भूपेंद्र यादव। कांग्रेस सरकार द्वारा 1975 से 77 तक लगाया गया आपातकाल भारत के लोकतांत्रिक इतिहास का सबसे काला अध्याय है। उस दौर में इंदिरा सरकार ने संविधान की मूल भावना को दरकिनार कर लोकतंत्र के आत्मा, संवैधानिक संस्थाओं, प्रेस की स्वतंत्रता, न्यायपालिका की निष्पक्षता और नागरिक अधिकारों पर आघात किया। 

आपातकाल का कालखंड भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में कलंक के टीके की तरह है। इस पर काफी चर्चा हुई है। किताबें भी लिखी गई हैं, लेकिन इस पहलू पर उतनी चर्चा नहीं हुई कि आपातकाल लगाने के पीछे इंदिरा गांधी की मंशा क्या थी? अगर 1977 में इंदिरा गांधी दोबारा सत्ता में लौटतीं तो भारत के लोकतंत्र और संविधान के मूल ढांचे पर इसके क्या प्रभाव पड़ते?

आपातकाल के दौरान किया गया 42वां संविधान संशोधन संविधान के मूल आत्मा को बदलने का एक प्रयास था। इसके मूल में एकदलीय प्रणाली को स्थापित करने की मंशा थी। यह एक तरह से संविधान को ही बदलने का प्रयास था। इस संशोधन के माध्यम से न्यायपालिका की स्वतंत्रता को कम किया गया, नागरिक अधिकारों को सीमित किया गया और इंदिरा गांधी ने अपनी सरकार को असाधारण शक्तियां दे दीं।

कांग्रेस के मुखपत्र नेशनल हेराल्ड ने अपने संपादकीय में आपातकाल की हिमायत में लिखा था कि समय आ गया है कि अब देश एकदलीय लोकतंत्र की दिशा में बढ़े। इंदिरा के करीबी सहयोगी बीके नेहरू, जो एक अनुभवी राजनयिक भी थे, ने आपातकाल की सराहना में एक पत्र में लिखा था कि संसदीय लोकतंत्र हमारी जरूरतों का उत्तर देने में सक्षम नहीं है। 

उन्होंने इंदिरा गांधी से आग्रह किया कि अब जब आपके पास दो-तिहाई बहुमत है, तो संविधान में मौलिक परिवर्तन कर डालिए। इसलिए, यह संदेह निराधार नहीं कि यदि इंदिरा गांधी 1977 में सत्ता में वापसी करतीं तो यह प्रक्रिया और तेज होती। संविधान के मूल ढांचे, जैसे न्यायपालिका की स्वतंत्रता, संघीय व्यवस्था, नागरिक अधिकार एवं चुनावों की निष्पक्षता को कमजोर करने के लिए और संशोधन लाए जाते। तब भारत की लोकतांत्रिक पहचान ही खतरे में पड़ जाती।

आपातकाल के समय इंदिरा गांधी ने असहमत विरोधी दलों पर कड़े प्रतिबंध लगाए, सैकड़ों नेताओं को जेल में डाला और अनेक गैर-राजनीतिक संगठनों की आवाज भी दबाई। इसके पीछे उनका इरादा बहुदलीय लोकतांत्रिक व्यवस्था को कमजोर करके देश में एकदलीय प्रणाली को शक्तिशाली बनाने का था। यह अलोकतांत्रिक विचार था। इसके तहत इंदिरा गांधी कांग्रेस को एकमात्र राजनीतिक शक्ति बनाना चाहती थीं।
आपातकाल के वक्त भारत में परिवार आधारित तानाशाही का प्रयोग चल रहा था। 

यदि यह प्रयोग सफल हुआ होता तो देश की निर्णय प्रक्रिया लोकतांत्रिक प्रणाली के बजाय ‘एक दल-एक परिवार’ की व्यक्तिगत इच्छाओं से संचालित होती। आपातकाल में नौकरशाही को कांग्रेस पार्टी के एजेंडे के प्रति वफादार बनाने के सारे प्रयास हुए। योग्यता और निष्पक्षता को दरकिनार कर केवल वफादारी के आधार पर पदोन्नति दी गई। एक समर्पित नौकरशाही की परिकल्पना भी आपातकाल के दौरान उभरी। यदि 1977 में दोबारा कांग्रेस की सरकार बनती, तो पूरी आशंका थी कि इस नीति को और आक्रामक रूप से लागू किया जाता। 

स्वतंत्र प्रशासनिक संस्थाएं, जैसे संघ लोक सेवा आयोग, कैग, चुनाव आयोग को निष्प्रभावी बनाया जाता और एक ‘कमिटेड ब्यूरोक्रेसी’ तैयार की जाती। कांग्रेस द्वारा समय-समय पर ऐसी कोशिश की जाती रही है, इसलिए इस आशंका को बल मिलता है। देश में लोकतंत्र की आधारशिला रखने वालों ने स्वतंत्र और स्वायत्त न्यायपालिका की व्यवस्था दी थी। उसे भी इंदिरा सरकार ने सरकार के प्रति प्रतिबद्ध बनाने की कोशिश की थी। 

सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठता की अनदेखी कर कनिष्ठ जज को मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया गया। जस्टिस एचआर खन्ना जैसे साहसी न्यायाधीशों को दरकिनार कर दिया गया, क्योंकि उन्होंने नागरिक अधिकारों की रक्षा पर जोर दिया था। यदि इंदिरा सत्ता में कायम रहतीं तो न्यायपालिका पर दबाव और बढ़ता। संवैधानिक समीक्षा की शक्तियों को सीमित किया जाता, न्यायिक नियुक्तियों में सरकार की मनमानी चलती और अदालतें सरकारी एजेंडे को वैध ठहराने का माध्यम बन जातीं।

आपातकाल के दौरान प्रेस की स्वतंत्रता पर अभूतपूर्व हमला हुआ। व्यापक सेंसरशिप लगाई गई। सरकार विरोधी सामग्री प्रकाशित करने पर प्रतिबंध लगाया गया। कई समाचार पत्रों के मालिकों, संपादकों को दंडित किया गया, क्योंकि उन्होंने आपातकाल की आलोचना की थी। कुछ अखबारों ने अपने संपादकीय खाली छोड़ दिए थे।

यदि 1977 में इंदिरा फिर सत्ता में आतीं, लोकतंत्र की बुनियादें-संवैधानिक व्यवस्था, बहुदलीय प्रणाली, न्यायपालिका की स्वतंत्रता, प्रेस की आजादी और निष्पक्ष प्रशासन आदि गंभीर रूप से कमजोर हो जाता। भारत एक परिवार केंद्रित, पार्टी-प्रधान और अधिनायकवादी राज्य में बदल सकता था, पर भारत में लोकतंत्र की जड़ें बहुत मजबूत हैं, इसे देश ने साबित किया। जनता ने लोकतंत्र के खिलाफ इंदिरा गांधी की मंशा को खारिज कर लोकतंत्र के पक्ष में मतदान किया। 

इंदिरा गांधी और आपातकाल के लिए जिम्मेदार कांग्रेस के कई दिग्गज नेता चुनाव हार गए। 1977 का लोकसभा चुनाव नई सरकार चुनने से ज्यादा लोकतंत्र और संविधान को कमजोर करने की मंशा रखने वालों को दंडित करने वाला चुनाव था। लोगों ने आपातकाल के लिए जिम्मेदार लोगों को अपने मतदान के अधिकार की ताकत से दंडित किया और इस तरह कि वह एक मिसाल बना।

जनता पार्टी की ऐतिहासिक जीत और इंदिरा गांधी की पराजय ने न केवल लोकतंत्र की रक्षा की, बल्कि यह भी साबित किया कि भारत की जनता अपनी आजादी और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा के लिए कोई भी कीमत चुकाने को तैयार है। 1977 का चुनाव भारतीय लोकतांत्रिक चेतना की जीत के नाम रहा। अब जब आपातकाल के 50 साल पूरे हो रहे हैं, तब हमारा लोकतंत्र मजबूती से आगे बढ़ रहा है और अनुच्छेद-356 के दुरुपयोग जैसी प्रवृत्ति खत्म हुई है।

(लेखक केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री हैं)