जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 की बहाली की मांग करने वाले कश्मीर आधारित राजनीतिक गुटों की ओर से तथाकथित गुपकार गठबंधन का गठन उसी तरह की एक शरारत भरी कवायद है, जैसे हुर्रियत कांफ्रेंस के नाम पर की गई थी। इस गुपकार गठबंधन का भी वही हश्र होगा, जो आतंकपरस्त हुर्रियत कांफ्रेंस का हुआ, क्योंकि उसके नेता और खासकर फारूक अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती भी पाकिस्तान एवं चीन की भाषा बोल रहे हैं और वह भी निहायत बेशर्मी के साथ। गुपकार गठबंधन के अध्यक्ष के रूप में फारूक अब्दुल्ला का यह कहना देश-दुनिया की आंखों में धूल झोंकने के अलावा और कुछ नहीं कि हम भाजपा विरोधी हैं, देश विरोधी नहीं। महबूबा और अब्दुल्ला बड़ी चतुराई से यह भूल रहे हैं कि अनुच्छेद 370 को खत्म करने का फैसला संसद ने लिया था और वह भी दो तिहाई बहुमत से।

आखिर ऐसे किसी फैसले के विरोध में खड़े होकर चीन की मदद लेने अथवा भारतीय ध्वज को न उठाने की बातें करने वाले किस मुंह से यह कह सकते हैं कि वे राष्ट्रविरोधी नहीं हैं? ये हरकतें तो साफ तौर पर राष्ट्रविरोधी ही हैं। फारूक अब्दुल्ला यह भी सफाई दे रहे हैं कि उनकी लड़ाई मजहबी नहीं है, लेकिन उनका रुख-रवैया यही साबित कर रहा है कि वह हुर्रियत कांफ्रेंस की तरह से अपनी अलगाववादी राजनीति को मजहबी रंग दे रहे हैं। वास्तव में इसी कारण वह जम्मू क्षेत्र के लोगों की आकांक्षाओं की कहीं कोई परवाह नहीं कर रहे हैं।

केवल कश्मीर आधारित राजनीतिक गुटों की ओर से संविधान के अस्थायी अनुच्छेद 370 की वापसी का राग अलापना यही बताता है कि वे घाटी को देश और यहां तक कि जम्मू से भी अलग मानते हैं। उनके इस मुगालते को दूर करने की सख्त जरूरत है कि कश्मीर उनकी जागीर है। वैसे भी इन गुटों और खासकर नेशनल कांफ्रेंस और पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी ने कश्मीर को लूटा ही है। इस लूट-खसोट से कश्मीर की जनता भी अवगत है। वह इससे भी परिचित है कि ये गुट जब सत्ता में होते हैं तो किस तरह देश, संविधान की बातें करते हैं और सत्ता से बाहर होने पर पाकिस्तान की भाषा बोलने लगते हैं।

गुपकार गठबंधन के नेताओं को जितनी जल्दी यह समझ आए तो अच्छा कि यह देश किसी भी कीमत पर 370 की वापसी के लिए सहमत नहीं हो सकता, क्योंकि उसने अलगाव, अन्याय और आतंक के बीज बोने के अलावा और कुछ नहीं किया। फारूक अब्दुल्ला कितनी ही लीपापोती करें, देश उन्हेंं माफ नहीं कर सकता, क्योंकि उन्होंने भारत की ओर आंख उठाने वाले चीन की खुली तरफदारी करके लोगों का सम्मान हमेशा के लिए खो दिया है।

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