चुनाव नतीजे आने के पहले ही विपक्षी दलों के विभिन्न नेताओं के बीच मेल-मिलाप तेज होना हैरान करने वाला है। मतदान का आखिरी चरण संपन्न होने के पहले ही आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू अखिलेश यादव और मायावती से तो मिले ही, उन्होंने सोनिया गांधी और राहुल गांधी से भी मुलाकात की। इसके बाद वह राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के प्रमुख शरद पवार से भी मिले। उनके इस सघन संपर्क अभियान के बीच ऐसी खबरें हैं कि बसपा प्रमुख मायावती संप्रग अध्यक्ष सोनिया गांधी से मुलाकात कर सकती हैं। इसमें कोई हर्ज नहीं, लेकिन क्या यह वही मायावती नहीं जिन्होंने उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को अपने गठबंधन में शामिल करने से इन्कार करने के साथ ही उसे सार्वजनिक रूप से झिड़क भी दिया था? यह बात और है कि बाद में उन्होंने कांग्रेस के गढ़ में जाकर उसके लिए वोट भी मांगे।

गठबंधन की राजनीति के नाम पर केवल इतना ही नहीं हुआ। इसके अतिरिक्त अन्य अनेक ऐसे काम हुए जिनसे जनता के बीच न केवल भ्रम फैला, बल्कि उसके बीच यह संदेश भी गया कि विपक्षी दल अपनी एकजुटता को लेकर गंभीर नहीं हैं। इसकी भी अनदेखी नहीं की जा सकती कि विपक्षी एकता की जरूरत पर तमाम बल दिए जाने के बावजूद भाजपा विरोधी दल अपनी एकजुटता का सही तरह से प्रदर्शन नहीं कर सके। वे महागठबंधन बनाने को लेकर बड़ी-बड़ी बातें और साथ ही बैठकें तो करते रहे, लेकिन कोई ठोस विकल्प देने की रूपरेखा तैयार नहीं कर सके।

अपने देश में यह एक बड़ी समस्या रही है कि विपक्षी दलों ने जब-जब एकजुट होकर सत्तारूढ़ दल को चुनौती देने का उपक्रम किया है तब-तब वे इसमें नाकाम ही रहे हैं। इस नाकामी की मूल वजह रही अपने-अपने स्वार्थ सिद्ध करने की हड़बड़ी। विपक्षी दल देश की जरूरत के नाम पर एकजुट तो होते रहे, लेकिन फिर जल्द ही बिखर भी जाते रहे। पता नहीं इस बार क्या होगा, लेकिन बेहतर यह होता कि अलग-अलग चुनाव लड़ने वाले राजनीतिक दल चुनाव नतीजों का इंतजार करते। यदि चुनाव नतीजे विपक्षी एकता की जरूरत को रेखांकित करते दिखें तो फिर भाजपा विरोधी दलों के नेताओं के लिए यह आवश्यक हो जाएगा कि वे किसी वैकल्पिक व्यवस्था के निर्माण की कोई कोशिश करें।

नतीजे आने के पहले ही उनकी सक्रियता तो यही बता रही है कि वे येन-केन-प्रकारेण सत्ता में आने के लिए बेकरार हैं। यह बेकरारी समझ आती है, लेकिन ज्यादा जरूरी यह है कि जनादेश का सम्मान किया जाए। यह ठीक नहीं कि चुनाव बाद इस या उस बहाने विभिन्न राजनीतिक दल जनादेश की मनमानी व्याख्या करते हुए एकजुट हो जाएं। नि:संदेह कई बार खंडित जनादेश की हालत में विपरीत विचारधारा वाले दलों के लिए मिलकर सरकार बनाने की बाध्यता आ जाती है, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि ऐसी किसी बाध्यता से लोकतंत्र को बल मिलता है। एक्जिट पोल के आधार पर वास्तविक चुनाव नतीजों का आकलन नहीं किया जा सकता, लेकिन इतना तो है ही कि वे संभावित झलक पेश करते हैं। यह समय बताएगा कि चुनाव नतीजे एक्जिट पोल सरीखे होंगे या उससे इतर, लेकिन विपक्षी दल यह समझें तो बेहतर कि अभी नए समीकरण बनाने का वक्त नहीं आया है।

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Posted By: Bhupendra Singh

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