चीनी राष्ट्रपति का भारत आगमन ऐसे समय पर हुआ है जब दोनों देशों के बीच वैसा कोई जटिल मसला नहीं है जैसा वुहान बैठक के पहले डोकलाम को लेकर था। वुहान में दोनों देशों के नेताओं के बीच हुई मुलाकात की अगली कड़ी ही मामल्लपुरम है। भारतीय प्रधानमंत्री ने चीनी राष्ट्रपति की दिल्ली के बजाय सुदूर दक्षिण के मामल्लपुरम में अगवानी कर यही रेखांकित किया कि वह अपनी विदेश नीति के जरिये दुनिया को भारत की सांस्कृतिक विरासत और विविधता से भी परिचित करा रहे हैैं। वुहान की तरह मामल्लपुरम की बैठक भी अनौपचारिक है।

अनौपचारिक बैठक का यह सिलसिला इसलिए उल्लेखनीय है, क्योंकि इसमें वार्ता का एजेंडा तय करने और फिर वक्तव्य जारी करने की बंदिश नहीं रहती। इसका मतलब है कि ऐसी बैठकों में कूटनीतिक सीमाओं से परे हटकर हर मसले पर बातचीत हो सकती है। इससे एक-दूसरे के प्रति समझ-बूझ बढ़ने और बेहतर नतीजे निकलने की उम्मीद बढ़ जाती है। मामल्लपुरम में भारतीय प्रधानमंत्री और चीनी राष्ट्रपति की बैठक के बाद यह सार्वजनिक हो या न हो कि उन्होंने किन मसलों पर क्या बात की, लेकिन दोनों देशों के हित में यही है कि द्विपक्षीय रिश्ते आगे बढ़ते दिखें। ऐसा तभी होगा जब चीन कश्मीर पर पाकिस्तान के सुर में बोलने से बाज आए और अरुणाचल के मामले में अपनी निरर्थक आपत्तियां जताने का सिलसिला बंद करे।

यदि चीन यह चाहता है कि भारत उसके हितों की चिंता करे तो यही काम उसे भी करना होगा। उसे भारत के खिलाफ पाकिस्तान को मोहरा बनाने की अपनी रणनीति पर नए सिरे से विचार करना ही होगा। यदि वह ऐसा नहीं करता तो फिर भारत को यह संकेत देने में संकोच नहीं करना चाहिए कि उसके पास भी तिब्बत से लेकर ताइवान तक ऐसे मसले हैैं जिन पर वह मुखर हो सकता है। भारत के पास चीन को नसीहत देने के लिए हांगकांग का भी मसला है और उइगर मुसलमानों के उत्पीड़न का भी। इसके साथ ही दक्षिण चीन सागर का भी मामला है। इस पर तो दुनिया के बड़े देश भी भारत के साथ हैैं।

चीन यह मानकर नहीं चल सकता कि वह भारत से अपनी शर्तों पर रिश्ते कायम कर सकता है। वह इस समय तो ऐसा और भी नहीं कर सकता, क्योंकि एक तो उसकी अर्थव्यवस्था ढलान पर है और दूसरे, अमेरिकी प्रतिबंधों के चलते उसकी मुश्किलें बढ़ रही हैैं। ऐसे में उचित यही है कि चीन मतभेद वाले मसलों को किनारे कर उन मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करे जो एक-दूसरे के लिए हितकारी होने के साथ आपसी भरोसे को बढ़ाने वाले भी साबित हों। भरोसा बढ़ेगा तो मतभेद वाले मसले भी कम होंगे।

Posted By: Bhupendra Singh

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