अयोध्या विवाद की सुनवाई एक बार फिर टलना इस मामले के पक्षकारों के साथ ही उन करोड़ों लोगों के लिए निराशाजनक है जो सदियों पुराने इस मसले के जल्द समाधान की प्रतीक्षा में हैैं। इस बार सुनवाई इसलिए टली, क्योंकि सुन्नी वक्फ बोर्ड के वकील राजीव धवन ने पांच सदस्यीय पीठ में न्यायाधीश यूयू ललित के शामिल होने को लेकर यह रेखांकित किया कि एक वकील की हैसियत से वह तब कल्याण सिंह की पैरवी कर चुके हैैं जब उन्हें अयोध्या ढांचा ढहने पर सुप्रीम कोर्ट की अवमानना का सामना करना पड़ा था। यह सही है कि राजीव धवन ने उन्हें पीठ से हटाने की मांग नहीं की, लेकिन उनकी ओर से 1994 के इस मामले का जिक्र जिस तरह किया गया वह कुल मिलाकर एक सवाल की ही शक्ल में उभरा। पता नहीं उनका मकसद क्या था, लेकिन जो प्रकट हो रहा है वह यही कि अयोध्या विवाद की सुनवाई को लंबा खींचने की कोशिश हो रही है।

इसी कोशिश के तहत पहले यह दलील दी गई कि इस मामले की सुनवाई आम चुनाव के बाद होनी चाहिए। इसके बाद यह कहा गया कि पहले 1994 के उस मामले पर पुनर्विचार हो जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने यह व्यवस्था दी थी कि मस्जिद में नमाज पढ़ना इस्लाम का अभिन्न हिस्सा नहीं है। जब सुप्रीम कोर्ट ने इस पर विचार करने का फैसला किया तो यह मांग की गई कि इस मामले की सुनवाई बड़ी बेंच करे। यह मांग मंजूर नहीं हुई और सुप्रीम कोर्ट ने यह पाया कि मस्जिद में नमाज वाले मसले का अयोध्या मामले से कोई लेने-देना नहीं। इस नतीजे पर पहुंचने में समय लगा और जब अयोध्या मामले की सुनवाई की बारी आई तब तक तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश की सेवानिवृत्ति का समय करीब आ गया। उनकी सेवानिवृत्ति के बाद नए मुख्य न्यायाधीश की ओर से नई पीठ गठित करने की कवायद शुरू हुई। इस क्रम में पहले यह सूचना दी गई कि नई पीठ ही यह तय करेगी कि मामले की सुनवाई कब होगी। फिर यह कि नई पीठ पांच सदस्यीय होगी। इसी के साथ एक और तारीख मिली।

न्यायाधीश यूयू ललित की ओर से खुद को सुनवाई से अलग करने के बाद एक और तारीख मिली है। नि:संदेह यह एक तर्क है कि सब कुछ न्यायिक प्रक्रिया के तहत ही हो रहा है, लेकिन क्या इसकी अनदेखी कर दी जाए कि बीते नवंबर से तारीख पर तारीख का ही सिलसिला कायम है। कहना कठिन है कि 29 जनवरी को क्या होगा, लेकिन इतना तो है ही कि न्यायिक प्रक्रिया को केवल गतिशील होना ही नहीं चाहिए, बल्कि ऐसा दिखना भी चाहिए।

बेहतर हो कि सुप्रीम कोर्ट यह समझे कि अयोध्या मामले की सुनवाई में देरी लोगों को अधीर कर रही है। इस अधीरता को आधारहीन नहीं कहा जा सकता, क्योंकि इलाहाबाद उच्च न्यायालय को इस मसले पर फैसला सुनाए हुए नौ साल बीत चुके हैैं। क्या इसकी कोई न्यायसंगत व्याख्या हो सकती है कि इस मामले को प्राथमिकता के आधार पर निपटाने का काम क्यों नहीं किया जा सका? कम से कम अब यह सुनिश्चित किया जाए कि इस मामले की सुनवाई में और देरी न हो।

Posted By: Bhupendra Singh