लखनऊ, मुकुल श्रीवास्तव। मानव सभ्यता के इतिहास में 21वीं सदी का दूसरा दशक इसलिए याद रखा जाएगा जब इंसान एक डाटा (आंकड़े) में परिवर्तित हो गया और आज इस सदी के तीसरे दशक में यह बहुत मूल्यवान चुका है। डाटा ही वह ईंधन है जो अनगिनत कंपनियों को चलाए रखने के लिए जिम्मेदार है। वह चाहे तमाम एप्स हों या विभिन्न सोशल नेटवर्किंग साइट्स, सभी उपभोक्ताओं के लिए मुफ्त हैं। असल में जो चीज हमें मुफ्त दिखाई दे रही है वह सुविधा हमें हमारे संवेदनशील निजी डाटा के बदले मिल रही है। इनमें से अधिकतर कंपनियां उपभोक्ताओं द्वारा उपलब्ध आंकड़ों को संभाल पाने में असफल रहती हैं जिसका परिणाम लागातार आंकड़ों की चोरी और उनके दुरुपयोग के मामले सामने आते रहते हैं।

टेक एआरसी की एक रिपोर्ट के अनुसार एक भारतीय कम से कम 24 एप का इस्तेमाल करता है और यह आंकड़ा वैश्विक औसत से तीन गुना ज्यादा है। मोबाइल एनालिटिक्स फर्म ‘एप एनी’ की एक रिपोर्ट के अनुसार वैश्विक स्तर पर किसी फोन में एप रखने का औसत नौ एप प्रयोग करने का है, पर औसत रूप से एक भारतीय 51 एप तक फोन में रखता है। वैसे अधिकतम एप इंस्टॉल करने का आंकड़ा इसी रिपोर्ट के अनुसार 207 का है। यह तथ्य बताता है कि एक आम भारतीय किसी एप को डाउनलोड करने में कितनी कम सावधानी बरत रहे हैं।

सबसे ज्यादा सोशल मीडिया एप का इस्तेमाल किया जाता है और यहीं से इंसान के डाटा बनने का खेल शुरू हो जाता है। यह सोचने में अच्छा है कि हमारे ऑनलाइन प्रोफाइल पर हमारा नियंत्रण है। हम तय करते हैं कि हमें कौन सी तस्वीरें साझा करनी हैं और कौन सी निजी रहनी चाहिए। हम निमंत्रण स्वीकार करते हैं या अस्वीकार करते हैं, टैग को नियंत्रित करते हैं और पोस्ट या टिप्पणी प्रकाशित करने से पहले दो बार सोचते हैं। बुरी खबर यह है कि जब आपके डिजिटल प्रोफाइल की बात आती है तो आपके द्वारा साझा किया जाने वाला डाटा केवल एक हिमशैल के ऊपरी हिस्से की तरह है। हम बाकी को नहीं देखते हैं जो मोबाइल एप्लिकेशन और ऑनलाइन सेवाओं के अनुकूल इंटरफेस के पानी के नीचे छिपा हुआ है।

हमारे बारे में सबसे मूल्यवान डाटा हमारे नियंत्रण से परे है। यह ऐसी गहरी परतें हैं जिन्हें हम नियंत्रित नहीं कर सकते हैं। पहली परत वह है जिसे आप नियंत्रित करते हैं। इसमें वह डाटा होता है जो आप सोशल मीडिया और मोबाइल एप्लिकेशन में फीड करते हैं। इसमें आपकी प्रोफाइल, आपके सार्वजनिक पोस्ट और निजी संदेश, पसंद, खोज, अपलोड की गई फोटो आदि चीजें हैं। दूसरी परत व्यवहार संबंधी टिप्पणियों से बनी है। इसमें ऐसी चीजें शामिल हैं जिन्हें आप शायद हर किसी के साथ साझा नहीं करना चाहते हैं, जैसे आपका वास्तविक समय, स्थान और आपके अंतरंग और पेशेवर संबंधों की विस्तृत समझ। जैसे एक ही घर में अक्सर एक ही कार्यालय की इमारतों या आपके आराम करने के समय आपके मोबाइल की जगह को दिखाने वाले स्थान पैटर्न को देखकर कंपनियां बहुत कुछ बता सकती हैं कि आप कहां समय बिताते हैं। तीसरी परत पहले और दूसरे की व्याख्याओं से बनी है।

आपके डाटा का विश्लेषण विभिन्न एल्गोरिद्म द्वारा किया जाता है और सार्थक सांख्यिकीय सहसंबंधों के लिए अन्य उपयोगकर्ताओं के डाटा के साथ तुलना की जाती है। यह परत न केवल हम क्या करते हैं, बल्कि हम अपने व्यवहार और मेटाडाटा (डाटा के विश्लेषण से हासिल किए जाने वाले विविध परिणाम) पर आधारित हैं, उनके बारे में निष्कर्ष निकालते हैं। इस परत को नियंत्रित करना बहुत अधिक कठिन है। इन प्रोफाइल-मैपिंग एल्गोरिद्म का कार्य उन चीजों का अनुमान लगाना है, जिन्हें आप स्वेच्छा से प्रकट करने की संभावना नहीं रखते हैं। इनमें आपकी कमजोरियां, आइक्यू लेवल, पारिवारिक स्थिति, व्यसन, बीमारियां आदि शामिल हैं।

उपभोक्ता अधिकारों के तहत अभी आंकड़े नहीं आए हैं। किसी भी उपभोक्ता को यह नहीं पता चलता है कि उसकी निजी जानकारियों (आंकड़ों) का किस तरह इस्तेमाल होता है। आंकड़ों की दुनिया में भी वर्ग संघर्ष का दौर शुरू हो गया है। लोगों के निजी डाटा सिर्फ कंपनियों के प्रोडक्ट को बेचने में ही मदद नहीं कर रहे, बल्कि यह आंकड़े हमें भविष्य के समाज के लिए तैयार भी कर रहे हैं जिसमें एआइ यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस एक बड़ी भूमिका निभाने वाला है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस कंप्यूटर विज्ञान की वह शाखा है जो कंप्यूटर के इंसानों की तरह व्यवहार करने की धारणा पर आधारित है जो मशीनों की सोचने, समझने, सीखने, समस्या हल करने और निर्णय लेने जैसी संज्ञानात्मक कार्यों को करने की क्षमता पर कार्य करता है, लेकिन भविष्य का भारतीय समाज कैसा होगा यह इस मुद्दे पर निर्भर करेगा कि अभी हम अपने निजी आंकड़ों के बारे में कितने जागरूक हैं।

[प्रोफेसर, लखनऊ विश्वविद्यालय]

Posted By: Sanjay Pokhriyal

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