नई दिल्ली [ तरुण विजय ]। भारत मूर्तिभंजकों के हमलों का शिकार रहा है, लेकिन हमने कभी मूर्तिभंजन नहीं किया। हमने विश्व प्रसिद्ध मूर्तियों का निर्माण अवश्य किया है। अजंता-एलोरा से लेकर तंजौर तथा कोणार्क से हम्पी और द्वारका से अवंतीपुर (कश्मीर) तक भारतीय सृजनशीलता के उदाहरण हैं। आखिर जो निर्माण का स्वप्नदर्शी है वह ध्वंस को कैसे स्वीकार कर सकता है? त्रिपुरा में सामान्य चुनाव परिणाम नहीं आए। 25 वर्षों से लगातार चला आ रहा कम्युनिस्ट शासन समाप्त होना अंतरराष्ट्रीय महत्व का विषय बना। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा की विचारधारा में ऐसी धीरता, शक्ति और उद्यमता है, यह प्रकट हुआ। वरना कुछ ऐसी अपमानजनक टिप्पणियां की जाती थी, ‘ये संघ-भाजपा वार्ले हिंदू काऊ बेल्ट के हैं।...उत्तर पूर्व के ईसाई-जनजातीय इन्हें क्यों स्वीकार करेंगे?’ कम्युनिस्ट पहले से ही विदेश में जन्मी विचारधारा और उस बोल्शेविक क्रांति के अनुगामी हैं जिसके नेता लेनिन, स्टालिन और माओत्से तुंग रहे हैं।

त्रिपुरा में किसी भारतीय कम्युनिस्ट नेता को सम्मान क्यों नहीं मिला

त्रिपुरा में दीर्घकालीन कम्युनिस्ट शासन के दौरान उन्हें किसी भारतीय कम्युनिस्ट नेता को सम्मान देना याद नहीं आया- ईएमएस नंबूदिरीपाद, अजय बोस, बीटी रणदिवे, पीसी जोशी आदि सब किनारे कर दिए गए। उन्हें याद रहे तो लेनिन, जो सोवियत संघ में भीषण रक्तपात, नरसंहार और हिंसा के जनक रहे। त्रिपुरा में कम्युनिस्ट शासन के अंत से उत्साहित लोगों ने लेनिन की मूर्ति गिरा दी। एकबारगी ऐसा लगा मानों रूस में परिवर्तन के बाद लेनिनग्राद में लेनिन की मूर्तियां हटाकर शहर का नाम वापस सेंट पीटर्सबर्ग रखा जा रहा हो। तमिलनाडु में द्रविड़ अतिरेकी विचार के प्रवर्तक पेरियार की मूर्तियां भी हटाई जाएंगी, ऐसी घोषणा होने लगी। एक मूर्ति को क्षति भी पहुंचाई गई। त्रिपुरा की घटना के जवाब में कोलकाता में श्यामाप्रसाद मुखर्जी की प्रतिमा को नष्ट करने की कोशिश की गई। इसके बाद मेरठ में बाबा साहब आंबडेकर की प्रतिमा को नुकसान पहुंचाया गया। देश के अन्य स्थानों में भी कुछ प्रतिमाओं को निशाना बनाने की कोशिश हुई। क्या यह सभ्य व्यवहार कहा जा सकता है?

हमारे मंदिरों के मलबे से बनी इमारत को नाम दिया-कुवतुल ए इस्लाम मस्जिद 

दिल्ली में कुवतुल मस्जिद जैन मंदिरों को ध्वस्त कर उसके मलबे से बनाई गई। कुतुबुद्दीन एबक से लेकर अलाउद्दीन खिलजी इस ध्वंस के सूत्रधार थे। हमारे मंदिरों के मलबे से बनी इमारत को नाम दिया-कुवतुल ए इस्लाम मस्जिद यानी इस्लाम की शक्ति वाली मस्जिद। दुर्भाग्य से वर्हां हिंदू पर्यटक मनोरंजन के लिए जाते हैं। 1947 के बाद कभी किसी ने कुवतुल मस्जिद की जगह जैन मंदिर बनाने या फिर लोदी, हुमायूं के मकबरे ध्वस्त करने की मांग नहीं की। लोदी गार्डन तो उच्च वर्ग के सैर का प्रसिद्ध क्षेत्र है। इस्लामी जिहादी खुद को मूर्तिभंजक-बुतशिकन कहने में गर्व महसूस करते थे, हम नहीं। हम निर्माण, सृजन, रचनात्मकता का देश और समाज हैं। विपक्षी विरोधी यहां तक शत्रु से भी हमने घृणा नहीं की। भाई कन्हैया जैसे उदाहरण भारत में हैं जिन्होंने युद्ध थमने पर अपने खेमे के सिखों के साथ-साथ शत्रु मुस्लिम घायल फौजियों को भी पानी पिलाया था। प्रश्न उठता है कि फिर वैचारिक विरोधी के साथ कैसा व्यवहार किया जाए? वे हमारे कार्यकर्ताओं की जघन्य हत्याएं करते हैं।

चीन में कम्युनिस्ट शासन फिर भी लेनिन की प्रतिमा नहीं

केरल में दो सौ से ज्यादा संघ-भाजपा युवा कार्यकर्ता कम्युनिस्र्ट हिंसा के शिकार हुए हैं। त्रिपुरा में चुनाव के दौरान ही कई भाजपा कार्यकर्ता मार डाले गए। ऐसी हिंसा पर जो मीडिया और नेता खामोश रहे, न निंदा की, न मृतकों के परिवार से सहानुभूति दर्शाई, वे लेनिन की मूर्ति हटाए जाने पर कुछ ऐसे चिल्लाए मानों संविधान खतरे में पड़ गया हो। ऐसे लोगों की नीयत पर शक होना लाजिमी है। उनके रवैये पर टिप्पणी व्यर्थ है, लेकिन आखिर लेनिन के प्रति इस हद तक आसक्ति क्यों? चीन में कम्युनिस्ट शासन है। वहां के अधिकांश शहरों का मैंने भ्रमण किया है। जहां भी कम्युनिस्ट नेताओं की मूर्तियां देखीं वे चीनी नेताओं की थीं, लेनिन की कहीं मूर्ति नहीं, पर त्रिपुरा में लेनिन। यह विडंबना कम्युनिस्टों की भारत से विरक्ति ही कही जाएगी, लेकिन कम्युनिस्टों को परास्त करने का पराक्रम दिखाने वाले भिन्न लोग हैं। पंडित नेहरू जब 1950 में लंदन गए तो उनकी अल्पसंख्यकपरस्त नीतियों से क्षुब्ध वहां के भारतीय उनके विरुद्ध सार्वजनिक विरोध प्रदर्शन की तैयारी में थे।

कम्युनिस्टों में हिंसा और असहिष्णुता कूट-कूट कर भरी है

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तत्कालीन सरसंघचालक गोलवलकर ने इसके लिए मना किया। उन्होंने कहा था कि विदेश में भारत के प्रधानमंत्री हैं। त्रिपुरा और तमिलनाडु में वैचारिक विरोधियों को हम अपनी श्रेष्ठतर सत्ता व्यवस्था, शासन, सृजनशीलता से नीचा कर सकते हैं। यदि हमारे अर्थात किसी भी वर्ग या समुदाय द्वारा वही तरीका अपनाया जाता है जो वह हमारे विरुद्ध अपनाता है यानी अमानुषिक, बर्बर और असभ्य तो वह हार कर भी जीत जाता है। यह सत्य है कि कम्युनिस्टों में हिंसा और असहिष्णुता कूट-कूट कर भरी है, लेकिन आज कम्युनिस्ट इसी मानसिकता के कारण पूरे देश की जनता द्वारा अस्वीकृत कर दिए गए हैं। कभी पंजाब, पूर्वी उत्तर प्रदेश, बंगाल, बिहार, तेलंगाना, महाराष्ट्र में उनकी सम्मानजनक उपस्थिति हुआ करती थी। आज वे नाम शेष हैं। जो खंडहर हैं वे भी बंगाल बनाम केरल कम्युनिस्ट होकर आपस में झगड़ रहे हैं। जो उनका बचा-खुचा शासन केरल में है वह भी अगले चुनाव में समाप्त हो जाएगा, यह स्पष्ट दिख रहा है।

त्रिपुरा में भाजपा की जीत विचार और आचार की जीत

त्रिपुरा में भाजपा की जीत विचार और आचार की जीत है। पंडित दीनदयाल उपाध्याय और श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने अपने कटुतम विरोधी पर भी कभी शब्द प्रहार नहीं किए। एक शब्द भी अपने विपक्षी के खिलाफ व्यक्तिगत आक्षेप का नहीं कहा। त्रिपुरा के मुख्यमंत्री बिप्लब देब ने परास्त कम्युनिस्ट नेता माणिक सरकार के चरण स्पर्श कर उस महान आदर्श को जिया। विजय में विनम्रता ही शोभायमान होती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने त्रिपुरा तथा तमिलनाडु में लेनिन व पेरियार के मूर्तिभंजकों को चेतावनी देकर अपनी विरासत और परंपरा के साथ न्याय ही किया है। इनके सामने सदियों से आहत, प्रताड़ित, तिरस्कृत भारतीय आत्मा के पुनरुज्जीवन का विराट कार्य है। केवल चुनावी गणित में सफलता नहीं, बल्कि राजनीतिक शिष्टाचार, शालीनता एवं वैचारिक शत्रुओं को पराजित करने का लक्ष्य सतत् जागरूकता एवं अनथक परिश्रम मांगता है। मोदीशाह ने अपनी वैचारिक निष्ठा और श्रम करने की असाधारण क्षमता से चमत्कृत किया है। उनका विजय रथ सतत् गतिमान रहे, यह कार्यकर्ताओं के व्यवहार पर निर्भर है। अहंकार और अतिरेकी उत्साह गति मंद करते हैं। महर्षि स्वामी दयानंद मूर्ति पूजा के विरोधी थे, पर उन्होंने पाखंड खंडिनी पताका बनाई, मूर्तिभंजन अभियान नहीं चलाया। मूर्ति-भंजन तो विचारशून्य करते हैं, विचार-धन सृजन को बढ़ाता है। यही है भारत और विदेश निष्ठ तत्वों में फर्क।

(लेखक राज्यसभा के पूर्व सदस्य और स्तंभकार हैं) 

By Sanjay Pokhriyal