[डॉ. अजय खेमरिया]। World Health Day 2020: समग्र विश्व आज कोरोना की भयावह महामारी से उबरने के लिए संघर्षरत है। भारत भी अपनी पूरी क्षमता के साथ इस आपदा से जूझ रहा है। हालांकि हमारे पास कुछ अन्य विकसित देशों के मुकाबले संसाधन बहुत कम हैं, फिर भी हम अपने मौजूदा स्वास्थ्य ढांचे में किस तरह से बदलाव ला सकते हैं, इस बारे में भी हमें सोचना होगा।

भारतीय नागरिकों को आरोग्य प्रदान करना : फिलहाल राज्यों के स्वास्थ्य मंत्रालय अलग हैं, केंद्र का अलग। दोनों सरकारों के मेडिकल कॉलेज भी अलग हैं।एम्स यानी अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान अलग कानून के दायरे में है। ईएसआइसी, सार्वजनिक उपक्रम, पुलिस, आर्मी, पैरा मिलिट्री फोर्स, रेलवे, नेवी व एयर फोर्स समेत विविध नगरीय निकायों के अलग अलग अस्पताल, मेडिकल कॉलेज व शोध संस्थान और परिचालन नियम हैं। इन सबकी स्थापना का उद्देश्य भारतीय नागरिकों को आरोग्य प्रदान करना है।

राज्यों के प्रदर्शन को हम राजनीतिक तौर पर टीका-टिप्पणियां करके नही छोड़ सकते हैं। अगर तमिलनाडु और केरल के मानक उच्च हैं तो बिहार और उत्तर प्रदेश को केवल बीमारू तोहमत लगाकर जवाबदेह लोग किनारा कैसे कर सकते हैं? कोरोना संकट से उबरने के बाद इस बात पर सहमति बनानी होगी जन स्वास्थ्य को केंद्रीय सूची में लाया जाए। लोक स्वास्थ्य, परिवार कल्याण और चिकित्सा शिक्षा को एक किया जाए। मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया, जो अब आयोग बन चुका है, देश में चिकित्सा शिक्षा की नियामक संस्था के रूप में काम कर सकती है तो देश भर में मेडिकल कॉलेजों के संचालन के लिए केंद्रीय निकाय क्यों निर्मित नहीं किया जा सकता है।

देश भर में ग्रामीण इलाकों के लिए डॉक्टर्स की उपलब्धता : देश मे कार्डियक डॉक्टर तो बड़ी संख्या में बढ़ रहे हैं, लेकिन कैंसर और नेफ्रोलॉजी के चिकित्सकों की संख्या गिनती की है, क्योंकि इस मामले में न पीजी सीट्स पर्याप्त हैं, न किसी एम्स जैसे संस्थानों में शोध की व्यवस्था, जबकि इनसे जुड़े मरीज करोड़ों में बढ़ रहे हैं। केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत हर जिला अस्पताल में कैंसर और डायलिसिस यूनिट स्थापित कर दी, राज्य सरकारों ने बढ़िया बिल्डिंग और मशीनरी भी उपलब्ध करा दी, लेकिन 80 फीसद केंद्र आज दक्ष स्टाफ और डॉक्टर के अभाव में काम नहीं कर रहे हैं। बेहतर होगा कि देश भर के जिला अस्पतालों को केंद्र सरकार सीधे अपने नियंत्रण में लेकर उन्हें मेडिकल कॉलेजों में तब्दील कर दे। ऐसा करने से देश भर में ग्रामीण इलाकों के लिए डॉक्टर्स की उपलब्धता बढ़ेगी।

इंग्लैंड में पीजी डॉक्टर्स लगभग ढाई साल अस्पतालों में काम करते हैं और एक निर्धारित समय पर मेडिकल कॉलेजों में थ्योरी क्लास लेने के लिए जाते हैं। शेष समय ग्रामीण इलाकों में एमबीबीएस के बाद सेवाएं देते हैं। व्यवहार में मेडिकल कॉलेजों में अधिकतर काम जूनियर डॉक्टर ही करते हैं, इसलिए सबसे पहले जिला अस्पतालों में पांच सौ बिस्तर के हिसाब से मेडिकल कॉलेज स्वीकृत किए जाएं। यहां पहले से पदस्थ विशेषज्ञ चिकित्सकों को फैकल्टी के रूप में अधिमान्य किया जा सकता है।

चार लाख एमबीबीएस डॉक्टर्स की कमी : मोदी सरकार ने 2014 के बाद से 75 नए मेडिकल कॉलेजों को इसी तर्ज पर देश भर में स्वीकृत किया है। फिलहाल देश में विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानक के अनुरूप लगभग चार लाख एमबीबीएस डॉक्टर्स की कमी है। इस कमी को दूर करने के लिए नए मेडिकल कॉलेज खोलने के खर्चीले प्रावधान के स्थान पर सभी जिलों के सरकारी अस्पताल को कॉलेजों में तब्दील करने से बेहतर कोई अन्य विकल्प नहीं है। अच्छी बात है केंद्र सरकार ने इस प्रक्रिया को शुरू भी कर दिया है, लेकिन अभी काफी कुछ किए जाने की दरकार है। जैसे चरणबद्ध तरीके से यहां यूजी व पीजी की सीटें बढाई जा सकती हैं। साथ ही दूसरे सरकारी निकायों के सुविधायुक्त अस्पतालों को भी एकीकृत विभाग के अधीन लाकर मेडिकल कॉलेजों में रूपांतरित किया जा सकता है।

केंद्र सरकार स्वास्थ्य महकमे का संचालन इसके व्यापक पुनर्गठन के साथ कर सकती है। वैसे भी केंद्र अभी नीट और एमसीआइ के माध्यम से देशव्यापी एकाधिकार तो इस क्षेत्र में रखता ही है। इसलिए व्यापक संवाद के बाद राज्यों को इस नीतिगत बदलाव के लिए राजी किया जा सकता है। राज्य अक्सर केंद्रीय मदद में भेदभाव और अपर्याप्त आवंटन की शिकायतें करते रहते हैं। नई नीति में डॉक्टर्स का अखिल भारतीय सेवा संवर्ग स्थापित कर विशेषज्ञ चिकित्सकों को इंग्लैंड की तर्ज पर ग्रेडिंग सिस्टम देकर फैकल्टी, विशेषज्ञ आदि के रूप में नियुक्त किया जाना चाहिए। पीजी के लिए तीन साल की अवधि में न्यूनतम ढाई साल ग्रामीण और कस्बाई स्वास्थ्य संस्थान में पदस्थापन को अनिवार्य किए जाने से सबको आरोग्य का लक्ष्य भी हासिल होगा।

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन ने छह मार्च को लोकसभा में बताया कि मोदी सरकार ने छह वर्षों के दौरान 29,185 सीटें स्नातक में बढ़ाई हैं। वर्तमान में एमबीबीएस की 80,448 और पीजी की 40,408 सीट देश में उपलब्ध है। भारत सरकार के पास देश में कुल कार्यरत एलोपैथिक डॉक्टरों का आंकड़ा तक उपलब्ध नहीं है। लोकसभा में दिए गए एक जवाब के अनुसार भारतीय चिकित्सा परिषद में केवल 52,666 के पंजीयन हैं। ये कहां काम कर रहे हैं इसकी सूचना सरकार के पास नहीं है। दूसरी तरफ राज्य चिकित्सा परिषदों में मिलाकर कुल पंजीकृत डॉक्टरों की संख्या 12,01,354 है। सरकार भी मानती है कि इनमें से केवल नौ लाख 61 हजार ही सक्रिय हैं। समझा जा सकता है भारत में एकीकृत चिकित्सा निगरानी तंत्र की कितनी आवश्यकता है। बेहतर होगा कि एलोपैथी के साथ होम्योपैथी, आयुर्वेद और यूनानी चिकित्सा पद्धति को भी एकीकृत स्वास्थ्य विभाग के अधीन लाकर सरकार उपलब्धता के आधार पर एक ही परिसर में इन सभी सुविधाओं को सुनिश्चित करे।

जैसे कि हर संकट कोई न कोई सबक सिखाकर जाता है वैसे ही हमें कोरोना आपदा से सीख लेनी चाहिए। राहत की बात है कि फिलहाल देश में इसका विकराल रूप देखने को नहीं मिल रहा है और प्रत्येक स्तर पर इसे काबू करने की कवायद की जा रही है। फिर भी हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठा जा सकता। इस मौजूदा संकट और भविष्य की ऐसी किसी विपदा से निपटने के लिए हमें अपने स्वास्थ्य ढांचे को समय रहते चुस्त-दुरुस्त करना होगा। इसके लिए एक राष्ट्रीय नीति बनानी होगी।

[स्वतंत्र टिप्पणीकार]

Posted By: Sanjay Pokhriyal

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