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मध्य प्रदेश के व्यावसायिक परीक्षा मंडल की भर्तियों में हुए घोटाले की छानबीन करने गए एक पत्रकार और इस घोटाले की जांच में सहयोग कर रहे जबलपुर मेडिकल कालेज के डीन की 24 घंटे के भीतर संदिग्ध परिस्थितियों में मौत कई गंभीर सवाल खड़े करती है। ये सवाल इसलिए और अधिक गंभीर हो जाते हैं, क्योंकि इस घोटाले में शामिल अथवा आरोपी या गवाह रहे कई लोग संदिग्ध परिस्थितियों में मृत पाए जा चुके हैं। ऐसे लोगों की संख्या 25 से लेकर 40 तक बताई जा रही है। यदि यह संख्या 20-25 भी है तो भी अस्वाभाविक है और संदेहों को बढ़ाने वाली है। मुश्किल यह है कि इस बारे में कोई भी ठीक-ठीक जानकारी देने के लिए तैयार नहीं कि इस घोटाले से किसी भी तरह जुड़े रहे कितने लोग वास्तव में संदिग्ध परिस्थितियों में मरे हैं और कितनी मौतें स्वाभाविक रूप में हुई हैं? यह आश्चर्यजनक है कि अभी भी इस घोटाले की जांच कर रही एसटीएफ के अधिकारियों की ओर से कोई स्पष्टीकरण देने की जरूरत नहीं समझी जा रही है। यह अच्छी बात है कि देर से ही सही केंद्र सरकार इस मामले की गंभीरता समझती दिख रही है और केंद्रीय वित्तामंत्री की ओर से यह कहा गया है कि वह इस घोटाले से जुड़े लोगों की संदिग्ध हालत में मौतों की निष्पक्ष जांच कराएंगे। अच्छा हो कि जल्द ही यह तय हो जाए कि यह निष्पक्ष जांच कैसे होगी? यह संभव है कि इस मामले की जांच सीबीआइ को सौंपी जाए, लेकिन फिर इससे यह सवाल उठेगा कि क्या वह सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में हो? इसकी भी अनदेखी नहीं की जा सकती कि वर्तमान में एसटीएफ की ओर से जो जांच की जा रही है वह वहां के उच्च न्यायालय की निगरानी में हो रही है।

जरूरी केवल यह नहीं है कि इस मसले की जांच निष्पक्ष हो, बल्कि यह भी है कि वह निष्पक्ष दिखे भी। इसके लिए जो भी उपयुक्त कदम उठाने आवश्यक हैं उनमें देर नहीं की जानी चाहिए। केवल इतने से बात बनने वाली नहीं है कि जांच किसी सक्षम एजेंसी से कराने की घोषणा कर दी जाती है, क्योंकि यह देखने में आया है कि इस तरह के घपले-घोटालों की जांच कई बार जरूरत से ज्यादा लंबी खिंच जाती है। इस मसले की निष्पक्ष जांच आवश्यक ही है, लेकिन केवल संदेह और सवालों के जरिये नतीजा निकालने की जो कोशिश हो रही है उससे भी बचा जाना चाहिए। फिलहाल ऐसी प्रतीति कराई जा रही है जैसे पत्रकार और जबलपुर मेडिकल कालेज के डीन की हत्या ही की गई है, जबकि सच यह है कि इस बारे में कहीं कोई प्रारंभिक प्रमाण भी उपलब्ध नहीं हैं। इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि यह लंबे समय से चला आ रहा घोटाला है और इसकी जड़ें कहीं अधिक गहरी हो सकती हैं। यह निराशाजनक है कि राज्यों के स्तर पर इस तरह की जो भी संस्थाएं हैं वे घपले-घोटालों के लिए ही अधिक जानी जाने लगी हैं। उत्तार प्रदेश लोक सेवा आयोग में बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद के आरोप सामने आए हैं, लेकिन वैसी हलचल नहीं है जैसी होनी चाहिए। इसके पहले पंजाब लोक सेवा आयोग में भी गंभीर भ्रष्टाचार के मामले सामने आ चुके हैं। स्पष्ट है कि इस तरह की जो संस्थाएं हैं वे पारदर्शिता और जवाबदेही से काम नहीं कर रही हैं। यदि इन संस्थाओं की कार्यप्रणाली को पारदर्शी नहीं बनाया जाता तो भर्तियों में घपले-घोटाले का सिलसिला रुकने वाला नहीं है।

[मुख्य संपादकीय]

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