इधर कुछ दिनों से संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा और भाषा विवाद पर कई चर्चाएं हो रही हैं। सोशल मीडिया में तो यह भाषा विवाद खुले रूप में देखने को मिलता है। सोशल मीडिया पर उपस्थित विद्वानों ने इस विवाद को उत्तर भारत (काऊ बेल्ट) के वर्चस्व और 'हिंदी-हिंदू-हिंदुस्तान' के राजनीतिक नारों के साथ जोड़ दिया है। इस लेख में मेरा उद्देश्य सरकार के निर्णय पर चर्चा करना नहीं है, बल्कि इस विवाद की आड़ में भारत का स्वघोषित संभ्रांत, सामाजिक न्याय के प्रति समर्पित, बुद्धिजीवी वर्ग, जिस प्रकार हिंदी के प्रति अपनी दुर्भावना फैला रहा है उस पर अपने विचार रखना है। कई जगह यह प्रचारित किया गया है कि हिंदी बोलने वाले ऊंची जाति, वर्ग और हिंदुत्ववादी मानसिकता के होते हैं। इसका मतलब यह है कि हिंदी काऊ बेल्ट के एलीट वर्ग की भाषा है। इस तरह का तर्क रखने वाले बुद्धिजीवी खुद अंग्रेजी में उच्च शिक्षा प्राप्त कर चुके हैं, हार्वर्ड, ऑक्सफोर्ड और कैंब्रिज जैसे उच्च कोटि के विदेशी संस्थानों में पढ़ाई कर चुके हैं। ये हास्यास्पद ही लगता है कि ऐसे लोग हिंदी भाषियों को एलीट बुलाते हैं, हिंदी व हिंदी भाषियों को अपमानित करते हैं, हिंदी को कोलोनियल भाषा बताते हैं और अंग्रेजी को भारतीय भाषा। इन लोगों ने शायद काऊ बेल्ट की यात्रा कभी की ही नहीं। आश्चर्य होता है कि जिन लोगों ने इतनी आसानी से अंग्रेजी को अंगीकार कर लिया उन्हें हिंदी अभद्र, असहनीय लगती है।

हालत तो यह है कि हिंदी बोलने वालों को हमेशा से ही हेय दृष्टि से देखा जाता है। हिंदी माध्यम में पढ़े विद्यार्थियों को भारत के उच्च शिक्षण संस्थानों में जिस तरह के तिरस्कार व उपेक्षा का सामना करना पड़ता है वह भारतीय शिक्षा के भाषाई नस्लभेद का एक नमूना है। सच्चाई बस यह है कि हिंदी भाषी प्रदेशों में भी अधिकतर लोग अंग्रेजी माध्यम शिक्षा के लिए लालायित रहते हैं, सिर्फ इसलिए नहीं कि अंग्रेजी नौकरी और कैरियर के लिए उपयोगी है, बल्कि अंग्रेजी शिक्षा अब एक स्टेटस सिंबल बन चुकी है। वाह, क्या अंग्रेजी लिखते/बोलते हैं! आपको बहुत सुनने को मिलेगा। क्या कोई हिंदी भाषी विद्यार्थी को कभी ये कहा जाता है कि आपकी हिंदी बहुत अच्छी है? भाषा की राजनीति में वैचारिक मतभेद हो सकता है, वाजिब भी है क्योंकि भाषाई लड़ाई में दंगे हुए हैं, अनेक लोगों की जान भी गई हैं। और तो और युद्ध हुए हैं, नए देशों का निर्माण भी हुआ है, किंतु किसी भी भाषा के प्रति बुद्धिजीवियों की दुर्भावना शायद हिंदुस्तान/हिंदुस्तानियों में ही देखने को मिल सकती है। कुछ साल पहले ऑस्ट्रेलिया में एक हिंदुस्तानी कांफ्रेंस डेलिगेट ने ये तर्क रखा था कि संस्कृत मृत भाषा है, ब्राह्मणवाद की भाषा है, इसलिए इसे सीखना गलत है। बुरा लगा कि ऐसी सोच वाले सामाजिक विज्ञान के विद्यार्थी/शिक्षक हैं।

आयरलैंड की एक यूनिवर्सिटी में पढ़ाते वक्त बड़े गर्व से हम सभी आयरिश भाषा में अपना नाम वगैरह लिखते थे। अभी मैं आस्ट्रेलिया की मोनाश यूनिवर्सिटी में राजनीति और अंतरराष्ट्रीय संबंध पढ़ा रही हूं। यहां भी विभिन्न भाषाओं के प्रति आदर है। ऑस्ट्रेलियाई नेशनल यूनिवर्सिटी में तो हिंदी और संस्कृत की गंभीर पढ़ाई होती है। ऑस्ट्रेलिया स्थित ला ट्रोब यूनिवर्सिटी में मेरे एक अमेरिकन मित्र, इयान वूलफोर्ड व्याख्याता हैं, जिन्होंने हिंदी में यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्सास-ऑस्टिन से पीएचडी किया है। उनके शोध का विषय फणीश्वर नाथ रेणु का गांव और स्थानीय सांस्कृतिक परंपराएं थीं। इयान हिंदी भाषा की सेवा ऑस्ट्रेलिया में कर रहे हैं। इस तरह के कई मित्र हैं, जो थोड़े दिनों की भारत यात्रा में इतनी हिंदी सीख चुके हैं कि हमेशा हिंदी में ही बात करना पसंद करते।

इन सभी के बीच रहते हुए भारत में हिंदी के प्रति दुर्भावना बहुत दुखी करती है, उसके पीछे की मानसिकता पर रोष होता है। हिंदी, हिंदुस्तान की एक बेहद खूबसूरत भाषा है। अच्छी, शुद्ध हिंदी बोलना कोई शर्म की बात नहीं है, न कोई अपराध है। भाषा जोड़ती है, तोड़ती नहीं। हिंदी सिर्फ हिंदुओं की भाषा नहीं है, उसी प्रकार जैसे उर्दू मुसलमानों की भाषा नहीं है। हिंदी में अद्भुत सुंदर रचनाएं हुई हैं। पढि़ए और अपनी नफरत की जमा पूंजी कुछ कम कीजिए। और जिस प्रकार हर दक्षिण भारतीय को मद्रासी पुकारना एक संकीर्ण मानसिकता की पहचान है उसी तरह उत्तार भारत के लोगों के लिए काऊ बेल्ट का नस्लभेदी प्रयोग बंद कीजिए। इसी काऊ बेल्ट के सौजन्य से दुग्ध उत्पादन भारत की मांगें पूरी कर रहा है। ये वही काऊ बेल्ट है जहां की पब्लिक सेक्टर इंडस्ट्रीज में अनेक प्रांतों के लोग, खासकर के दक्षिण भारत से लोग अपनी रोजी रोटी कमाते हैं। रांची में आपको मलयाली, तमिल, तेलुगु, बंगाली, मराठी, पंजाबी, मुंडारी सभी भाषाओं के प्रति आदर मिलेगा। काऊ बेल्ट के लोग सिर्फ देना/अपनाना जानते हैं। आपने कहीं सुना कि झारखंड, बिहार में किसी और प्रांत के लोगों के प्रति नस्लीय हिंसा हुई? यात्रा कीजिए, लोगों से मिलिए, भाषाओं से मिलिए, सिर्फ फेसबुक/ट्विटर पर नहीं। एक समृद्ध भारत का निर्माण तभी संभव है जब हम इन ओछी मानसिकता से अपने आप को मुक्त करें, हर भाषा का सम्मान करें। हिंदी को प्रतिष्ठा और गौरव दिलाने के लिए कई स्तरों पर प्रयास करने की जरूरत है। यह प्रयास न केवल वैचारिक स्तर पर होने चाहिए, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर भी। कोई भी देश अपनी भाषा अथवा संस्कृति की उपेक्षा कर आगे नहीं बढ़ सकता। हिंदी भारत की भाषा है और इसे वह सम्मान मिलना ही चाहिए जिसकी वह हकदार है। सिवल सेवा परीक्षा में अंग्रेजी की अनिवार्यता पर उभरे विवाद ने एक ऐसा ही अवसर उपलब्ध कराया है। देखना यह है कि हिंदी अथवा भारतीय भाषाओं के प्रति कितनी गंभीरता का परिचय दिया जाता है।

[लेखिका स्वाति पराशर, ऑस्ट्रेलिया के मोनाश विश्वविद्यालय में प्राध्यापिका हैं]

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