इस सूचना का कोई मतलब नहीं कि राहुल गांधी ने कांग्रेस अध्यक्ष पद छोड़ने की पेशकश की, जिसे पार्टी व नेताओं ने ठुकरा दिया। इसका अर्थ तो यही निकाला जाएगा कि वह या तो कांग्रेस की अध्यक्षता छोड़ने के लिए तैयार नहीं या फिर उन्होंने इस्तीफे की पेशकश इसी इरादे से की ताकि अपने लिए समर्थन और सहानुभूति अर्जित की जा सके। बेहतर हो कि इस पर वह भी गहन आत्ममंथन करें और पार्टी के वरिष्ठ नेता भी उन्हें अध्यक्ष बने रहना चाहिए या नहीं? यदि आत्ममंथन के नाम पर खानापूरी की जाएगी तो फिर कांग्रेस को कुछ हासिल होने वाला नहीं है। कांग्रेस के जो भी नेता यह दलील देने में लगे हुए हैैं कि लोकसभा चुनाव में पार्टी को मिली पराजय त्रासदी सरीखी नहीं वे जानबूझकर सच को स्वीकार करने से इन्कार कर रहे हैैं।

क्या यह हास्यास्पद नहीं कि एक दर्जन से अधिक राज्यों में कांग्रेस का खाता भी नहीं खुला और फिर भी राहुल गांधी को यह समझाने की कोशिश हो रही है कि हम बुरी तरह हारने से बच गए। यह तो जीती मक्खी निगलने वाली बात हुई। क्या ऐसे नेता कांग्रेस के हितैषी कहे जा सकते हैैं? कहीं ये वही तो नहीं जो जनाधार न रखने के बावजूद इसलिए पार्टी के महत्वपूर्ण पदों पर हैं, क्योंकि दरबारी संस्कृति में माहिर हैैं? पार्टी में ऐसे नेताओं के हावी रहते हुए यह संभव ही नहीं कि हार के कारणों की सही तरह समीक्षा हो सके।

यह सही है कि कांग्रेस को गांधी परिवार का सहारा चाहिए, लेकिन आखिर इसका क्या मतलब कि सोनिया गांधी के बाद राहुल गांधी ने अध्यक्ष पद हासिल कर लिया और फिर उन्होंने बहन प्रियंका गांधी को सीधे महासचिव बना दिया। आखिर यह फैसला उनकी किस योग्यता के आधार पर हुआ? कहीं इस आधार पर तो नहीं कि वह इंदिरा गांधी की तरह दिखती हैैं? क्या यह परिवारवाद की पराकाष्ठा नहीं कि सोनिया गांधी संप्रग अध्यक्ष, राहुल गांधी कांग्रेस अध्यक्ष और प्रियंका गांधी महासचिव? इसकी भी अनदेखी न करें कि प्रियंका के महासचिव बनने के बाद उनके पति राबर्ट वाड्रा भी राजनीति में सक्रिय होने के संकेत दे रहे थे।

क्या राहुल गांधी का हाथ केवल परिवार के लोग ही बंटा सकते हैैं? यह तो परिवार को कुछ वैसे ही प्रश्रय देना हुआ जैसे मुलायम सिंह और लालू यादव ने दिया। इससे इन्कार नहीं कि उपाध्यक्ष और फिर अध्यक्ष बनने के बाद राहुल गांधी के तौर-तरीकों और भाषा-शैली में कुछ बदलाव आया है, लेकिन वह रह-रह कर यह आभास भी कराते रहते हैैं कि राजनीति उनका मूल स्वभाव नहीं।

उन्हें पार्टी की कमान अपने हाथ में रखनी चाहिए या नहीं, इस बारे में सबसे बेहतर तरीके से फैसला वह खुद ही कर सकते हैैं। देखना केवल यह नहीं है कि राहुल गांधी कांग्रेस अध्यक्ष बने रहते हैैं या नहीं, बल्कि यह भी है कि उनके या फिर परिवार से इतर नेता के नेतृत्व में पार्टी की रीति-नीति में आमूल-चूल बदलाव आता है या नहीं? आज कांग्रेस परिवार शासित ऐसा संगठन अधिक है जो सत्ता में रहना अपना खानदानी अधिकार समझता है। आज के भारत में इस मानसिकता के लिए कोई स्थान नहीं। 

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Posted By: Dhyanendra Singh

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