[यशपाल सिंह]। इन दिनों मुंबई पुलिस तमाम गलत कारणों से पूरे देश में चर्चा का विषय बनी हुई है। आज से कुछ दशक पहले मुंबई पुलिस देश की सर्वश्रेष्ठ पुलिस में गिनी जाती थी। मुझे याद है कि एक समय उत्तर प्रदेश में श्रीप्रकाश शुक्ला का आतंक अपने चरम पर था। एक दिन शाम साढे़ सात बजे के करीब उसने लखनऊ के मुख्य थाने हजरतगंज के एसएचओ को सरेआम गोलियों से भून दिया। तब मुझे पुलिस विभाग द्वारा ‘बांबे क्राइम ब्रांच’ का अध्ययन कर उत्तर प्रदेश पुलिस में तदनुसार सुधार कर कुछ नई व्यवस्था बनाने का प्रस्ताव देने को कहा गया, जिसकी परिणति आज की एसटीएफ है। इसका नियंत्रण सीधे डीजीपी (पुलिस महानिदेशक) के अंतर्गत रखा गया, ताकि इसकी हर गतिविधि से मुख्यमंत्री भी अवगत रहें। आज भी यह फोर्स आशा के अनुरूप परिणाम दे रही है और उत्तर प्रदेश पुलिस की शान है।

उधर मुंबई पुलिस की दुर्गति होती गई। इसका एक फौरी कारण तो यह जान पड़ता है कि मुंबई पुलिस आयुक्त यानी सीपी और मुख्यमंत्री के बीच एक ऐसे गृहमंत्री आ गए, जो सहयोगी पार्टी-एनसीपी यानी राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के सदस्य थे। उनकी निष्ठा अपने नेता के प्रति थी, न कि मुख्यमंत्री के प्रति। शरद पवार जैसे अनुभवी नेता और मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे को सोच समझकर यह जिम्मेदारी किसी संजीदा व्यक्ति को देनी चाहिए थी। गृहमंत्री पद से इस्तीफा देने को बाध्य हुए अनिल देशमुख में वैसी संजीदगी बिल्कुल नहीं झलकती। यह भी हैरान करता है कि उन पर सहायक पुलिस इंस्पेक्टर सचिन वाझे के जरिये सौ करोड़ रुपये महीने की वसूली कराने के आरोप लगे और फिर भी उन्होंने पद छोड़ने की जरूरत नहीं समझी। न मुख्यमंत्री ने उनसे इस्तीफा मांगा और न ही शरद पवार ने उन्हें इस्तीफे की सलाह दी। उलटे उन्होंने देशमुख का बचाव किया।

मुख्यमंत्री को हर हाल में अपने पास रखना चाहिए गृह विभाग

यदि बंबई उच्च न्यायालय ने सौ करोड़ वसूली मामले की सीबीआइ जांच के आदेश नहीं दिए होते तो शायद देशमुख अभी भी अपने पद पर बने रहते। मुंबई पुलिस की फजीहत यह बताती है कि जब कई पार्टियों को मिलाकर सरकारें बनें तो गृह विभाग हर हाल में मुख्यमंत्री को अपने पास रखना चाहिए। प्रशासन की रीढ़ पुलिस ही है। इसीलिए विपक्ष हमेशा कानून-व्यवस्था के मुद्दों पर ही हमला करता है, क्योंकि ये ही मुद्दे जनता को आसानी से समझ में आते हैं। मीडिया का भी यह मुख्य मुद्दा होता है।

पुलिस अफसरों को मालूम है कि जब तक वे सही हैं, तभी तक  हैं सुरक्षित

कल्पना करें कि यदि उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में मुख्यमंत्री गृह विभाग अपने पास नहीं रखते या फिर किसी अन्य को गृहमंत्री बनाते तो क्या होता? शायद तब यहां भी स्थिति भिन्न होती। गृह विभाग खुद मुख्यमंत्री के पास होने का असर पूरे पुलिस विभाग में दिखता है। अपराध हों या आपदा, पुलिस अपना शत प्रतिशत योगदान देती दिखती है। पुलिस अफसरों को मालूम है कि जब तक वे सही हैं, तभी तक सुरक्षित हैं, वरना उन्हें कोई नहीं बचा सकता। कानपुर में हुए बिकरू कांड में अपनी गलत भूमिका को लेकर कई पुलिस अधिकारी निलंबित हैं। एक पुलिस अफसर को भ्रष्टाचार में संलिप्तता के कारण रिटायर होने से दो दिन पहले जेल जाना पड़ा। आधे दर्जन आइपीएस अधिकारी या तो निलंबित हैं या मुख्यालय से संबद्ध हैं। अब तो अनुपयोगी दागी अधिकारियों को समय से पहले ही सरकार रिटायर कर रही है। यह काम हर राज्य में होना चाहिए।

वाझे की करतूतों का धीरे-धीरे हो रहा पर्दाफाश

मुंबई में पुलिस आयुक्त परमबीर सिंह की नियुक्ति की आलोचना जूलियो रिबेरो जैसे ख्याति प्राप्त पुलिस अधिकारी ने भी की है। पिछले दिनों पद से हटाए जाने के बाद परमबीर सिंह ने मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर बताया कि गृहमंत्री अनिल देशमुख ने निलंबित सहायक पुलिस इंस्पेक्टर सचिन वाझे को प्रतिमाह सौ करोड़ रुपये की उगाही का आदेश दिया था। अच्छा होता कि उन्हें जिस दिन यह बात मालूम हुई थी, उसी दिन मुख्यमंत्री से मिलकर पूरी बात बताते। अब वाझे की करतूतों का पर्दाफाश धीरे-धीरे हो रहा है। जिस तरह से उसने सब कुछ किया, संभव है, उसमें कुछ संगठित अपराधी गिरोह भी शामिल हों। एक पुलिस इंस्पेक्टर ऐसा कर सकता है या करने की सोच सकता है, यह सामान्य कल्पना के परे है। अब सचिन वाझे ने यह चिट्ठी लिखकर सनसनी मचा दी है कि एक और मंत्री ने 50 करोड़ रुपये लेकर किसी मामले की जांच बंद करने और बीएमसी के ठेकेदारों से सौ करोड़ रुपये वसूलने को कहा था। पता नहीं, सच क्या है, लेकिन ऐसी चिट्ठियों से पुलिस के साथ सरकार की भी फजीहत होती है।

अधिकारियों के चयन में बरतनी चाहिए विशेष सावधानी 

सुशांत सिंह राजपूत के मामले में अनिल देशमुख की रोज प्रेस कांफ्रेंस होती थी, जबकि ऐसा पुलिस कमिश्नर को नियमित रूप से करना चाहिए था। गृहमंत्री के रूप में देशमुख की अनावश्यक सक्रियता से ऐसा आभास होता था, जैसे वही सब कुछ हों, मुख्यमंत्री, डीजीपी और सीपी कुछ नहीं। दरअसल सर्वोच्च स्तर पर बड़े पुलिस बल को नियंत्रित रखते हुए उसे अभिप्रेरित कर वांछित कार्य करा लेना एक पेशेवर अनुभवी अधिकारी के बूते की ही बात है। इसमें उसकी सामान्य विभागीय छवि, कार्यकुशलता और विश्वसनीयता जैसे गुण सम्मिलित रहते हैं। ऐसे अधिकारी के चयन में विशेष सावधानी बरती जानी चाहिए। चयन के बाद उसका निर्धारित कार्यकाल होना चाहिए और उसके काम में राजनीतिक हस्तक्षेप कम से कम होना चाहिए। इस संबंध में सितंबर 2006 में वरिष्ठ पुलिस अधिकारी प्रकाश सिंह की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने दिशा-निर्देश जारी किए थे, परंतु राज्यों ने अब तक उन्हें पूर्णत: लागू नहीं किया है। इसी कारण राजनीतिज्ञ, पुलिस और अपराधी गठजोड़ टूट नहीं पा रहा है और जब-तब हास्यास्पद एवं शर्मनाक स्थितियां पैदा हो जा रही हैं। व्यापक प्रशासनिक हित में यही है कि सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों को संस्थागत रूप दिया जाए, ताकि सभी प्रदेशों में सरकारें चाहे जिसकी और जैसी भी हों पुलिस-प्रशासनिक व्यवस्था उच्चकोटि की बनी रहे।

(लेखक उत्तर प्रदेश पुलिस के प्रमुख रहे हैं) 

[लेखक के निजी विचार हैं]

Indian T20 League

शॉर्ट मे जानें सभी बड़ी खबरें और पायें ई-पेपर,ऑडियो न्यूज़,और अन्य सर्विस, डाउनलोड जागरण ऐप

kumbh-mela-2021