[ प्रदीप सिंह ]: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने साल 2017 में जब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद के लिए योगी आदित्यनाथ का चुनाव किया तो प्रदेश भाजपा में बहुत से लोगों को यह रास नहीं आया। वैसे एतराज करने वाले तो आज भी हैं, पर दुनिया के सबसे बड़े संकट से निबटने की कसौटी पर पार्टी के दोनों शीर्ष नेताओं का निर्णय खरा साबित हुआ। योगी देश के सबसे प्रभावी, ईमानदार और कठोर परिश्रमी मुख्यमंत्री साबित हुए हैं। कोरोना संकट और उससे पहले नागरिकता संशोधन कानून के प्रायोजित विरोध से वे जिस तरह निपटे उसकी प्रशंसा पूर्वाग्रह व दुराग्रह से ग्रस्त लोगों को छोड़कर, सभी करेंगे। दोनों चुनौतियों का सामना करने में उन्होंने न केवल पहल कदमी की, बल्कि नवाचार भी दिखाया।

नागरिकता कानून के विरोध में दंगा करने वालों से निपटने के योगी के तरीके मिसाल बन गए

नागरिकता कानून के विरोध में दंगा और हिंसा करने वालों से निपटने के उनके तरीके मिसाल बन गए। हाईकोर्ट की अति सक्रियता के सामने वे डटकर खड़े रहे और कानून में बदलाव से संकोच नहीं किया। इन दोनों संकटों में लोगों ने एक नए योगी आदित्यनाथ को देखा। जो लोग उनकी आलोचना में प्रशासनिक अनुभव की कमी का मुद्दा उठाते थे उन्होंने देखा कि दो-दो, तीन-तीन बार मुख्यमंत्री रहे नेता ज्यादा अपरिपक्व नजर आए।

दिल्ली से निकाले गए लाखों मजदूरों को योगी ने रातों रात हजारों बसें भेजकर सुरक्षित पहुंचाया

दिल्ली सरकार ने 27-28 मार्च की रात जब डेढ़-दो लाख मजदूरों को डीटीसी की बसों में बिठाकर उत्तर प्रदेश की सीमा पर बेसहारा छोड़ दिया तो उन्होंने रातों रात हजारों बसें भेजकर न केवल प्रदेश के, बल्कि बिहार के लोगों को भी सुरक्षित पहुंचाया। कोटा से छात्रों को लाने के मामले में उनकी पहल कदमी का सबको अनुसरण करना पड़ा। योगी आदित्यनाथ नाथ संप्रदाय के हैं। वे गोरक्ष पीठाधीश्वर हैं। नाथ संप्रदाय देश का शायद एकमात्र संप्रदाय है जिसके संस्थापक गोरखनाथ और उनके गुरु मछेंद्रनाथ ही नहीं, उनके बाद के किसी पीठाधीश्वर ने अपने को या अपने किसी गुरु को भगवान घोषित नहीं किया और न ही कभी कोई व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा दिखाई।

सिंहासन और सत्ता का लोभ नाथ संप्रदाय की संस्कृति में नहीं है

भगवान राम ने सुग्रीव को समझाते हुए कहा था, संन्यासी से अच्छा राजा और कौन हो सकता है? जिसे सिंहासन, सत्ता का लोभ न हो वही न्याय कर सकता है। सिंहासन और सत्ता का लोभ इस संप्रदाय की संस्कृति में नहीं है। यह प्रकृति योगी को विरासत में मिली है। उनका र्धािमक-सांस्कृतिक रूप तो लोगों ने देखा था, पर प्रशासक का रूप अब निखर कर आया है।

योगी ने अपनाया मोदी और शाह का यह गुरु मंत्र 

योगी ने बीस लाख करोड़ रुपये के पैकेज की घोषणा के साथ ही उसमें प्रदेश के लिए संभावनाएं तलाशने में देरी नहीं की। उन्होंने मोदी और शाह का यह गुरु मंत्र अपना लिया है कि चुनौती को अवसर में बदलो और उसके लिए विद्युत गति से युद्ध स्तर पर जुटो। दूसरे मुख्यमंत्रियों और योगी आदित्यनाथ में एक बुनियादी फर्क है। बाकी राज्यों के मुख्यमंत्री प्रवासी मजदूरों की घर वापसी को एक समस्या के रूप में देख रहे हैं, पर योगी को इसमें अवसर नजर आ रहा है। उन्हीं के शब्दों में उत्तर प्रदेश के माथे पर पलायन का जो कलंक है, उसे मिटाने का यह सर्वोत्तम अवसर है। सर्वोत्तम अवसर बताकर वे थम नहीं गए। लौटकर आने वाले प्रवासी मजदूरों के कौशल के मुताबिक वर्गीकरण करके 16 लाख का डाटा बेस तैयार हो चुका है और बाकी का हो रहा है। आठ लाख प्रवासी श्रमिकों का राशन कार्ड बन चुका है।

श्रमिकों के लिए सस्ती दर पर दुकान एवं आवास देने के लिए नीति बन रही है

श्रमिकों के लिए सस्ती दर पर दुकान एवं आवास देने के लिए नीति बन रही है। निवेशकों को आर्किषत करने के लिए श्रम कानूनों में आवश्यक सुधार पहले ही किया जा चुका है। यही कारण है कि चीन से निकलने वाली पहली कंपनी वॉन वेलेक्स ने उत्तर प्रदेश को चुना। इसके साथ ही कामगार/श्रमिक (सेवायोजन एवं रोजगार) कल्याण आयोग की युद्ध स्तर पर तैयारी हो रही है।

गांधीजी का विकास का मॉडल ग्रामीण अर्थव्यवस्था और नेहरू ने चुना विकास का सोवियत मॉडल

महात्मा गांधी ने कहा था कि पहले ग्रामीण अर्थव्यवस्था का विकास करो और उसे आत्मनिर्भर बनाओ, पर नेहरू और उनके करीबी अर्थशास्त्री ने विकास का सोवियत मॉडल चुना। बाद की सरकारें भी इसी रास्ते पर चलती रहीं। इससे गांव और किसान की उपेक्षा होती रही। परिणामस्वरूप गांवों से शहरों की ओर पलायन होने लगा। शहरों और खासतौर से बड़े शहर विकास के टापू बन गए। बिना किसी बुनियादी सुविधाओं वाली झुग्गी बस्तियां प्रवासी कामगारों की नियति बन गईं। रोजगार की तलाश में गांव से शहर आने वालों की जिंदगी दिन पर दिन बदतर होती चली गई।

देश में प्रवासी मजदूरों की संख्या 45 करोड़ है जिसमें 93 फीसद असंगठित क्षेत्र के हैं

2011 की जनगणना के मुताबिक देश में प्रवासी मजदूरों की संख्या 45 करोड़ है, जो 2001 की जनगणना से लगभग एक तिहाई ज्यादा हैं। सबसे ज्यादा मजदूर उत्तर प्रदेश और बिहार के हैं। वैसे प्रवासी मजदूर बंगाल, मध्य प्रदेश, पंजाब, राजस्थान, उत्तराखंड, झारखंड, ओडिशा से भी हैं। इन राज्यों के ज्यादातर मजदूर महाराष्ट्र, गुजरात, दिल्ली, केरल, पंजाब, तमिलनाडु और केरल जाते हैं। समस्या की विकरालता का अंदाजा इससे लगाइए कि इस 45 करोड़ में 93 फीसद असंगठित क्षेत्र के हैं, जिनका अलग से कोई डाटाबेस नहीं है।

पीएम मोदी का लोकल पर वोकल होने का नारा कोरा नारा नहीं है

केंद्र सरकार के आर्थिक पैकेज को ध्यान से देखें तो इसमें कृषि, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और कुटीर, लघु और मझोले उद्योगों पर सबसे ज्यादा जोर है। मोदी का लोकल पर वोकल होने का नारा कोरा नारा नहीं है। यह राज्यों के लिए भी संदेश है कि विकास के पुराने मॉडल को बदलो। विकास के नए टापू बनाने के बजाय आर्थिक गतिविधियों का विकेंद्रीकरण करो। इस संकट में सबसे ज्यादा सहारा गांवों ने दिया है। तो गांव को बचाना और बढ़ाना है। इसीलिए केंद्र सरकार देश में एक हजार अरबन औद्योगिक क्लस्टर का निर्माण करने जा रही है। जो गांव के करीब होंगे और शहरों जैसी सुविधा और रोजगार के अवसर देंगे।

योगी जी यूपी की अर्थव्यवस्था को एक नए पायदान पर ले जा सकते हैं

अन्य मुख्यमंत्रियों के विपरीत योगी आदित्यनाथ ने इस अवसर को लपक लिया। उनका उत्तर प्रदेश के माथे से पलायन का कलंक मिटाने का संकल्प, राज्य की अर्थव्यवस्था को एक नए पायदान पर ले जा सकता है। उन्होंने अभी तक जितने कदमों की घोषणा की है और जिन पर काम शुरू कर दिया है वे सब जमीन पर उतर गए तो रिवर्स माइग्रेशन की शुरुआत हो जाएगी।

चुनौतियों को अवसर में बदलना योगी जी का स्वभाव बन गया है

23 करोड़ की आबादी वाले प्रदेश में कोरोना के सक्रिय मरीजों की संख्या केवल 27 सौ के करीब होना बहुत बड़ी उपलब्धि है, पर योगी इन उपलब्धियों से संतुष्ट होने वालों में नहीं हैं। चुनौतियों को अवसर में बदलना उनका स्वभाव बन गया है।

( लेखक राजनीतिक विश्लेषक हैं )

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