[ तसलीमा नसरीन ]: तमाम मुसलमानों की ऐसी धारणा है कि इस्लाम की बुराई करने वालों की पश्चिमी देशों में खूब पूछ-परख होती है। ऐसे लोग अपनी खयाली दुनिया में जी रहे हैं। सच्चाई यह है कि इस्लाम की बुराई करने वालों को दुनिया में कहीं ठिकाना नहीं मिलता। उलटे अगर किसी ने इस्लाम की खामियों की आलोचना की तो कट्टरपंथी उसके सिर की कीमत लगा देंगे, उसकी जान पर बन आएगी और यूरोप के लोग तो उसका अपमान करेंगे। ऐसा व्यक्ति अकेला पड़ जाएगा। हो सकता है कि अकेले कमरे में कुछ नास्तिक उसकी खोज-खबर ले लें। उसे भुलाया भी जा सकता है। पश्चिमी देशों में उनकी कद्र होती है, उनका सम्मान होता है, उन्हें सुफल मिलता है, जो कहते हैं कि इस्लामिक कट्टरवाद खराब है।

इस्लामिक कट्टरपंथी और आतंकी इस्लाम की गलत व्याख्या करते हैं

इस्लामिक कट्टरपंथी और आतंकी जिस इस्लाम की व्याख्या करते हैं वह इस्लाम की गलत व्याख्या है। दरअसल इसी वजह से पश्चिमी देशों में मलाला नायिका है, क्योंकि वह यह कहती फिरती है कि इस्लामिक कट्टरवाद खराब है, इस्लाम नहीं। पश्चिमी देशों में तसलीमा इसलिए जीरो है, क्योंकि वह यह भी कहती है कि इस्लामिक कट्टरवाद को इस्लाम से ही खाद-पानी मिलता है।

पश्चिमी देश उदारवादी मुसलमानों को पसंद करते हैं

पश्चिमी देश उदारवादी मुसलमानों को पसंद करते हैं। इस्लाम के निंदक नास्तिक लोग उन्हें नहीं भाते। उनसे वे जितना हो सके, दूरी बनाकर चलते हैं। उनका मानना है कि इस्लाम में भी परिवर्तन उनके भीतर से आना चाहिए, जैसा कि अन्य धर्मों में हुआ है। उन्हें लगता है कि इस्लाम के बाहर नास्तिकों के चिल्लाने से कोई लाभ नहीं होने वाला है, बल्कि इससे नुकसान ही हो सकता है इसलिए हम जैसे नास्तिक को खारिज किया जाता है। हमारे लिए पश्चिम के राजनेता, दार्शनिक, बुद्धिजीवी, समाजशास्त्री और मानव वैज्ञानिकों और धर्माचार्यों में कोई उत्साह नहीं है, लेकिन कल्पनालोक में रहने वाले मूर्ख जब तक रहेंगे तब तक वे यही कहेंगे कि इस्लाम के खिलाफ लिखने-बोलने वालों को पश्चिमी देशों में इनाम मिलता है। क्या पश्चिमी देशों के पास और कोई काम नहीं, जो वे ऐसे इस्लाम विरोधियों को इनाम दें और अपने लिए मुसीबत मोल लें। सच्चाई यह है कि इस्लाम की स्तुति करने वालों को पूर्व ही नहीं, पश्चिमी देशों में भी इनाम मिलता है।

मुसलमानों का मानना है कि अमेरिका है इस्लाम विरोधी

अधिकतर मुसलमानों का मानना है कि अमेरिका इस्लाम विरोधी है। वे इसका कारण यह बताते हैैं कि अमेरिका इस्लामिक देश अफगानिस्तान और इराक पर बम फेंक रहा है और उसकी चपेट में आने से मुसलमान मारे जा रहे हैं। उनकी यह भी दलील होती है कि अमेरिका इजरायल को हथियार दे रहा है जो फलस्तीन के मुसलमानों को मार रहा है। यह मानने वालों की भी कमी नहीं कि अमेरिका इस्लाम पर अविश्वास करने वाले अपने यहां के यहूदियों को डॉलर में तौलकर रखता है। जाहिर है कि यह कोरी कल्पना है, लेकिन ऐसी कल्पना करने वालों को समझाए कौन?

अमेरिका के सभी राष्ट्रपतियों ने कहा- इस्लाम शांति का धर्म है

क्या अमेरिका की किसी सरकार ने आज तक इस्लाम की निंदा की है? क्या वहां की किसी सरकार ने किसी घोषित इस्लाम विरोधी के साथ बैठक की है? कम से कम मैंने तो ऐसा कभी नहीं देखा-सुना। अमेरिकी सरकार तो ऐसे उदारवादी मुसलमानों के साथ ही मुलाकात करती है, जो कहते हैं कि इस्लाम शांति का धर्म है। अमेरिका के लगभग सभी राष्ट्रपतियों ने बेलाग कहा है कि इस्लाम शांति का धर्म है, बस कुछ भ्रमित लोग अशांति फैला रहे हैं। अमेरिका की किसी भी सरकार ने खुले तौर पर या गोपनीय तरीके से कहीं भी इस्लाम विरोधियों के साथ कोई संपर्क नहीं रखा है। उनमें से कई हैं, जो अपने धर्म के प्रति श्रद्धा रखते हैं और इसीलिए अन्य धर्मावलंबियों के साथ भी उनके संपर्क अच्छे होते हैं।

लेखक की व्यथा, कहा- मैं किताबों की रॉयल्टी से जीवन-यापन करती हूं

राजनीतिक शरणार्थियों को बेहतर जीवन देने वाले एक देश में मैंने भी शरण ली थी, लेकिन वहां की सरकार से मुझे एक पैसा नहीं मिला। मैैं अपनी किताबों की बिक्री से जो रॉयल्टी मिलती है, उसी से अपना जीवन-यापन करती हूं। आजतक मैं जिन देशों में रही, किसी भी देश की सरकार से मुझे फूटी कौड़ी की मदद नहीं मिली। किसी भी सरकारी या गैर-सरकारी संस्था ने आगे बढ़कर मेरी मदद भी नहीं करनी चाही इसका कारण यही है कि उन्हें लगता है कि मैं इस्लाम की खामियों की आलोचना करती हूं।

पश्चिमी देश तब मुझे चाहते जब जेहादियों के खिलाफ लिखती-बोलती

दरअसल पश्चिमी देश तब मुझे सिर-आंखों पर बैठाते, जब मैं केवल जेहादियों के खिलाफ लिखती-बोलती। सलमान रुश्दी मशहूर जरूर हैं, लेकिन उन्होंने यह प्रसिद्धि इस्लाम की गलत नीतियों के विरोध में लिखकर नहीं पाई है। अभिव्यक्ति की आजादी के मामले में जो लोग उनका समर्थन करते हैं, वे भी उनकी रचनाओं में ऐसा बहुत कुछ है, जो पसंद नहीं करते।

पश्चिमी देशों में इस्लाम के प्रति प्रबल सहानुभूति

पश्चिमी बुद्धिजीवियों में दक्षिणपंथी कम हैं, लेकिन जो हैैं उनमें भी मुसलमानों और इस्लाम के प्रति प्रबल सहानुभूति है। यदि यूरोप और अमेरिका इस्लाम विरोधी होते तो वहां इतनी बड़ी संख्या में मुस्लिम आबादी कैसे रहती? मुसलमानों को वहां जैसे मानवाधिकार प्राप्त हैं, वैसे अधिकार उन्हें कहीं भी नहीं मिल सकते। इस्लामिक देशों में तो किसी कीमत पर संभव नहीं। आज मुसलमानों के मानवाधिकारों की रक्षा के लिए सबसे आगे आने वालों में पश्चिम के बुद्धिजीवी, पश्चिमी लोगों की संस्था ह्यूमन राइट्स वॉच, एमनेस्टी इंटरनेशनल और उसके जैसी सैकड़ों संस्थाएं हैं। जब अवैध घुसपैठ के कानून का शिकंजा कसता है तो मुसलमानों को चर्चों में शरण मिलती है और वहां शरण के बदले ईसाई धर्म स्वीकार करने जैसी कोई शर्त नहीं होती, लेकिन ऐसे ही लोग अपने देश लौटते ही पश्चिम के विरोध में जुट जाते हैं।

मुस्लिमों के लिए पश्चिमी देश किसी स्वर्ग से कम नहीं

पश्चिम के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन के लिए भी पश्चिम की पुलिस उन्हें जगह देती है। इतना ही नहीं, उनकी सुरक्षा का भी पूरा ख्याल रखा जाता है। मुस्लिमों के लिए पश्चिमी देश किसी स्वर्ग से कम नहीं। विश्वास नहीं होता तो उनसे पूछिए कि उत्तर अमेरिका के किसी अंचल या फिर स्वीडन, नॉर्वे, फिनलैंड, जर्मनी, फ्रांस, नीदरलैंड को छोड़कर क्या वे मिस्र, कतर, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, इराक, ईरान, जार्डन या सऊदी अरब में जाकर बसना चाहेंगे? चाहे जितना बड़ा इस्लामपरस्त हो, चाहे जितना इस्लाम विरोधियों को गाली देने वाला हो, शरिया कानून को श्रेष्ठ बताने वाला हो, वह ऐसे किसी देश में नहीं रहना चाहेगा, जहां शरिया कानून हो और इस्लामिक सरकार हो।

( लेखिका प्रख्यात साहित्यकार हैैं )

Posted By: Bhupendra Singh

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