[प्रमोद भार्गव]। Citizenship Amendment Act: पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) और राष्ट्रीय नागरिक पंजी (एनआरसी) पर हैरानी में डालने वाला बेतुका बयान दिया है। ममता ने कहा है कि भाजपा में हिम्मत है तो वह सीएए और एनआरसी पर संयुक्त राष्ट्र (यूएन) की निगरानी में जनमत संग्रह देश में कराए। यदि यह जनमत सरकार के विरुद्ध जाता है तो नरेंद्र मोदी सरकार इस्तीफा दे। इसी तरह के हस्तक्षेप की जम्मू-कश्मीर में जरूरत पाकिस्तान जता रहा है।

‘नागरिकता अधिनियम-1955’

यह अच्छी बात है कि भारत सरकार ने जता दिया कि तीसरे पक्ष का दखल किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं है। सरकार का यह दो टूक रुख इसलिए जरूरी था, क्योंकि उसने नागरिकता कानून में जो संशोधन किया है, वे संविधान की परिधि में लोकसभा एवं राज्यसभा से पारित हुए हैं, न कि थोपे गए हैं। हालांकि कांग्रेस व अन्य विपक्षी दलों को यह एक ऐसा मुद्दा मिल गया है जिसकी ओट में हाशिये पर पड़े ये दल भारतीय मुस्लिमों के कंधे पर बंदूक रख संजीवनी पाना चाहते हैं। भारत में नागरिकता के अधिकार ‘नागरिकता अधिनियम-1955’ के माध्यम से तय किए गए हैं। 26 जनवरी 1949 को जब संविधान सभा ने संविधान को मंजूर किया था, तब नागरिकता से संबंधित अनुच्छेद पांच से नौ को तुरंत लागू कर दिया गया था।

‘ब्रिटिश नागरिकता कानून’ 

इसके पहले कौन भारतीय नागरिक है, इसकी पहचान चिन्हित नहीं थी। इसके पहले हम ब्रिटिश शासन के अधीन थे, इसलिए ‘ब्रिटिश नागरिकता कानून’ के तहत ब्रिटिश प्रजा थे। जो लोग सामंती राज व्यवस्था के अंतर्गत थे, उन्हें भी ब्रिटिश सरंक्षण प्राप्त नागरिकों का दर्जा प्राप्त था। देश बंटवारे के समय लाखों लोग इधर से उधर हुए, इसलिए नागरिकता निर्धारण की समस्या, बड़े संकट के रूप में सामने आई। लिहाजा नागरिकता की नियमावली को तय करने में दो वर्ष लगे। साफ है कि संविधान निर्माता डॉ. भीमराव आंबेडकर और उनके सहयोगियों ने इस मुद्दे पर विचार-विमर्श के बाद निर्णय किए। इसमें स्पष्ट उल्लेख है कि संसद नागरिकता के अधिकार को निर्धारित कर सकती है।

इस कानून में संशोधन 1986 में किया गया

देश की आजादी से लेकर 1971 में बांग्लादेश बनने तक भारत में पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका, अफगानिस्तान और युगांडा से बड़ी संख्या में लोग गैर-कानूनी ढंग से घुसे चले आए। इस संकट से निपटने के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के कार्यकाल में 1986 में इस कानून में संशोधन किया गया। नतीजतन भारतीय नागरिकता प्राप्त करना और कठिन हो गया। इस कानून में सबसे अहम बदलाव वर्ष 2003 और 2005 में किए गए। वर्ष 2003 में अटल बिहारी वाजपेयी और 2005 में डॉ. मनमोहन सिंह देश के प्रधानमंत्री थे।

अप्रवासियों व बांग्लादेशी घुसपैठियों की पहचान

एनआरसी असम में रहने वाले भारतीय नागरिकों की पहचान के लिए वजूद में लाई गई थी। इसका मकसद ही असम में अवैध रूप से रह रहे अप्रवासियों व बांग्लादेशी घुसपैठियों की पहचान करना था। इसकी पूरी प्रक्रिया सर्वोच्च न्यायालय की निगरानी में चली। असम की एक बड़ी आबादी को इस सूची में जगह नहीं मिली जिससे विवाद खड़ा हो गया। इस पर विवाद खत्म होने से पहले ही गृह मंत्री अमित शाह नागरिकता संशोधन विधेयक ले आए और पूरे देश में एनआरसी का प्राविधान करने की बात की, जो वर्तमान बवाल का कारण बना है।

जनमत-संग्रह की बेतुकी मांग 

दरअसल एनआरसी में ऐसे मुस्लिम घुसपैठियों को बाहर करने का प्राविधान है, जो भारतीय नागरिक नहीं हैं। यदि ये घुसपैठिये बाहर हो जाते हैं तो पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की तृणमूल का सूपड़ा साफ हो सकता है। वैसे भी राज्य में 18 लोकसभा सीटें जीकर भाजपा ने तृणमूल की जड़ों में मट्ठा घोल दिया है, इसलिए ममता ने अपना वर्चस्व बचाए रखने की लड़ाई लड़ते-लड़ते संयुक्त राष्ट्र की निगरानी में जनमत-संग्रह की बेतुकी मांग करने की भूल कर दी। दूसरी तरफ अस्तित्व खो रहे वामदल भी हिंसा की इस आंच में राजनीतिक स्वार्थ की रोटियां सेकने लग गए। इन दलों की शह पर देश में हिंसा और आगजनी का माहौल बना हुआ है। नागरिकता कानून के विरुद्ध जो याचिकाएं इसके खात्मे की मंशा से दायर की गई थीं, उन्हें सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया। इससे यह सुनिश्चित होता है कि सुप्रीम कोर्ट ने संशोधित कानून को संवैधानिक मानते हुए इसे घुसपैठियों की पहचान के लिए आवश्यक भी माना है।

‘असम पब्लिक वक्र्स’

इस मुद्दे पर मनमोहन सिंह की भूमिका समझ से परे है। एनआरसी लागू करने का काम सबसे ज्यादा उन्हीं के प्रधानमंत्री रहते हुए हुआ है। मई 2005 में मनमोहन सिंह की अध्यक्षता में केंद्र सरकार, असम राज्य सरकार और आसू (संपूर्ण असम छात्र संगठन) के प्रतिनिधियों के बीच त्रिपक्षीय बैठक हुई। इसमें राजीव गांधी के समय 1985 में असम समझौते के दौरान किए गए वादों को पूरा करने के लिए एनआरसी को अद्यतन करने पर सहमति बनी। इसे भी जब ठंडे बस्ते में डाल दिया गया, तब ‘असम पब्लिक वक्र्स’ नामक स्वयंसेवी संगठन ने शीर्ष न्यायालय में याचिका लगाकर मांग की, कि उन प्रवासियों के नाम मतदाता सूची से हटाए जाएं, जिन्होंने भारतीय नागरिकता के प्रमाणित दस्तावेज जमा नहीं किए हैं। इसके साथ ही, इसी याचिका में एनआरसी प्रक्रिया शुरू करने का निवेदन किया गया। यह पहला अवसर था, जब याचिका न्यायालय ने स्वीकार की और एनआरसी पर प्रक्रिया शुरू होने की खिड़की खोल दी।

किसी देश में वहां के लोगों को नागरिकता देने की दृष्टि से हाल के वर्षों में संयुक्त राष्ट्र कोई असरकारी भूमिका निभाने में असफल रहा है। इस संबंध में म्यांमार को उदाहरण के तौर पर देखें तो यहां से वर्ष 2016 में करीब 10 लाख रोहिंग्या मुस्लिमों को सेना ने बंदूक की नोक पर खदेड़ा जिनमें से सात लाख को बांग्लादेश ने उदारता बरतते हुए शरण तो दी, लेकिन नागरिकता नहीं दी। इस घटनाक्रम को घटे करीब चार साल हो रहे हैं, लेकिन संयुक्त राष्ट्र एक भी रोहिंग्या की वापसी म्यांमार में नहीं करा पाया है। इस मामले और अन्य मामलों में कोई प्रभावी परिणाम नहीं दे पाने के कारण संयुक्त राष्ट्र को अप्रासंगिक संगठन माना जाने लगा है। लिहाजा ममता बनर्जी ने यह मांग करके जता दिया है कि वे राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई में बेहद कठिन दुविधा के दौर से गुजर रही हैं। यह बेतुका बयान उनकी राजनीतिक धार को कुंद कर सकता है।

[वरिष्ठ पत्रकार]

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Posted By: Sanjay Pokhriyal

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