राहुल गांधी की ओर से कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफे की पेशकश किए जाने के एक माह बाद भी यह जानना कठिन है कि पार्टी में क्या हो रहा है और उसका नेतृत्व कौन संभालने वाला है? राहुल गांधी एक ओर यह कह रहे हैं कि वह अपने फैसले पर अडिग हैं और दूसरी ओर बतौर अध्यक्ष बैठकें और फैसले भी करने में लगे हुए हैं।

गत दिवस उन्होंने विभिन्न राज्यों के नेताओं के साथ बैठक करने के साथ छत्तीसगढ़ में कांग्रेस के नए अध्यक्ष की नियुक्ति भी की। उन्होंने यह भी दर्द बयान किया कि उनकी ओर से इस्तीफे की पेशकश किए जाने के बाद भी कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अपनी जिम्मेदारी का अहसास नहीं कर रहे हैं।

आखिर वह इन वरिष्ठ नेताओं से क्या चाह रहे हैं? क्या वह यह चाहते हैं कि सभी वरिष्ठ नेता और खासकर वे नेता अपना पद छोड़ दें जिनके प्रति वह अपनी नाखुशी प्रकट कर चुके है? अगर राहुल गांधी ऐसा ही चाह रहे हैं तो इसका मतलब यही निकलता है कि वह लोकसभा चुनाव में हार के लिए अपने साथ-साथ इन नेताओं को भी जिम्मेदार मान रहे हैं। पता नहीं वह क्या सोच रहे हैं, लेकिन पार्टी के संविधान के मुताबिक तो कुछ होता हुआ दिखता नहीं।

कांग्रेस के संविधान के अनुसार पार्टी अध्यक्ष के त्यागपत्र की स्थिति में नए अध्यक्ष की नियुक्ति होने तक कार्यसमिति किसी को अंतरिम अध्यक्ष बनाएगी। कहीं इसमें इसलिए देरी तो नहीं हो रही है, क्योंकि राहुल गांधी अपने इस्तीफे की पेशकश तक ही सीमित हैं और यह स्पष्ट नहीं कि अध्यक्ष न रहने की स्थिति में पार्टी में उनकी क्या भूमिका होगी?

अभी तो यही लग रहा है कि अगर वह अध्यक्ष पद छोड़ भी देते हैं तो पर्दे के पीछे से पार्टी वही चलाते रहेंगे। इस सिलसिले में इसकी भी अनदेखी नहीं कर सकते कि वह पार्टी में सक्रिय बने रहने और जनता की लड़ाई लड़ते रहने की बात कर रहे हैं।

विश्व राजनीति में ऐसे उदाहरण कम ही मिलते हैं कि किसी नेता ने पार्टी की कमान छोड़ने के बाद फिर से उसकी कमान संभाली हो, लेकिन भारतीय राजनीति में कई ऐसे नेता रहे जिन्होंने पार्टी की अध्यक्षता छोड़ने के कुछ समय बाद फिर से उसकी कमान अपने हाथ में ले ली। यह काम इंदिरा गांधी भी कर चुकी हैं। पहली बार वह नेहरू के समय ही कांग्रेस अध्यक्ष बन गई थीं।

दोबारा उन्होंने 1970 के दशक में पार्टी की कमान संभाली और फिर उसके बाद से कांग्रेस पूरी तौर पर गांधी परिवार की पार्टी बनकर रह गई। यह किसी से छिपा नहीं कि नरसिंह राव और सीताराम केसरी को किस तरह गांधी परिवार के दवाब में काम करना पड़ा। इसी दबाव का सामना मनमोहन सरकार को भी करना पड़ा।

अगर कांग्रेस को गांधी परिवार के हिसाब से ही चलना है तो फिर राहुल गांधी के अध्यक्ष पद छोड़ने का कोई मतलब नहीं। यह भी ध्यान रहे कि जहां सोनिया गांधी यूपीए अध्यक्ष हैं वहीं प्रियंका गांधी वाड्रा महासचिव के रूप में सक्रिय हैं। क्या यह संभव है कि गांधी परिवार के बाहर का कोई पार्टी अध्यक्ष प्रियंका गांधी को आदेश-निर्देश दे सके? 

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