अव्यवस्था की अनदेखी कैसे घातक परिणाम सामने लाती है, इसका एक और उदाहरण है देश की राजधानी दिल्ली के एक होटल में आग लगने के कारण 17 लोगों की मौत। ये मौतें इसलिए हुईं, क्योंकि जिन पर भी इस होटल को नियम-कायदे के हिसाब से चलाने देने की जिम्मेदारी थी उन सबने हद दर्जे की लापरवाही का परिचय दिया। इसीलिए इस अग्निकांड को हादसा कहना उसकी गंभीरता को कम करना है। यह हादसा नहीं, जिम्मेदार लोगों की लापरवाही का खौफनाक नतीजा है।

यह लापरवाही की पराकाष्ठा ही है कि जिस अर्पित पैलेस होटल को चार मंजिला होना चाहिए था वह छह मंजिला बना लिया गया था और जिसमें सुरक्षा के सभी उपाय होने चाहिए थे उसमें आपातकालीन द्वार एक तो संकरा था और दूसरे उस पर ताला जड़ा हुआ था। इस होटल में आग से बचाव के प्रबंध भी दिखावटी थे। यही कारण रहा कि बचाव के उपाय नाकाफी साबित हुए। इस होटल में आग का कहर उपहार सिनेमाघर में घटे भयावह अग्निकांड की याद दिलाने वाला ही नहीं, यह भी बताने वाला है कि देश की राजधानी में व्यावसायिक गतिविधियां किस तरह अभी भी मनमाने तरीके से चलाई जा रही हैं।

क्या दिल्ली का शहरी ढांचा आज भी वैसा ही अव्यवस्थित और अराजक है जैसा उपहार कांड के समय था? हाल में दिल्ली में अवैध तरीके से चलाए जा रहे कारखानों में आग लगने की कई घटनाएं सामने आ चुकी हैं। एक घटना तो उसी इलाके में घटी थी जहां होटल अर्पित पैलेस है। ऐसा लगता है कि दिल्ली के शासन-प्रशासन ने पुरानी घटनाओं से कोई सबक सीखना उचित नहीं समझा। इससे भी शर्मनाक बात यह है कि अभी भी ऐसा नहीं लगता कि जरूरी सबक सीख लिए गए हैं। दिल्ली सरकार और नगर निगम के आला अफसरों के बयान कर्तव्य की इतिश्री करते ही अधिक दिखते हैं।

दिल्ली के होटल में आग लगने के कारणों की जांच के आदेश वैसे ही नाकाम-निष्प्रभावी साबित हों तो हैरत नहीं जैसे इसके पहले के मामलों में साबित हुए। आखिर कितने व्यावसायिक स्थलों में आग के जानलेवा कहर के बाद इस बुनियादी बात को समझा जाएगा कि अगर ऐसे स्थल नियम-कानूनों के साथ सुरक्षा उपायों की घोर अनदेखी करके चलेंगे तो वे तबाही का कारण ही बनेंगे? यह नाकारापन ही है कि बेतरतीब शहरी ढांचे और सार्वजनिक सुरक्षा की उपेक्षा तब हो रही है जब उन्हें सर्वोच्च प्राथमिकता देनी चाहिए। शहरी ढांचे का नियमन करने वाले न केवल अनियोजित विकास की अनदेखी कर रहे हैं, बल्कि सार्वजनिक सुरक्षा को भी ताक पर रख रहे हैं। यही कारण है कि कभी किसी होटल में आग लगने से तबाही मचती है तो कभी किसी अस्पताल अथवा कारखाने में।

प्रत्येक घटना-दुर्घटना के बाद आमतौर पर यही सामने आता है कि तबाही से दो-चार हुए ठिकाने पर या तो अवैध निर्माण होने दिया गया था या फिर दुर्घटना से बचाव के उपाय केवल कागजों पर थे। इससे भी बुरी बात यह है कि जांच के नाम पर केवल खानापूरी होती है। बेहतर हो कि जिम्मेदार लोग यह समझें कि व्यावसायिक ठिकानों अथवा बहुमंजिली इमारतों में नियम-कानूनों की उपेक्षा का मतलब है उन्हें जानबूझकर लाक्षागृह में तब्दील करना।

Posted By: Bhupendra Singh