लड़ने से रोकने के लिए सख्ती बरतने जा रहा है। इसके तहत उसने राजनीतिक दलों को सुप्रीम कोर्ट के इस निर्देश का कड़ाई से पालन करने को कहा है कि उन्हें आपराधिक छवि वालों को उम्मीदवार बनाने पर यह बताना होगा कि उनका चयन क्यों किया गया? राजनीतिक दलों को यह जानकारी समाचार पत्रों और अन्य माध्यमों से सार्वजनिक करनी होगी। हालांकि यह व्यवस्था पांच राज्यों के आगामी विधानसभा चुनावों में ही लागू हो जाएगी, लेकिन देखना यह है कि राजनीतिक दल इस पर कितनी गंभीरता से अमल करते हैं?

यह सवाल इसलिए, क्योंकि यह किसी से छिपा नहीं कि चुनाव मैदान में उतरने वाले दागी उम्मीदवार बढ़ते जा रहे हैं। इतना ही नहीं, इनमें से तमाम जीत हासिल कर विधानसभाओं और लोकसभा में भी पहुंच जा रहे हैं। क्या इससे बड़ी विडंबना और कोई हो सकती है कि कानून एवं व्यवस्था को चुनौती देने वाले या फिर उसके लिए खतरा बने लोग ही विधानमंडलों में जाकर कानून बनाने का काम करें? दुर्भाग्य से ऐसा ही हो रहा है। इसके चलते न केवल राजनीति का अपराधीकरण हो रहा है, बल्कि विधानमंडलों में विमर्श का स्तर भी गिरता जा रहा है।

उम्मीद की जाती है कि निर्वाचन आयोग का दबाव रंग लाएगा, लेकिन इसकी भी आशंका है कि राजनीतिक दल आपराधिक छवि वालों को उम्मीदवार बनाने के लिए कोई न कोई आड़ खोज ही लेंगे। आखिर यह एक तथ्य है कि अतीत में राजनीतिक दल दागी छवि वालों को इस बहाने चुनाव मैदान में उतारते रहे हैं कि वे उन्हें सुधरने का मौका देना चाहते हैं। निर्वाचन आयोग के साथ आम जनता को भी यह देखना होगा कि ऐसी थोथी दलीलों के साथ दागी उम्मीदवार चुनाव मैदान में उतरकर सफल न होने पाएं, क्योंकि आखिर यह जनता ही है, जो जाति, मजहब, क्षेत्र के नाम पर आपराधिक छवि वालों को वोट देने का काम करती है।

नि:संदेह जितनी जरूरत निर्वाचन आयोग के स्तर पर यह सुनिश्चित करने की है कि आपराधिक इतिहास वाले चुनाव मैदान में न उतरने पाएं, उतनी ही इसकी भी कि मतदाता भी ऐसे उम्मीदवारों से दूरी बनाए। और भी अच्छा यह होगा कि राजनीतिक दल निर्वाचन आयोग के उस प्रस्ताव पर सहमत हों, जिसके तहत यह कहा जा रहा है कि संगीन आरोपों से घिरे उन लोगों को प्रत्याशी बनाना निषेध किया जाए, जिनके खिलाफ आरोप पत्र दायर हो चुका हो। दुर्भाग्य से राजनीतिक दल इस पर यह कहने में लगे हुए हैं कि दोषी सिद्ध न होने तक हर कोई निर्दोष है। अच्छा हो कि वे यह समझें कि यह तर्क राजनीति के अपराधीकरण को बढ़ा रहा है।

Edited By: Kamal Verma