[डॉ. लक्ष्मी शंकर यादव]। अंतरिक्ष में अपनी धाक जमाने के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 29 अगस्त को अंतरिक्ष कमान स्पेसकॉम की स्थापना के साथ ही अंतरिक्ष बल की भी नींव रख दी। डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिकी हितों की रक्षा के लिए एकीकृत इकाई की आवश्यकता बताते हुए कहा कि भविष्य में अंतरिक्ष ही अगला युद्ध क्षेत्र होगा। उन्होंने कहा कि अंतरिक्ष कमान स्पेसकॉम ही अंतरिक्ष बल यानी स्पेस फोर्स की स्थापना की राह तैयार करेगा। अमेरिका की इस अंतरिक्ष कमान के लिए जनरल जॉन डब्ल्यू रेमंड को कमांडर बनाया गया है। इस कमांड को अमेरिका के सशस्त्र बलों की 11वीं एकीकृत लड़ाकू कमान के तौर पर स्थापित किया गया है। इस कमान में आरंभ में केवल 287 अधिकारी और जवान रखे जाएंगे।

स्पेसकॉम अंतरिक्ष 
शुरुआत में इस कमान की जिम्मेदारियां अमेरिका की रणनीतिक कमान से ली जाएंगी। अमेरिकी सेना के कमांडर इन चीफ ट्रंप ने कहा कि यह बड़ी बात है कि सबसे नई लड़ाकू कमान के तौर पर स्पेसकॉम अंतरिक्ष में अमेरिका के अहम हितों की रक्षा करेगी जो अगला युद्ध क्षेत्र है। स्पेसकॉम यह भी सुनिश्चित करेगी कि अंतरिक्ष में अमेरिकी प्रभुत्व पर कोई खतरा न रहे। डोनाल्ड ट्रंप ने रूस और चीन को उन देशों के रूप में रखा है जो अंतरिक्ष में उसके लिए खतरा बन सकते हैं। इसलिए जो लोग अंतरिक्ष के सर्वोच्च क्षेत्र में अमेरिका को नुकसान पहुंचाना चाहते हैं, उनके लिए खेल पूरी तरह से बदल जाएगा।

लड़ाकू कमान पर निगरानी
ट्रंप प्रशासन का यह भी कहना है कि कई अन्य देश पृथ्वी की कक्षाओं को नित-नई तकनीकों से सुसज्जित कर रहे हैं जो युद्धक क्षेत्रों के अभियानों और हमारी जीवन शैली के लिए काम कर रहे महत्वपूर्ण उपग्रहों को निशाना बना सकती हैं। इस स्थिति से निपटने के लिए या यूं कहिए कि अमेरिका के विरुद्ध प्रक्षेपित की गई किसी भी मिसाइल को पहचानने अथवा उसे नष्ट करने के लिए अंतरिक्ष में उसकी ताकत व परिचालन की स्वतंत्रता अत्यंत जरूरी है। इसलिए अमेरिका जमीन, हवा, समुद्र एवं अंतरिक्ष को समर क्षेत्र के रूप में चिन्हित कर चुका है। एकीकृत लड़ाकू कमान इन पर निगरानी रखेगी।

अमेरिका की इस स्पेस फोर्स का गठन वहां की संसद की स्वीकृति पर टिका है। उसकी स्वीकृति मिलने के बाद स्पेस फोर्स के नए सैनिकों की भर्ती की जाएगी। फिर उन्हें प्रशिक्षित किया जाएगा। ये सैनिक रूस व चीन से अमेरिकी उपग्रहों की रक्षा की जिम्मेदारी संभालेंगे, क्योंकि यही दोनों देश उपग्रह विरोधी हथियार तैयार कर रहे हैं। दरअसल अमेरिका की एक खुफिया एजेंसी ने वर्ष 2018 में यह जानकारी दी थी कि ये दोनों देश अगले दो-तीन साल में अमेरिकी उपग्रहों को नष्ट करने में सक्षम हो जाएंगे। इस जानकारी के बाद से अमेरिका की चिंता बढ़ गई, क्योंकि दुनिया के अनेक हिस्सों में तैनात लड़ाकू विमानों व युद्धपोतों को निर्देशित करने में ये उपग्रह ही मदद करते हैं। इस संबंध में अमेरिकी वायु सेना के परमाणु और अंतरिक्ष अभियान के पूर्व अधिकारी ब्रायन वेडन का कहना है कि आने वाले दिनों में जमीन पर होने वाले संघर्षों में अंतरिक्ष की विशेष भूमिका होगी।

अमेरिकी सेना की छठी शाखा
स्पेस फोर्स अमेरिकी सेना की छठी शाखा होगी। फिलहाल अमेरिकी सेना में कुल पांच शाखाएं हैं। इनमें वायु सेना, थल सेना, कोस्ट गार्ड, मरीन कॉप्र्स एवं नौसेना शामिल है। अब स्पेस फोर्स छठी शाखा बनेगी। इसके लिए सबसे पहले अमेरिकी स्पेस कमांड बनाया जाएगा जो इसी वर्ष बनकर तैयार होगा। इसके बाद अगले वर्ष तक इसे स्वतंत्र विभाग के तौर पर सेना में शामिल किया जाएगा। स्पेस फोर्स सैन्य विभाग की ऐसी शाखा होती है जो अंतरिक्ष में युद्ध करने में सक्षम होती है। फिलहाल अंतरिक्ष में अगला विश्व युद्ध होने की आशंका के मद्देनजर अमेरिका की तैयारियां जोरों पर हैं। इस नई सेना की तैनाती के पीछे रूस और चीन से मिलने वाला खतरा बड़ी वजह है। दरअसल वर्तमान में अमेरिका संचार, नेवीगेशन और गोपनीय सूचनाओं के लिए उपग्रहों पर अत्यधिक निर्भर हो गया है। ऐसे में अमेरिका का चिंतित होना स्वाभाविक है, क्योंकि अगर अमेरिकी उपग्रहों पर किसी तरह का आक्रमण हुआ तो अमेरिका की सुरक्षा को खतरा हो सकता है।

अमेरिका व रूस को हासिल है उपग्रह नष्ट करने की क्षमता
अमेरिका, रूस और चीन अपनी इस क्षमता का प्रदर्शन कर चुके हैं जिसके तहत अंतरिक्ष में मौजूद किसी भी उपग्रह को धरती से मिसाइल दागकर तबाह किया गया हो। अमेरिका ने तो किसी यान को गिराने का शोधकार्य तभी से शुरू कर दिया था जब रूस ने वर्ष 1957 में अपना पहला उपग्रह ‘स्पुतनिक-1’ अंतरिक्ष में भेजा था। इसके बाद रूस भी इस क्षेत्र में आगे बढ़ा और तीन साल में एक ऐसे उपग्रह का परीक्षण किया जो दूसरे उपग्रह के पास जाकर स्वयं को विस्फोट से उड़ाकर उसे भी तबाह कर सकता था। वर्ष 2015 में उसने एंटी सेटेलाइट मिसाइल का भी सफल परीक्षण किया है। मालूम हो कि अमेरिका ने 13 सितंबर 1985 को ही अपना अंतिम उपग्रह भेदी परीक्षण किया था। इसके बाद अमेरिका ने यह कहकर इस पर रोक लगा दी थी कि नष्ट हुए उपग्रह के टुकड़े दूसरे उपग्रहों को नुकसान पहुंचा सकते हैं।

महाशक्तियों में टकराव की आशंका
ऐसी स्थितियों से यह सवाल खड़ा हो गया है कि अगर विश्व की दो महाशक्तियां आमनेसामने आती हैं तो युद्ध का स्वरूप क्या होगा? निश्चित है कि जमीनी लड़ाई में तो किसी भी परमाणु शक्ति संपन्न देश से पार पाना संभव नहीं होगा। इसलिए संसार की महाशक्तियां अंतरिक्ष में जंग लड़ने की तैयारी में जुट गई हैं, क्योंकि उन्हें मालूम है कि वर्तमान में किसी देश का पत्ता तक उपग्रहों से ही खड़कता है। जब एक उपग्रह केवल इस उद्देश्य के साथ अंतरिक्ष में भेजा जाए कि वह वहां लक्षित उपग्रह को नुकसान पहुंचा सके तो ऐसा अवश्य होगा, लेकिन इसमें हमलावर उपग्रह का भी नुकसान होगा। इसलिए अब हर उपग्रह को भेजने से पहले उसे अत्याधुनिक तरीकों से सुसज्जित करना पड़ेगा जिसकी तैयारियां भी कई देशों में चल रही हैं। उपरोक्त विवेचन से यह निष्कर्ष निकलता है कि इन गतिविधियों पर लगाम लगाने का वक्त आ गया है। इसलिए समूचे संसार के लिए यही उचित होगा कि अंतरिक्ष का सैन्यीकरण रोकने के लिए समझौता किया जाए, अन्यथा दुनिया के अन्य देश भी ऐसी तकनीक हासिल कर अंतरिक्ष में आधिपत्य की तैयारी में लग जाएंगे।

अमेरिका ने पृथ्वी की कक्षा में घूम रहे अपने उपग्रहों की सुरक्षा के लिए अंतरिक्ष कमान की स्थापना की नींव रखी है। इस समय चार देशों के पास मिलिट्री स्पेस कमांड हैं। इनमें चीन के पास पीपुल्स लिबरेशन आर्मी स्ट्रेटजिक सपोर्ट फोर्स, रूस के पास रूसी एयरोस्पेस फोर्सेज, फ्रांस के पास फ्रेंच ज्वाइंट स्पेस कमांड तथा इंग्लैंड के रॉयल एयर फोर्स एयर कमांड हैं। इन सभी बलों का काम अंतरिक्ष में अपने देश के उपग्रहों की सुरक्षा करना व मिसाइलों से होने वाले हमले की निगरानी करना है।
[प्राध्यापक, सैन्य विज्ञान विषय]

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Posted By: Sanjay Pokhriyal

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