विजय कुमार गोठवाल। पिछले वर्ष आज ही के दिन जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 को खत्म किया गया था। यह तारीख भारतीय इतिहास में सदा के लिए स्मरणीय हो गई। कश्मीर की समस्या के समाधान को लेकर वैसे तो समय समय पर अलग-अलग सुझाव आते रहे हैं, लेकिन जब से अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी किया गया है, तब से 'इजरायली मॉडल' की चर्चा बहुत हुई है। इजरायल दुनिया का वह मुल्क है जिसने अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति, आत्मविश्वास व तकनीक के बूते दुश्मन राष्ट्रों को नाकों चने चबवाए हैं। अपने आतंरिक व बाह्य मसलों को सुलझाने में वह काफी हद तक सफल रहा है।

इजरायली मॉडल: वर्ष 1967 के युद्ध के बाद इजरायल ने वेस्ट बैंक, पूर्वी यरुशलम और गोलान की पहाड़ियों पर कब्जा कर लिया था। इससे पहले वेस्ट बैंक और पूर्वी यरुशलम पर जार्डन का अधिकार था जिस पर उसने 1948-49 युद्ध के दौरान कब्जा कर लिया था। वर्ष 1967 के युद्ध के बाद इजरायल ने ग्रीन लाइन (इजरायल की वास्तविक सीमा रेखा) के बाहर कब्जा जमा लिया था। अब मसला यह था कि ग्रीन लाइन के बाहर जिन जगहों पर कब्जा किया था वह इजरायल की सुरक्षा के लिहाज से सही नहीं था। यह इलाका इजरायल की सुरक्षा के लिए खतरा भी बन सकता था, लेकिन इजरायल इन इलाकों को खाली भी नहीं छोड़ सकता था।

इजरायल ने फैसला लिया कि वहां बस्तियां बसाई जाएं और इसके लिए विभिन्न प्रकार की रियायतें दी जाएं। देखते ही देखते इजरायल ने इन इलाकों में यहूदी बस्तियां बसा दीं। साथ ही इजरायल ने वहां पर कृषि तथा सड़क निर्माण का काम भी शुरू कर दिया जिसका फायदा यह हुआ कि इजरायल ने आज वहां पर सुरक्षा की दृष्टि से बहुत बड़ी कामयाबी हासिल कर ली है। वहां पर आंतरिक और बाह्य हमले की आशंकाएं बहुत कम हो गई हैं। इसके आलावा इस मॉडल की दूसरी महत्वपूर्ण चीज इजराइली सेना का उपद्रवियों और चरमपंथियों से निपटने का तरीका है, जिसे विभिन्न तकनीकों के माध्यम से अंजाम दिया गया, और जो चरमपंथियों को शांत करने में सफल रहा है।

कश्मीर में इसकी प्रासंगिकता: कश्मीर में शांति स्थापित करने के लिए कई आदर्शवादी मॉडल प्रस्तुत किए गए हैं, लेकिन इन आदर्शवादी मॉडलों से कश्मीर समस्या का समाधान नहीं हो सका। इसलिए वर्तमान में आदर्शवादी मॉडल के बजाय एक यथार्थवादी मॉडल की जरूरत है और यह इजरायली मॉडल एक यथार्थवादी मॉडल है। खासकर जब भारत ने जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी कर दिया है, इस मॉडल के जरिये अपनी योजनाओं और कार्यक्रमों को लागू करने में आसानी होगी। यह सभी जानते हैं कि कश्मीर में अलगाववाद पिछले तीन दशकों से एक बड़ी समस्या के रूप में उभरकर सामने आया है। यहां अलगाववाद को बढ़ावा इसलिए भी मिला, क्योंकि यहां के लोगों का भारत के अन्य क्षेत्रों व धर्मों के लोगों से संपर्क नहीं के बराबर रहा। पिछली सदी के आखिरी दशक में तो इन अलगाववादियों ने यहां से जब अधिकांश कश्मीरी पंडितों और सिखों को भगा दिया, तो जो यहां बच भी गए, उनका स्वाभाविक तौर पर अन्य धर्मों को मानने वालों से संपर्क बहुत ही कम हो गया। इसका सबसे अधिक फायदा यहां पर अलगाववादी ताकतों ने उठाया। समय आ गया है कि इनका समूल नाश किया जाए। इस संदर्भ में भी इजरायल मॉडल कारगर साबित हो सकता है।

समय रहते हालात पर नियंत्रण: पिछले वर्ष पांच अगस्त से पहले यह कहा जा रहा था कि अनुच्छेद 370 हटने पर कश्मीर में बवाल हो सकता है। लेकिन आप देखिए कि सरकार ने समय रहते व्यापक तैयारी के साथ इसे अंजाम दिया, परिणामस्वरूप पहले से जिस तरह की आशंकाएं व्यक्त की जा रही थीं, कश्मीर में ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। इसका पूरा श्रेय केंद्र सरकार को जाता है जिसने कश्मीर की स्थिति का बारीकी से मूल्यांकन किया और समय रहते कार्रवाई करके हालात को बेकाबू नहीं होने दिया।

कश्मीर में अगली कड़ी में हमें वही करना चाहिए जैसे इजरायल ने गाजा, वेस्ट बैंक तथा गोलान की पहाड़ियों में यहूदियों को बसाकर वहां पर शांति और सुरक्षा का मुकाम हासिल किया है। उसी तरह हमें भी कश्मीर में कश्मीरी पंडितों की बसावट को सुनिश्चित करना चाहिए, बल्कि भारत के तमाम हिस्सों से अलग अलग धर्मों के लोगों को भी वहां पर बसने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए, ताकि अलगाववादियों की ताकत को कम किया जा सके और साथ ही एक नए समाज का निर्माण किया जा सके। इससे एक बड़ा फायदा यह भी होगा कि पाकिस्तान जिस तरह से आतंकवादियों को कश्मीर भेजता रहा है और यहां का एक कट्टरपंथ वर्ग उसे संरक्षण देता रहा है, वह प्रक्रिया पूरी तरह से नियंत्रित हो जाएगी, क्योंकि नए समाज में किसी भी आतंकी को संरक्षण देने वाला कोई नहीं होगा।

इसके आलावा इजरायली मॉडल की तर्ज पर जम्मू-कश्मीर में संरचनात्मक कार्यों को बढ़ावा देना चाहिए, मसलन व्यापक बुनियादी ढांचा निर्माण के साथ कृषि और उद्योग धंधों को प्रोत्साहित करना चाहिए, ताकि यहां रोजगार के नए नए अवसर सामने आ सकें और जब यह सब संभव हो जाएगा तो फिर यहां के युवाओं को गलत राह पर जाने से प्रभावी तौर पर रोका जा सकता है। इन तमाम प्रयासों से निश्चित रूप से आने वाले वर्षों में हम जम्मू-कश्मीर में एक बड़ा बदलाव देख सकते हैं।

[पीएचडी रिसर्च स्कॉलर, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय]

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