[ राजीव सचान ]: कोरोना वायरस के संक्रमण से जूझती दुनिया कितने गंभीर संकट से दो-चार है, इसका पता इससे चल रहा कि शायद ही कोई देश ऐसा हो जो इस वायरस की चपेट में आने से बचा हो। इसके पहले ऐसे किसी संकट का स्मरण करना कठिन है जिसने पूरी दुनिया को इतने व्यापक रूप में अपनी आगोश में लेकर भयभीत और आशंकित किया हो। चूंकि कोरोना संकट ने पूरे विश्व को अपनी चपेट में ले लिया है इसलिए यह माना जा रहा है कि उससे मुक्त होने के बाद दुनिया पहले जैसी नहीं रह जाएगी-न केवल सामाजिक व्यवहार बदल जाएगा, बल्कि आर्थिक-व्यापारिक तौर-तरीके भी। विश्व व्यवस्था में बदलाव के संकेत मिलने के साथ ही यह तो दिखने भी लगा है कि समाज और सरकारें अपनी प्राथमिकताओं को लेकर नए सिरे से विचार करने को विवश हैं। इसी विवशता के कारण बार-बार यह सुनने को मिल रहा है कि अब दुनिया पहले जैसी नहीं रहेगी, लेकिन यह इतना सहज और सरल भी नहीं दिखता।

कोरोना संकट का जनक चीन कह रहा है कि वायरस किसी और देश से वुहान में आया

जब दुनिया अपने भविष्य को लेकर आशंकित है तब बहुत कुछ ऐसा हो रहा है जो यह बताता है कि स्वार्थपरता, संकीर्णता, धर्मांधता, जड़ता से आसानी से मुक्ति मिलने वाली नहीं है। जो चीन कोरोना संकट का जनक है उसका व्यवहार देखें। वह अपनी गलती मानना तो दूर रहा, उसका अहसास करने को भी तैयार नहीं। इसके बजाय वह यह दुष्प्रचार करने में लगा हुआ है कि हो न हो, कोरोना वायरस किसी और देश से वुहान में आया।

कोरोना संकट से जूझ रहे देशों की मदद करने के नाम पर चीन अपनी शर्तें थोप रहा है

चीन कोरोना संकट से जूझ रहे देशों की मदद करने के नाम पर अपनी शर्तें थोपने में लगा हुआ है। उसकी ही अड़ंगेबाजी के कारण संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में विश्वव्यापी कोरोना संकट पर चर्चा नहीं हो पाई। चूंकि विश्व व्यापार में उसका दबदबा है इसलिए दुनिया के समर्थ देश भी उसकी आलोचना करने का साहस नहीं जुटा पा रहे हैं। अमेरिका ऐसा अवश्य कर रहा है, लेकिन उसका आचरण भी उसकी प्रतिष्ठा के अनुकूल नहीं। अमेरिकी राष्ट्रपति कोरोना संकट से उबरने के लिए मित्र देशों से सहायता की उम्मीद कर रहे हैं, लेकिन उनसे पेश ऐसे आ रहे हैं जैसे वह खुद उनकी मदद कर रहे हैं।

कोरोना संकट के समय में भी पाक आतंकियों का निर्यात करने में चूक नहीं रहा

पाकिस्तान की गिनती कभी भी जिम्मेदार देश के रूप में नहीं की गई, लेकिन यह देखना भयावह है कि वह तब आतंकियों का निर्यात करने में लगा हुआ है जब खुद उसके यहां भी जीवन-मरण का संकट है। बीते दिनों भारत में घुसपैठ कर रहे पाकिस्तानी आतंकियों को रोकने की कोशिश में हमारे पांच जवान शहीद हो गए। क्या इससे घृणित और कुछ हो सकता है कि पाकिस्तान ऐसे समय भी संघर्ष विराम का उल्लंघन करने और अपने आतंकियों को भारत भेजने का मौका तलाश ले रहा है? 

तब्लीगी जमात के असहयोग रवैये ने देश को डाला संकट में 

आमतौर पर संकट-गहरे संकट के समय सब कोई अपने मतभेद भुलाकर उसका सामना करने में जुटता है और अपनी सामर्थ्य भर योगदान देता है, लेकिन देखिए कि तब्लीगी जमात वाले क्या गुल खिला रहे हैं? यह एक तर्क हो सकता है कि जनता कर्फ्यू और फिर लॉकडाउन की घोषणा हो जाने से जमातियों को दिल्ली में निजामुद्दीन स्थित अपने मरकज से निकलने का मौका नहीं मिला, लेकिन आखिर इसका क्या मतलब कि वे दिल्ली से अपने-अपने घर पहुंच जाने के बाद स्वास्थ्यकर्मियों के साथ घोर असहयोग करें। वे केवल यही नहीं कर रहे, डॉक्टरों और पुलिस पर हमले करने के साथ क्वारंटाइन होने से भी इन्कार कर रहे हैं।

तब्लीगी जमात के रवैये से लगता है कि उनका इरादा देश में कोरोना संक्रमण फैलाने का था

कुछ तो अस्पताल से भागकर पुलिस-प्रशासन की निगाह से ओझल हो जा रहे हैं। उनकी ऐसी हरकतों से यही संदेह गहराता है कि उनका इरादा कोरोना संक्रमण फैलाने का है। जमाती खुद को मजहबी बताते हैं, लेकिन उनका आचरण घोर अधार्मिक है। उन्होंने कोरोना के खिलाफ लड़ाई को कठिन बना दिया है और फिर भी यह शिकायत कर रहे हैं कि उन्हें बदनाम किया जा रहा है। यह चोरी और सीनाजोरी ही नहीं, देश को खतरे में डालने वाला काम है। लगता नहीं कि वे समझाने-बुझाने अथवा निगरानी-चौकसी की मौजूदा व्यवस्था से काबू में आएंगे। यह साफ दिख रहा कि सरकारों को तब्लीगी जमात और ऐसे ही गैर जिम्मेदार समूहों-संगठनों से निपटने के लिए कुछ और करना होगा। 

तब्लीगी जमात जैसे संगठनों से अपेक्षा रखना बेकार है कि वे संकट के समय देश के साथ खड़े होंगे

इस किस्म के दकियानूसी संगठनों से ऐसी अपेक्षा रखने का कोई मतलब नहीं कि वे संकट या फिर शांतिकाल में अपनी संकीर्णता का परित्याग करेंगे, लेकिन सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जिनसे यह अपेक्षा है कि वे इस गाढ़े वक्त संकीर्णता से ऊपर उठेंगे वे भी अपनी क्षुद्रता से बाज नहीं आ रहे हैं। कुछ नेताओं और बुद्धिजीवियों का व्यवहार देखकर तो यही लगता है कि वे संकट के इन्हीं क्षणों का इंतजार कर रहे थे ताकि देश जिन समस्याओं से दो-चार है उन्हें लेकर शासन-प्रशासन को कोस सकें।

लॉकडाउन के दौरान देश की जनता ने साथ दिया मोदी सरकार का

130 करोड़ आबादी वाला कोई देश यकायक लॉकडाउन होगा तो कुछ नहीं, कई समस्याएं उठ खड़ी होना स्वाभाविक है, लेकिन नेताओं और बुद्धिजीवियों का एक वर्ग इस नतीजे पर पहुंचने के लिए मचला जा रहा है कि लॉकडाउन का फैसला जनता को परेशान करने के लिए लिया गया। ऐसी घनघोर संकीर्णता से मीडिया का भी एक हिस्सा ग्रस्त है-देश का ही नहीं, दुनिया का भी। वह ताली-थाली बजाने और दीया-मोमबत्ती जलाने के आयोजन की खिल्ली उड़ाने के साथ यह कामना करता दिख रहा कि भारत की जनता सरकार का सहयोग करने से इन्कार कर दे। वह अव्यवस्था फैलने की बाट ही नहीं जोह रहा, बल्कि छोटी-छोटी समस्याओं को भीषण संकट के तौर पर रेखांकित कर रहा और जब इससे भी काम नहीं चल रहा तो फर्जी खबरों को भी हवा दे रहा है।

दुनिया भर में मीडिया का एक हिस्सा समस्याओं को सुलझाना तो दूर उलझाने का काम करता है

अब इसमें दोराय नहीं कि दुनिया भर में मीडिया का एक हिस्सा समस्याओं को सुलझाने में सहायक बनने के स्थान पर उन्हें उलझाने का काम करता है। वास्तव में इसीलिए यह कहना कठिन है कि कोरोना से मुक्त दुनिया एक बेहतर दुनिया होगी।

( लेखक दैनिक जागरण में एसोसिएट एडीटर हैं )

Posted By: Bhupendra Singh

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