राहुल लाल। US-Iran Tension: ईरान और अमेरिका के बीच जारी तनाव का भारतीय अर्थव्यवस्था पर काफी गहरा असर पड़ता दिख रहा है। एक अनुमान के मुताबिक अगर कच्चे तेल की कीमत 10 डॉलर प्रति बैरल बढ़ती है, तो भारत को हर माह तकरीबन 1.5 अरब डॉलर ज्यादा चुकाने होंगे। कच्चे तेल के अलावा भी कई ऐसे क्षेत्र हैं, जहां पर ईरान और अमेरिकी तनातनी का सीधा असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।

कच्चे तेल का आयात और भारतीय अर्थव्यवस्था

नवीन परिस्थितियों में भारत तेल आयात में अमेरिका पर अपनी निर्भरता में लगातार वृद्धि कर रहा है। पिछले वर्ष जब अमेरिका ने ईरान पर कठोरता से प्रतिबंधों को क्रियान्वित किया, तो अचानक से भारत ने अमेरिका से तेल आयात में 96 प्रतिशत की वृद्धि कर दी। जून 2018 में अमेरिका से केवल 0.52 मिलियन टन तेल आयात किया गया था, जबकि जून 2019 में इससे करीब दोगुना यानी 1.02 मिलियन टन आयात किया गया। अभी अमेरिका से छह मिलियन टन तेल आयात किया जा रहा है, लेकिन अब भारत सरकार ने अमेरिका से कच्चे तेल के आयात को दोगुना करने का निर्णय लिया है। इसका आशय है कि भारत अमेरिका से 12 मिलियन टन तेल आयात करेगा। भारत सरकार का कहना है कि इससे मध्य-पूर्व पर हमारी निर्भरता घटेगी। लेकिन अमेरिका से तेल आयात पर निर्भरता में वृद्धि भी हमारे तेल आयात के बजट में भारी वृद्धि कर रहा है।

इस संपूर्ण मामले को समझने के लिए तेल के गणित को समझना आवश्यक है। भारत इस समय सबसे ज्यादा 46.6 मिलियन टन तेल इराक से आयात करता है। दूसरा स्थान सऊदी अरब का है, जिससे भारत 40.3 मिलियन टन खरीदता है। तीसरे स्थान पर यूएई से 17.5 मिलियन टन कच्चा तेल आयात किया जा रहा है। भारत एशिया में चीन के बाद दूसरा सबसे बड़ा तेल आयातक है। भारत अपनी आवश्यकता का 84 प्रतिशत तेल आयात करता है। भारत के लिए कच्चा तेल आयात में समस्या तभी उत्पन्न हो गई थी, जब वर्ष 2018 में अमेरिका एकपक्षीय रूप से ईरान से वर्ष 2015 के न्यूक्लियर डील से बाहर हो गया था।

अमेरिका उसी समय से भारत पर ईरान से तेल नहीं आयात करने का दबाव बना रहा था। अप्रैल 2019 में ट्रंप ने स्पष्ट कर दिया कि भारत ईरान से तेल नहीं खरीदे और भारत ने एक मई 2019 से ईरान से तेल खरीदना बंद कर दिया। ईरान से तेल आयात करने वाले देशों में भारत चीन के बाद दूसरे स्थान पर था। ईरान द्वारा भारत को अंतरराष्ट्रीय स्तर से कम से कम 25 प्रतिशत कम दर पर तेल मिल रहा था। इसके अतिरिक्त ईरान अन्य ओपेक देशों की तरह ‘एशियाई प्रीमियम चार्ज’ भी नहीं लगाता है। एशियाई प्रीमियम चार्ज भी प्रति बैरल चार से पांच डॉलर तक होता है। वैसे यह दर भले ही कम लग रहा हो, लेकिन जब लाखों बैरल तेल की खरीद की जा रही है, तो यह राशि भी काफी ज्यादा है।

अब प्रश्न उठता है कि यह ‘एशियाई प्रीमियम चार्ज’ क्या है? ओपेक देशों का कहना है कि संपूर्ण दुनिया में तेल के मूल्य बराबर होने चाहिए। एशियाई देशों को तेल का परिवहन लागत कम लगता है, जबकि अन्य दूरस्थ देशों को परिवहन लागत ज्यादा लगता है। ऐसे में एशियाई देशों पर प्रीमियम चार्ज लगाकर मूल्यों में समानता कायम की जाती है। वैसे भारत लगातार इस एशियाई प्रीमियम चार्ज का विरोध करता रहा है और ईरान इस तरह का कोई चार्ज नहीं लगाता था। इसके अतिरिक्त ईरान से तेल लेने के लिए डॉलर में भुगतान की भी आवश्यकता नहीं होती थी। वह दवाओं और खाने पीने की विभिन्न वस्तुओं के बदले भी हमें तेल उपलब्ध कराता था।

अमेरिका हाल के वर्षों में अचानक तेल आयातक से तेल निर्यातक देश में परिवर्तित हुआ है। वह नवीन शैल टेक्नोलॉजी द्वारा कच्चे तेल का भारी उत्पादन कर रहा है। अब अमेरिका अपने तेल बेचने के लिए नई वैश्विक रणनीति बना रहा है, जिसमें भारत पर अमेरिकी तेल खरीदने का दबाव बनाया जा रहा है। शुरुआत में अमेरिका ने सस्ते तेल देने का आश्वासन दिया था, परंतु जल्द ही उसने भारत को स्पष्ट कर दिया कि तेल निर्यात का कार्य प्राइवेट अमेरिकी कंपनी कर रही है, ऐसे में अमेरिकी सरकार मूल्यों के मामले में हस्तक्षेप कर भारत को विशेष लाभ पहुंचाने में सक्षम नहीं है। ईरान के तेल गुणवत्ता की दृष्टि से दुनिया में सर्वश्रेष्ठ माने जाते हैं, इसलिए ईरानी तेल को ‘स्वीट ऑयल’ भी कहा जाता है। इसकी तुलना में अमेरिकी तेल न केवल काफी महंगे हैं, अपितु गुणवत्ता में भी काफी पीछे हैं। भारत कच्चे तेल का आयातक अवश्य है, लेकिन रिफाइन तेल का निर्यातक भी है। भारतीय रिफाइनरी ईरानी कच्चे तेल के अनुरूप डिजाइन किए गए थे, परंतु ईरानी तेल के स्थान पर अमेरिकी तेल आयात किए जाने से हमारी रिफाइनरी की क्षमता भी व्यापक रूप से प्रभावित हुई है। फलत: रिफाइन तेल का निर्यात काफी घट गया है। पिछले कुछ माह से भारतीय निर्यात की दर लगातार ऋणात्मक चल रही है।

कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें

बीते सप्ताह जिस तरह से अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में एक ही दिन में चार डॉलर की वृद्धि हुई, वह भी भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए बुरी खबर है। आर्थिक विकास दर की धीमी रफ्तार को बढ़ाने के प्रयासों में केंद्र सरकार को झटके लग सकते हैं। अगर तेल मूल्य अभी वाले दर पर भी स्थिर रहते हैं, तो भी सरकार पर कम से कम 55 हजार करोड़ का अतिरिक्त वित्तीय बोझ पड़ेगा। पिछले वर्ष बजट प्रस्तुत करते हुए वित्त मंत्री ने इस वित्त वर्ष में राजकोषीय घाटा का लक्ष्य 7.01 लाख करोड़ रखा था, लेकिन केंद्र सरकार का राजकोषीय घाटा अप्रैल-अक्टूबर में ही 7.2 लाख करोड़ पहुंच चुका है। ऐसे में तेल मूल्यों में वृद्धि से इस राजकोषीय घाटे में और भी वृद्धि होगी। कच्चे तेल में वृद्धि से महंगाई पर भी असर पड़ता है।

कच्चे तेल की कीमत में अगर 10 डॉलर प्रति बैरल की भी वृद्धि होती है तो देश में महंगाई दर में 0.5 फीसद वृद्धि हो जाएगी। अगर महंगाई बढ़ती है, तो रिजर्व बैंक ब्याज दरों में कमी नहीं कर सकेगा। इसका सीधा असर लोगों की और कॉरपोरेट की कर्ज लेने की क्षमता पर भी पड़ता है। अगर लोग कम कर्ज लेंगे और कॉरपोरेट कर्ज लेकर निवेश नहीं करेंगे, तो इसका असर रोजगार पर पड़ता है। इसको इस तरह से समझ सकते हैं कि अगर कच्चे तेल की कीमतें बढ़ती हैं, तो भारतीय अर्थव्यवस्था एक कुचक्र में फंस जाती है।

ईरान और अमेरिका के बीच स्थिति को देखते हुए भारत के लिए इराक से तेल आयात करना भी भविष्य में ज्यादा आसान नहीं रहेगा। यह भारत के लिए ज्यादा चिंता की बात है, क्योंकि पिछले कुछ वर्षों में इराक भारत का सबसे भरोसेमंद व सबसे बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता देश बना रहा है। वर्ष 2018 में भारत ने इराक से 23 अरब डॉलर का तेल खरीदा था। चालू वित्त वर्ष के पहले छह माह में 2.6 करोड़ टन तेल खरीदा है। दूसरी तरफ वर्ष 2018 में ईरान से 13 अरब डॉलर का तेल खरीदा गया था और अभी इसे पूरी तरह से बंद कर दिया गया है।

चाबहार परियोजना पर असर

ईरान अमेरिकी तनाव का अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों पर प्रभाव दिखना प्रारंभ हो चुका है। वैश्विक तौर पर सोने की कीमत में उछाल आया है। भारत में सोने की कीमतों में काफी बढ़ोतरी हुई है। वैश्विक घटनाक्रम व सुरक्षित निवेश की मांग इसकी वजह है। अगर ईरान और अमेरिका के तनाव में वृद्धि होती है, तो इससे भारत को सामरिक रूप से बड़ा झटका लग सकता है। भारत ईरान में चाबहार पोर्ट विकसित कर रहा है। इस पोर्ट के द्वारा भारत अफगानिस्तान और मध्य एशिया से सीधे व्यापार कर सकेगा। ईरान और अमेरिका के बीच तनाव जारी रहा तो इस परियोजना पर कार्य ठप हो सकता है। ऐसे माहौल में कोई भी कंपनी, यहां तक कि भारतीय कंपनियां भी, इस परियोजना में निवेश करने से दूरी बना लेंगी। अमेरिका ने ईरान पर प्रतिबंधों को और कठोर कर दिया है, लेकिन चाबहार पर अभी भारत को छूट प्राप्त है। स्पष्ट है कि मध्य-पूर्व के इस तनाव का भारतीय अर्थव्यवस्था पर अत्यंत व्यापक एवं गहरा प्रभाव पड़ रहा है। भारत के लिए आवश्यक है कि उपयुक्त कूटनीति के साथसाथ बेहतर अर्थनीति के द्वारा इस मामले के प्रभावों को न्यूनतम करे।

विदेशी मुद्रा को लग सकता है झटका

ईरान समेत खाड़ी देशों में 80 लाख से ज्यादा भारतीय रहते हैं। अगर ईरान और अमेरिका के बीच माहौल गर्म रहता है, तो पूरा खाड़ी क्षेत्र अस्थिर होता है। इसका सीधा असर प्रवासी भारतीयों द्वारा भारत भेजे जाने वाले विदेशी मुद्रा पर भी होगा। एक अनुमान के अनुसार खाड़ी क्षेत्र के प्रवासी भारतीय सालाना 40 अरब डॉलर विदेशी मुद्रा भारत भेजते हैं। अगर ईरान और अमेरिका के बीच तकरार बढ़ती है, तो वहां रहने वाले प्रवासी भारतीयों पर इसका सीधा असर पड़ता है। ईरान के जनरल कासिम सुलेमानी की हत्या के बाद अमेरिका ने अपने नागरिकों को इराक से निकालना शुरू कर दिया है।

अगर ऐसा ही भारतीयों के साथ होता है, तो इससे एक ओर देश को विदेशी मुद्रा का झटका लगेगा, जबकि दूसरी ओर अगर बड़ी संख्या में लोग वापस आ जाते हैं, तो उनके लिए रोजगार मुहैया कराना भी सरकार के लिए चुनौती होगी। ईरान और भारत पीटीए अर्थात प्रेफरेंशियल ट्रेड एग्रीमेंट को लेकर बातचीत कर रहे हैं। इसके अंतर्गत दोनों देश अपने बहुत से उत्पादों पर शुल्क और ड्यूटीज खत्म कर सकते हैं। इससे बहुत से उत्पादों का आयात और निर्यात तेजी से बढ़ जाएगा और इसका लाभ दोनों देशों की अर्थव्यवस्था को होगा। लेकिन जिस तरह से ईरान अमेरिका के बीच तनाव में लगातार वृद्धि जारी है, उससे पीटीए पर होने वाली वार्ता भी रुक सकती है।

निर्यात प्रभावित होने की आशंका

ईरान भारत का मुख्य व्यापारिक साझेदार है। भारत ईरान को अनाज, चाय, कॉफी, बासमती चावल, मसाले और ऑर्गेनिक केमिकल्स आदि निर्यात करता है। वर्ष 2018-19 में भारत ने ईरान को 24 हजार करोड़ का निर्यात किया था, परंतु यह अब संकट में है। अमेरिका-ईरान तनाव में लगातार वृद्धि से भारत का चाय निर्यात भी प्रभावित होगा। जनवरी-नवंबर 2019 के बीच ईरान ने पहली बार पांच करोड़ किलोग्राम से ज्यादा चाय भारत से खरीदी और इसकी कीमत 280 रुपये प्रतिकिलो रही। इस वजह से ईरान भारत के लिए सबसे बड़ा चाय निर्यातक देश बन गया है।

कारोबार के लिहाज से ईरान का चाय निर्यात एक साल पहले की तुलना में दोगुना होकर 1,415 करोड़ रुपये पहुंच गया है। ईरान के खिलाफ प्रतिबंधों से हल्दी निर्यात पर भी असर पड़ा है। ईरान साबुत हल्दी का सबसे बड़ा खरीदार है। ईरान को होने वाला बासमती चावल का निर्यात वर्ष 2018-19 में 1.56 अरब डॉलर रहा। मौजूदा हालात में बासमती के निर्यात पर 25 प्रतिशत तक का असर पड़ सकता है। वर्तमान में बासमती निर्यातकों की ईरान के पास करीब 1,200 करोड़ भुगतान बकाया है।

[स्वतंत्र टिप्पणीकार]

Posted By: Sanjay Pokhriyal

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