हर्ष वी. पंत। चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग घरेलू सत्ता पर बड़ी तेजी से अपनी पकड़ को और मजबूत बना रहे हैं। इसके साथ ही वह चीन की बहुप्रचारित व्यापक शक्ति के प्रदर्शन में भी जुटे हैं। चीनी तिकड़में जितनी आक्रामक हो रही हैं, रणनीतिक विस्तार के लिए बीजिंग की महत्वाकांक्षाएं उतनी ही जटिल होती जा रही हैं। शी दुनिया को यही जताना चाहते हैं कि महाशक्ति के रूप में अंतत: चीन का उदय हो चुका है, परंतु दुनिया की दिलचस्पी इसमें अधिक है कि यह उभार किस प्रकार हो रहा है?

आसियान देशों के साथ संवाद में चीन की प्रतिबद्धता

कुछ दिन पहले ही चीन ने आसियान देशों के साथ संवाद संबंधों के तीन दशक पूर्ण होने पर एक विशेष वर्चुअल कार्यक्रम आयोजित किया। उसमें शी ने दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों को आश्वासन देने का प्रयास किया कि चीन अपने छोटे पड़ोसी देशों को कभी परेशान नहीं करेगा। सम्मेलन में उन्होंने जोर देकर कहा, ‘चीन हमेशा से आसियान का अच्छा पड़ोसी, मित्र और सहयोगी था, है और रहेगा।’ चीनी राष्ट्रपति यह जताने में लगे थे कि चीन आसियान की एकता और स्थायित्व का हिमायती होने के साथ-साथ क्षेत्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय मामलों में उसकी व्यापक भूमिका का समर्थन भी करता है।

कोरोना संकट में चीन ने आसियान देशों की मदद की

चूंकि चीन ने आसियान देशों को कोरोना संकट से निपटने के लिए वित्तीय संसाधन और टीके उपलब्ध कराए थे, इसलिए जब उनके साथ तीस वर्षो के कूटनीतिक एवं आर्थिक रिश्तों का जश्न मनाने का मौका हो तो उस अवसर पर डराने-धमकाने जैसे मुद्दों की चर्चा बेमानी लगती है। इसके बावजूद सच यही है कि उसके सभी रिश्तों में दादागीरी-दबंगई का भाव है। आसियान देश भी छिटपुट तरीकों से उससे छुटकारे की फिराक में हैं।

म्यांमार के मुखिया को सत्र में भाग लेने की अनुमति से असियान नेता का इनकार

आसियान नेता चीन के इस दबाव में नहीं झुके कि म्यांमार सैन्य तानाशाही के मुखिया को सत्र में भाग लेने की अनुमति दी जाए और म्यांमार को एक गैर-राजनीतिक प्रतिनिधि भेजने पर बाध्य किया जाए। सम्मेलन के बाद जारी संयुक्त बयान में अंतरराष्ट्रीय कानूनों के अनुपालन की महत्ता को भी रेखांकित किया गया। इनमें संयुक्त राष्ट्र समुद्री कानून संधि (1982) को सम्मान के साथ-साथ दक्षिण चीन सागर में मुक्त आवाजाही और उसके ऊपर से उड़ानों को अनुमति देने की प्रतिबद्धता भी दोहराई। यह हिंदू-प्रशांत को लेकर आसियान के नजरिये के अनुरूप ही है, जिसका एक भौगोलिक इकाई के रूप में चीन लगातार विरोध करता आया है। इस क्षेत्र में चीन को लेकर उसके कुछ निकट सहयोगियों के नरम रवैये का जमीनी स्तर पर शायद ही कुछ असर दिखे।

दक्षिण चीन सागर में चीनी आक्रामकता निरंतर जारी

दक्षिण चीन सागर में चीनी आक्रामकता निरंतर जारी है। छल-प्रपंच से जुड़ी अपनी तिकड़मों के जरिये वह विवादित जल क्षेत्र में अपने हवा-हवाई दावों को दोहरा रहा है। उसकी इस रणनीति के खिलाफ पीड़ित देशों के पास अभी तक कोई कारगर तोड़ नहीं। विवादित क्षेत्रों में चीन सैन्य दस्तों का धड़ल्ले से इस्तेमाल कर रहा है। यहां तक कि इलाकों पर कब्जे के ऐसे निर्लज्ज प्रयासों के खिलाफ आसियान देशों को एक संयुक्त मोर्चा बनाना मुश्किल पड़ रहा है। जिस दिन शी कह रहे थे कि चीन छोटे पड़ोसी देशों को तंग नहीं करेगा, उससे कुछ दिन पहले ही उनके तटरक्षक दस्ते विवादित जल क्षेत्र में फिलीपींस सेना की आपूर्ति से जुड़ी नौकाओं की राह रोकने में लगे थे। वे जहाजों पर वाटर कैनन का इस्तेमाल कर रहे थे। जहां फिलीपींस ने सम्मेलन में इस मुद्दे को उठाया, वहीं अन्य देशों ने मौन रहना ही मुनासिब समझा।

चीन ताइवान के खिलाफ हमेशा रहा मुखर

जहां तक इस प्रकार के छद्म युद्ध की बात आती है तो चीन ताइवान के खिलाफ अपनी इस मुहिम को मुखरता से आगे बढ़ाता दिखता है। पिछले कुछ दिनों में ताइवान के दक्षिण-पश्चिम हिस्से में चीनी वायुसेना के विमानों ने बार-बार घुसपैठ की है। यह इलाका ताइवान नियंत्रित प्रतास द्वीप के निकट है। यह न केवल ताइवान की रक्षा पंक्ति की परीक्षा लेने के लिए किया जा रहा है, बल्कि इसके माध्यम से अमेरिकी सहयोग की सीमा-रेखा को भी परखा जा रहा है। ताइवान स्ट्रेट में तनाव भड़काने के इस खतरनाक खेल में बीजिंग इस क्षेत्र में सुरक्षा साझेदार के रूप में वाशिंगटन की साख को चुनौती दे रहा है।

कई देशों में कोरोना के नए प्रतिरूप ओमिक्रोन की दस्तक के साथ दुनिया को इस चीनी वायरस से मुक्ति मिलने की हाल-फिलहाल कोई राह नहीं दिख रही है। उसे देखते हुए मूल कोरोना वायरस के उद्गम को लेकर चीन की भूमिका एक बड़ी बहस का बिंदु बनी हुई है। ऐसे में कोरोना को लेकर चीन की शुरुआती प्रतिक्रिया पर एक तरह से निशाना साधते हुए अमेरिका ने ओमिक्रोन की त्वरित पहचान और दुनिया के साथ उसकी जानकारी साझा करने पर दक्षिण अफ्रीका की भूरि-भूरि प्रशंसा करने में देरी नहीं की।

अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन की प्रतिक्रिया से यह प्रत्यक्ष साबित होता है। उन्होंने दक्षिण अफ्रीकी विज्ञानियों द्वारा ओमिक्रोन की तत्काल पहचान और वहां की सरकार द्वारा उससे संबंधित जानकारियों को तुरंत साझा करने में प्रदर्शित की गई पारदर्शिता की सराहना करते हुए कहा कि यह विश्व के लिए एक मिसाल बननी चाहिए। उन्होंने चीन का नाम भले न लिया, लेकिन उनका संकेत स्पष्ट था, क्योंकि चीन कोरोना के उद्गम को लेकर पारदर्शिता का परिचय देने में नाकाम रहा। यह पहलू निकट भविष्य में चीन को लेकर वैश्विक नजरिये को आकार देने में प्रभावी भूमिका निभाता रहेगा।

घरेलू मोर्चे पर शी चिनफिंग एक सम्राट के रूप में परिवर्तित हो रहे हैं। हाल में चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के ऐतिहासिक प्रस्ताव में उनके तीसरे पंचवर्षीय कार्यकाल को औपचारिक स्वीकृति दे दी गई। उन्हें कार्ल मार्क्‍स और माओत्से तुंग जैसे समाजवादी विचार के दिग्गज प्रवर्तकों की पांत में रखा जा रहा है। सत्ता की ताकत से वह चीन में अपने विरोधियों को हाशिये पर धकेल रहे हैं, परंतु चीनी सीमा से बाहर उनकी शक्ति अभी भी मान्यता की प्रतीक्षा में है। यदि चीनी शक्ति का उद्देश्य निर्विवाद वैश्विक नेता के रूप में उभरना है तो पिछले कुछ समय के दौरान विभिन्न मोर्चो पर उसकी जो गतिविधियां देखने को मिली हैं, उनसे शी को अपना वैश्विक एजेंडा पूरा करना मुश्किल होगा। धीरे-धीरे ही सही, लेकिन शी का एजेंडा उजागर तो हो रहा है और यह तय है कि निरंकुश ताकत उनके व्यापक लक्ष्य की पूर्ति करने में सक्षम नहीं होगी।

(लेखक नई दिल्ली स्थित आब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में रणनीतिक अध्ययन कार्यक्रम के निदेशक हैं)

Edited By: Pooja Singh

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