बिहार विधानसभा चुनाव के आते ही चुनावी जुमलों की चासनी लोकतांत्रिक राजनीति के पकवान को गाढ़ा करने लगी है। बिहार के शहर-कस्बों, गांव देहातों, गली-मोहल्लों में बजने वाले गीतों, जुमलों व शाब्दिक युद्ध ने चुनावी राजनीति को दिलचस्प बना दिया है। एक तरफ भाजपा के समर्थन में मनोज तिवारी की आवाज में गाए प्रचार गीत 'इस बार बीजेपी एक बार बीजेपी' व 'बीजेपी करेगी पहला काम जंगलराज पर पहला विराम'जैसे जुमले से महागठबंधन को घेरने व जनता में अपनी वैधता स्थापित करने की कोशिश की जा रही है वहीं इसके जवाब में सुशासन बाबू नीतीश कुमार के समर्थन में स्नेहा खानवलकर द्वारा गाए गीत 'बिहार में बहार हो नीतीश कुमार हो' या फिर 'बहुत हुआ जुमलों का वार फिर एक बार नीतीश कुमार' लोगों की जुबान पर चढ़ कर बोलने लगा है। राजद सुप्रीमो लालू यादव भी रोजगार के मुद्दे पर मोदी सरकार को घेरते हुए 'युवक-युवती भरे हुंकार कहां गया हमारा रोजगार' का नारा दे रहे हैं। इस क्रम में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री को जहां हवाबाज कहा वहीं पलटवार करते हुए मोदी ने कांग्रेस पार्टी को हवालाबाज तक की संज्ञा दे डाली। आखिर इन जुमलों में ऐसा क्या है कि मतदाता प्रभावित-आकर्षित हो जाते हैं। क्या सचमुच इन जुमलों में इतनी कुव्वत होती है कि वे राजनीतिक हवा बदल सकें? देखा जाए तो हिंदुस्तान की राजनीति में शुरुआती दिनों से ही जुमलों का प्रयोग होता आया है। शुरुआती तीन-चार आम चुनावों में हालांकि जुमलों का प्रयोग बहुत कम देखा गया, क्योंकि तब तक कांग्रेस के अतिरिक्त और कोई था ही नहीं। बावजूद इसके नेहरू को घेरने के लिए हिंदुस्तानी भोजपुरी पट्टी में जनता जनार्दन के बीच 'कब लइबो हमरी खबरिया, हो जवाहर भईया' जुमला खासा लोकप्रिय था। इसी समय नेहरू ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का रुतबा बढ़ाने के उद्देश्य से हिंदी चीनी भाई भाई का नारा दिया।

1965 में खाद्य संकट के मद्देनजर तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने जय जवान जय किसान का नारा दिया, जिसे 1998 में प्रधानमंत्री वाजपेयी ने पोखरण विस्फोट के वक्त जोड़ते हुए जय जवान जय किसान जय विज्ञान तक बढ़ाया। 1971 में इंदिरा गांधी के गरीबी हटाओ के जुमले को भुलाया नहीं जा सकता। आपातकाल के बाद विपक्ष ने एकजुट होकर 'इंदिरा हटाओ, देश बचाओ' का नारा दिया था। इसी समय जनकवि नागार्जुन ने 'इंदू जी इंदू जी क्या हुआ आपको, सत्ता के मद में भूल गई बाप को' कहकर इंदिरा गांधी की आलोचना की थी। आपातकाल के दिनों में जयप्रकाश नारायण ने डरो मत! मैं अभी जिंदा हूं का नारा दिया था।

इंदिरा की ताकतवर शख्सियत के मद्देनजर देवकांत बरुआ ने इंदिरा इज इंडिया, इंडिया इज इंदिरा का नारा दिया था। 1980 में हुए आम चुनाव में इंदिरा लाओ देश बचाओ का जुमला उछाला गया तो 1984 में इंदिरा गांधी की मौत के बाद हुए चुनाव में कांग्रेस पार्टी ने जब तक सूरज चांद रहेगा, इंदिरा तेरा नाम रहेगा के साथ भावनात्मक रूप से जनता को अपने साथ बांधा। इस भावनात्मक अपील का प्रभाव यह हुआ कि कांग्रेस पार्टी ने अपने संसदीय इतिहास में सबसे अधिक सीटें हासिल कीं। नब्बे का दशक हिंदुस्तानी चुनाव में क्षेत्रीय दलों के प्रचंड उभार के साथ-साथ जुमलों, नारों, गीतों के अतिरेक का भी रहा है। हिंदी पट्टी की राजनीति में यही समय था जबकि तीन एम यानी मंदिर, मंडल व मार्केट का उभार हुआ। राम लला के मंदिर के निर्माण के प्रति प्रतिबद्ध दल भाजपा ने 'मंदिर वहीं बनाएंगे, हम कसम राम की खाते हैं' के नारे के साथ हिंदुस्तानी राजनीति में हिंदूवादी विचारधारा को बल प्रदान किया। वहीं दूसरी तरफ मंडलवादी राजनीति के गर्भ से निकले क्षेत्रीय दलों के क्षत्रपों मसलन लालू, मुलायम सिंह ने जुमलों से पूरी राजनीति को गरमा दिया। सपा ने 'चलेगी साइकिल, उड़ेगी धूल, ना रहेगा पंजा ना रहेगा फूल' का नारा देते हुए कांग्रेस व भाजपा दोनों को ही उत्तर प्रदेश में खुलकर ललकारा। वहीं अपने देशज व गंवई शैली के लिए प्रसिद्ध लालू यादव ने एक रैली में 'लाठी उठावन, तेल पिलावन, भाजपा भगावन' का नारा दिया। इसी तरह 'जब तक रहेगा समोसे में आलू तब तक रहेगा बिहार में लालू' खासा चर्चित हुआ। दलित राजनीति पर केंद्रित कांशीराम व मायावती की पार्टी बसपा ने 'वोट से लेंगे पीएम-सीएम, आरक्षण से लेंगे एसपी-डीएम' का नारा दिया। बसपा के एक और नारे ने समाज के ब्राह्मणवादी, वर्णवादी व्यवस्था पर करारी चोट की थी। इसी समय भाजपा ने 'अबकी बारी अटल बिहारी' का नारा दिया तो कांग्रेस ने 'जात पर ना पात पर मोहर लगाओ हाथ पर' का कार्ड खेला। इसके कुछ सालों बाद ही भाजपा ने तेरह दिन, तेरह महीने अब तेरह साल का नारा देकर सत्ता की बागडोर अपने हाथ में ली। 2004 के संसदीय चुनाव में जहां भाजपा एक तरफ इंडिया शाइनिंग व फील गुड फैक्टर के साथ चुनाव लड़ रही थी वहीं कांग्रेस ने अपने आपको आम आदमी से जोड़ते हुए कांग्रेस का हाथ आम आदमी के साथ का नारा दिया।

2009 के चुनाव में भाजपा ने आडवाणी को प्रधानमंत्री के रूप में पेश करते हुए मजबूत नेता, निर्णायक सरकार का नारा चलाया, लेकिन जुमलों के सहारे विकल्प पेश करने में आडवाणी विफल रहे। 2014 के चुनाव में भाजपा की कमान संभाल चुके नरेंद्र मोदी के लिए विशेष रूप से हर-हर मोदी, घर-घर मोदी का नारा दिया गया। दिल्ली विधानसभा चुनावों में भाजपा ने केजरीवाल को अनार्किस्ट यानी अराजकतावादी कहकर चुनावी ताप को बढ़ाया तो सोनिया गांधी ने दिल्ली के लोगों को प्रचारक मोदी व ड्रामेबाज केजरीवाल से सतर्क रहने की सलाह दी। निश्चित तौर पर केवल चुनावी जुमलों की जीत या हार में निर्णायक भूमिका नहीं होती, परंतु ये जुमले राजनीतिक स्पेस में एक कम्युनिकेटिव पब्लिक स्पेस का निर्माण तो करते ही हैं। नेता व जनता मौखिक रूप से गीतों, अलंकारों, जुमलों के माध्यम से आपस में संचार करते हैं। पता नहीं इस प्रकार के संचार से नफा किसका होता है, लेकिन इतना तय है कि जनता तो ठगी ही जाती है। जुमलों के माध्यम से उसे जो सब्जबाग दिखाया जाता है, वह वास्तव में खोखला ही होता है। लोकतांत्रिक शब्दावली में इतना इशारा काफी है।

[लेखक पंकज कुमार झा, दिल्ली विवि में राजनीति शास्त्र के प्राध्यापक हैं]

Posted By: Bhupendra Singh