[महेश पलावत]। करीब 8 दिन की देरी से मानसून केरल पहुंच गया है और उत्तर-पूर्व में भी दस्तक दे चुका है। सवाल है अब आगे क्या होगा? चूंकि इस साल अलनीनो कंडीशन है, जिसके कारण पूर्वी प्रशांत महासागर में ‘सी सरफेस’ गर्म हो जाता है। इससे दक्षिण अमेरिका और पेरू की तरफ बारिश ज्यादा होती है और दक्षिण-पूर्व एशिया यानी भारतीय उपमहाद्वीप में कम होती है। इससे यह आशंका बन रही है कि इस साल बारिश सामान्य से कम होगी।

इन राज्यों में होगी अच्छी बारिश
स्काईमेट ने इस साल मानसून के 93 फीसद रहने की भविष्यवाणी की है। हालांकि जून का जो पहला हाफ होता है, उसका सेगमेंट फिलहाल अरब सागर में बन गया है। इससे केरल, कर्नाटक और महाराष्ट्र तथा गुजरात में कुछ अच्छी बारिश होगी। मगर मानसून की चाल जून के पहले पखवाड़े में कमजोर रहेगी। इसके बाद धीरे-धीरे मानसून गति पकड़ेगा। इससे कुल मिलाकर नतीजा यह निकलेगा कि जून के महीने में बारिश कम होगी। भले केरल और तटीय आंध्र प्रदेश में अच्छी बारिश हो जाए।

मानसून की देरी को आप कैसे समझेंगे
सवाल है मानसून की इस देरी को एक आम आदमी क्यों और किस तरह समझे तथा सरकार के लिए इसमें क्या संदेश है? आम आदमी के लिए इस देर से शुरू होने वाली कम बारिश का मतलब है कि इससे खरीफ की बुआई में देरी होगी। चूंकि किसान आम तौर पर हर साल एक नियत समय पर बुआई कर देते हैं, इससे आशंका यह है कि इस साल भी वे शुरुआती बारिश के बाद ही बुआई कर देंगे। लेकिन जून में अगर मानसून कमजोर रहता है तो उनकी बुआई का नुकसान हो सकता है। एक मौसम वैज्ञानिक के नाते मैं यह सलाह दूंगा कि उत्तर भारत के किसान खरीफ की फसल की कम से कम 10 दिन के बाद बुआई शुरू करें या जब उस इलाके में पूरी तरह से मानसून पहुंच जाए तब बुआई शरू करें।

औसत या सामान्य बारिश कब होती है
चूंकि इस साल मानसून पूर्व की बारिश बिल्कुल नहीं हुई और मानसून भी कमजोर है तो क्या खरीफ की फसल में उत्पादन कम होगा? इस सवाल का जवाब फिलहाल हम मौसम वैज्ञानिक नहीं दे सकते। इसका जवाब कृषि वैज्ञानिकों के पास होगा। एक मौसम वैज्ञानिक होने के नाते मेरा यही अनुमान है कि इस साल जून के महीने में मानसून कमजोर रहेगा। अगर सारी स्थितियां सही रहीं तो मानसून धीरे-धीरे जुलाई में रफ्तार पकड़ सकता है और वह किसी हद तक जून की भी भरपायी कर सकता है, लेकिन यह जरूरी नहीं है। जैसा कि मैंने कहा कि मौसम की भविष्यवाणी करने वाली संस्था स्काईमेट का अनुमान है कि इस साल मानसून 93 फीसद तक रहेगा, जिसका मतलब यह है कि इस साल औसत से कम बारिश होगी। औसत बारिश तब मानी जाती है, जब मानसून 94 फीसद तक कम से कम हो।

मानसून में देरी के लिए सिर्फ अलनीनो जिम्मेदार नहीं
चूंकि जुलाई में अलनीनो कमजोर पड़ेगा तब नि:संदेह मानसून गति पकड़ेगा। एक बात जो मैं जोर देकर कहना चाहता हूं वह यह है कि यह मत समझा जाए कि मानसून की देरी का कारण सिर्फ अलनीनो है। इसमें और भी बहुत से कारक काम कर रहे हैं, जिसमें ग्लोबल वार्मिग, क्लाइमेट चेंज तो हैं ही, हमारी यानी इंसानी करतूतें भी मानसून की लेटलतीफी के लिए जिम्मेदार हैं। क्योंकि अलनीनो तो एक चक्र के तहत आता ही रहता है। कुदरत की एक किस्म से यह नियमित घटना है। लेकिन जो ग्लोबल वार्मिग है, जो जंगलों की लगतार कटान है, ये चीजें मानसून के लिए ज्यादा बड़ी चुनौती हैं। ये इसलिए भी खतरनाक हैं, क्योंकि ये इंसानी गतिविधियों का नतीजा हैं।

मानसून में देरी के इशारे को समझें
इसलिए जरूरी है कि हम बार-बार मानसून के लेट होने के इशारे को समझें। हम अपनी उन गतिविधियों पर लगाम लगाएं जो पर्यावरण को नुकसान पहुंचाती हैं। बढ़ता शहरीकरण भी इसमें एक है। बढ़ते शहरीकरण की भी मौसम के बदलाव में बड़ी भूमिका है। क्योंकि इससे बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई होती है। इसलिए बहुत सुचिंतित ढंग से जरूरी है कि हम लोग हर उस खाली जमीन में ज्यादा से ज्यादा पेड़ लगाने की कोशिश करें, ताकि इस बिगड़ते पर्यावरण पर लगाम लगे। हालांकि केंद्र और तमाम राज्य सरकारें बड़े पैमाने पर वनीकरण यानी पेड़ लगाने का काम करती हैं। लेकिन यह सब रस्म अदायगी जैसा होता है। अब दिल्ली से सटे फरीदाबाद को ही लें। पिछले कुछ वर्षो में यहां लाखों पेड़ लगाए गए, लेकिन वे कहां हैं पता नहीं? तो सवाल सिर्फ पेड़ लगाने का नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करने का है कि लगाए गए पेड़ पलें, बढ़ें, ताकि उनका कोई अर्थ हो।

अब चार-पांच दिनों की बारिश दो-ढाई घंटे में हो जाती है
एक यह बात भी ध्यान देने की है कि अभी हम चेत गए और अभी से पेड़ लगाने शुरू कर दिए तब तो अगले कुछ दशकों में थोड़ी राहत महसूस की जा सकती है, वरना धरती के सामूहिक विनाश से नहीं बचा जा सकता। क्योंकि ऐसा तो है नहीं कि किसी एक दिन हम बटन दबाएंगे और बड़ी तादाद में पेड़ खड़े हो जाएंगे। आम आदमी भी जितना संभव हो सके हरे पेड़ों को काटने से बचें। उन्हें अपने इर्दगिर्द की हर जमीन पर पेड़ लगाने की कोशिश करनी चाहिए। क्योंकि मानसून का लेट होना अपने आप में कोई समस्या नहीं है। लेकिन लेट होने के पीछे समस्या यह होती है कि मानसून कम बारिश की भरपायी नहीं कर पाता। एक और भी बात इस संदर्भ में देखने की है कि हमारी बारिश का पारंपरिक ढंग तेजी से बदल रहा है। बारिश अब उस पैटर्न पर नहीं होती कि चार-चार, पांच-पांच दिन झड़ी लगी रहे। अब चार-पांच दिनों की बारिश दो-ढाई घंटे में ही हो जाती है। इससे नुकसान यह होता है कि बारिश तो लगभग पहले जितनी ही होती है, लेकिन बारिश का पानी जमीन के अंदर नहीं जा पाता। तेज रफ्तार से बारिश होने के कारण वह पानी बह जाता है। इसलिए हमें अधिक से अधिक बारिश की गिरी बूंद के रूप में पानी को सहेजने की कोशिश करनी चाहिए।

महेश पलावत
[मौसम वैज्ञानिक, स्काईमेट]

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Posted By: Amit Singh