सदियों की प्रतीक्षा के उपरांत अयोध्या में राम मंदिर निर्माण का शुभारंभ एक देवालय की स्थापना का आयोजन मात्र नहीं है। यह राष्ट्र की अभिलाषा का प्रकटीकरण है। यह भारतीयता के उत्कर्ष का नया प्रस्थान बिंदु है। यह हजारों साल पुरानी हमारी संस्कृति और सभ्यता का गौरव गान है। इस मंदिर के निर्माण का शुभारंभ देश की आध्यात्मिक-सांस्कृतिक-सामाजिक चेतना को स्पंदित और अनुप्राणित करने वाला है और इसीलिए कोरोना संकट के बाद भी चहुंओर हर्ष और उल्लास है। श्रीरामजन्मभूमि मंदिर एक राष्ट्र के रूप में स्वयं को जानने की प्रक्रिया का अनुष्ठान भी है और भारत की आहत सभ्यता को संतोष-संबल देने का उपक्रम भी। यह जन-जन के स्वाभिमान का प्रतीक भी है और अपमान का प्रतिकार भी। यह देश की संकल्पशक्ति का उद्घोष भी है और सबके कल्याण की कामना का रेखांकन भी। यह भारतीय मूल्यों और आदर्शों के प्रति प्रतिबद्धता का परिचय भी है और साथ ही हर संकट से पार पाने की अदम्य इच्छाशक्ति का प्रदर्शन भी।

राम के जन्म स्थल पर उनके नाम के मंदिर के निर्माण के लिए भारतीय समाज ने लगभग पांच सौ वर्ष संघर्ष किया। इस लंबी अवधि में स्वतंत्रता के बाद का कालखंड भी है। यही तथ्य कहीं अधिक पीड़ादायी है। इससे अधिक कष्टकारी और क्या हो सकता है कि राष्ट्र अपने आराध्य के जन्म स्थल के साथ हुए भीषण अन्याय का प्रतिकार नहीं कर सका? आखिर इसे जनाकांक्षा के निरादर के अतिरिक्त और क्या कहा जा सकता है? यह निरादर जिस संकीर्ण और घोर नकारात्मक राजनीति के कारण हुआ उसके अवशेष अभी भी उपस्थित हैं। तथाकथित धर्मनिरपेक्ष राजनीति एक ढोंग के अलावा और कुछ नहीं। समस्त राष्ट्र को इस पर गहन चिंतन करना चाहिए कि आखिर इस विषैली राजनीति को इतनी महत्ता क्यों मिली? इससे बड़ी विडंबना और कोई नहीं कि सर्वे भवंतु सुखिन: की मान्यता की अनदेखी कर विभेदकारी सेक्युलरिज्म को महत्व दिया गया।

इस सेक्युलरिज्म ने न केवल धर्म अर्थात कर्तव्य की अवधारणा को तिरोहित किया, बल्कि तुष्टीकरण की घातक राजनीति को पोषण प्रदान किया। सबसे दुर्भाग्यपूर्ण यह रहा कि इसने धर्म के साथ-साथ सत्य को भी नीचा दिखाने की कुचेष्टा की और वह भी इस हद तक कि राम को काल्पनिक बताया गया और उनके होने के प्रमाण मांगे गए। राम के अस्तित्व को नकारने वाली इस दूषित राजनीति के बचे-खुचे अवशेषों से मुक्ति पाने के लिए जो कुछ भी संभव है, वह किया जाना चाहिए। इसलिए और भी, क्योंकि यह विजातीय अवधारणा न केवल भारतीयता को नकारती है, बल्कि भारत के उदात्त जीवन मूल्यों को नीचा दिखाती है। जो राष्ट्र अपने मूल्यों को नकारता है और उनसे प्रेरणा लेना से इन्कार करता है वह वैचारिक-मानसिक रूप से खोखलेपन की ओर ही बढ़ता है। राम मंदिर निर्माण की प्रक्रिया इस पर विराम लगाने और सनातन भारत के मूल्य- महत्व को नए सिरे से स्थापित करने वाली है।

अयोध्या में आकार लेने जा रहे राम मंदिर के माध्यम से एक समरस, समृद्ध और सक्षम भारत के निर्माण की आकांक्षा को बल मिले, इसकी हर किसी को न केवल कामना करनी चाहिए, बल्कि अपने-अपने स्तर पर इसके लिए कोशिश भी करनी चाहिए। इसका दायित्व उन पर अधिक है जो नेतृत्व की भूमिका में हैं। राम मंदिर का निर्माण राष्ट्र निर्माण का पर्याय भी बनना चाहिए- एक ऐसा राष्ट्र जिसकी परिकल्पना रामराज्य में है और जिसका लक्ष्य है प्राणि मात्र का कल्याण। राम मंदिर केवल भव्य ही नहीं होना चाहिए, बल्कि उसे भारतीय समाज और विशेष रूप से हिंदू समाज की खामियों को दूर करने का सशक्त माध्यम भी बनना चाहिए।

राम मंदिर निर्माण के शुभारंभ के साथ ही भारतीय समाज में आशा और उत्साह के साथ जिस आत्मविश्वास का संचार हुआ है उसका उपयोग उन कुरीतियों को दूर करने में अवश्य किया जाए जो भारतीय समाज में व्याप्त हैं और जिनके चलते रामराज्य का सुंदर सपना साकार होने में अवरोध दिखाई देते हैं। राम के जीवन में, उनके दर्शन में और साथ ही अनगिनत राम कथाओं में जिस कल्याणकारी समाज की कल्पना है उसे जमीन पर उतारना उन सबका ध्येय होना चाहिए जो राम मंदिर को आकार लेते हुए देखने के लिए प्रतीक्षारत हैं। इससे ही इस मंदिर की भव्यता और बढ़ेगी।

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