[सद्गुरु शरण]। यह मानना पड़ेगा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जादू देशवासियों के सिर पर चढ़कर बोल रहा है। कोरोना के खिलाफ जंग में मोर्चा ले रहे कर्मयोगियों के लिए तालियां-थालियां बजवाने के बाद उन्होंने जब लॉकडाउन की घोषणा की तो सपने में भी उनकी बात न मानने वाले उत्तर प्रदेश के विपक्षी नेता अच्छे बच्चों की तरह ना-नुकुर किए बिना चुपचाप घरों में दुबक गए। बोर होने पर एकाध ट्वीट कर मन बहला लेते हैं, पर क्या मजाल कि लॉकडाउन के प्रति अनुशासन में जरा भी चूक आ जाए। जान है तो जहान है।

सियासत, समर्थक और ख्वाहिशें सिर्फ उसी हालत में महत्व रखती हैं, जब हम खुद सलामत रहें। तो फिर इतनी आसान सी बात अपने योगीजी को समझ में क्यों नहीं आती? लॉकडाउन की तो जैसे उन्हें परवाह ही नहीं। कभी किसी आश्रयस्थल पर खाने की गुणवत्ता परखने पहुंच जाते हैं तो कभी एसजीपीजीआइ में स्थापित किए जा रहे कोविड हॉस्पिटल की प्रगति देखने। खुद भी दौड़ रहे हैं और अफसरों को भी दौड़ा रहे हैं। योगीजी को अपने विपक्षी नेताओं से कुछ सीखना चाहिए। हार्डवर्क उतना जरूरी नहीं, जितना विपक्षी नेताओं जैसा स्मार्टवर्क।

दिनभर लॉकडाउन का सख्ती से पालन करके मोदीजी की अपील का सम्मान करिए, शाम को किसी चेले से एक-दो बढ़िया ट्वीट डलवा दीजिए। बस, हो गई राजनीति। अभी कौन सा चुनाव होने जा रहा है। जब चार-छह महीने बचेंगे, तब देखा जाएगा। इस समय कोई कह भी नहीं सकेगा कि जब प्रदेशवासी संकट का सामना कर रहे हैं तो आप घर में क्यों कैद हैं? सीधी सी बात है कि मोदीजी ने घर से बाहर निकलने को सख्ती से मना किया है और एक जिम्मेदार राजनेता की तरह प्रधानमंत्री की बात मानना हमारा फर्ज है।

डॉक्टर, चिकित्साकर्मी, पुलिसकर्मी और मीडियाकर्मी घर से बाहर काम कर रहे हैं तो उनकी कोई मजबूरी होगी। नेताओं को हर महीने पगार थोड़े ही चाहिए। उन्हें जब सत्ता मिलती है तो वे सारे लिहाज त्यागकर देश-विदेश की बैंकों के लॉकर भर लेते हैं, ताकि बाद में सत्ता रहे या न रहे, उनके राजसी ठाट-बाट पर आंच न आए। योगीजी संत ठहरे। राजनीति में रहकर भी राजनीति नहीं सीख पाए, इसलिए कोरोना की दहशत में भी चैन से नहीं बैठते। वैसे भी वह मुख्यमंत्री हैं। उनकी जिम्मेदारी है कि सब कुछ मैनेज करें। विपक्ष का काम सरकार की आलोचना करना है। योगीजी दिन-रात कितना भी परिश्रम कर लें, विपक्ष अपना धर्म बखूबी निभा रहा है। यूपी की राजनीति कोरोना संकट की छाया में भी अपनी चाल बदलने को तैयार नहीं। योगीजी खूब लॉकडाउन तोड़ें, विपक्ष अपनी परंपराएं नहीं तोड़ेगा।

चाचा की घर वापसी के संकेत: अखिलेश यादव का अपने चाचा शिवपाल यादव से मनमुटाव कोई छिपी बात नहीं। सपा के कार्यक्रमों में मंच पर भी दोनों की  धक्कामुक्की हो चुकी है। इसके चलते बाद में चाचा ने अपनी निजी प्रगतिशील समाजवादी पार्टी बना ली थी। बहरहाल अब संकेत मिल रहे हैं कि वक्त की ठोकरें खाकर चाचा-भतीजे को राजनीति की समझ आ गई है और दोनों को नेताजी यानी मुलायम सिंह की नसीहतें सही लगने लगी हैं। नेताजी शुरू से दोनों को समझाते थे कि भाजपा और बसपा के जाल में मत फंसो, पर तब सत्ता के गुरूर में उन्हें यह बात समझ में नहीं आ रही थी। सत्ता गई, डिंपल कन्नौज में चुनाव हारीं, चाचा को भाजपा ने इस्तेमाल करके हाशिये पर डाला और जांच एजेंसियां पीछा करने लगीं तो सबकी अक्ल ठिकाने आ गई। संकेत तो होली पर सैफई में ही मिल गए थे, जब भतीजे ने झुककर चाचा के चरण छुए, पर अब बात साफ दिख रही है।

समाजवादी पार्टी ने शिवपाल सिंह की सदस्यता समाप्त कराने संबंधी याचिका पर बल न देने का फैसला कर लिया है। जाहिर है, चाचा पार्टी में वापस आ रहे हैं। शिवपाल के वापस आने से अखिलेश को बेशक सहारा मिलेगा, पर इससे सपा को धरातल पर कितनी मजबूती मिलेगी, यह वक्त ही बताएगा। भाजपा को यादव परिवार की इस नई एकता से शायद ही कोई परेशानी हो। उसे चाचा-भतीजे की दोस्ती या दुश्मनी से कोई फर्क नहीं पड़ता। उसका लक्ष्य सिर्फ यह है कि 2022 तक बुआ-भतीजे एक न होने पाएं। फिलहाल इसके आसार दूर-दूर तक नहीं दिखते।

अपने घर में भी है रोटी : कोरोना की विपदा ने लोगों को तमाम आशंकाओं, चिंताओं और परेशानियों से मुकाबिल कर दिया, पर इससे गुजरते हुए लोगों को कई सबक भी मिले हैं। मसलन घर-गांव छोड़कर दिल्ली, मुंबई, सूरत, पंजाब और हरियाणा में मजदूरी करने वाले पूर्वांचलियों को सबक मिला कि परिवार सबकी जिंदगी का पहला और अंतिम सच है। पगार के लिए ही सही, जिनकी खेती और फैक्ट्रियों के लिए दिन-रात पसीना बहाया, मुसीबत आते ही उन्होंने साथ छोड़ दिया। जिनकी सरकार बनवाने में वोट का योगदान दिया, उन्होंने रात के अंधेरे में बसें लगवाकर गाजियाबाद बॉर्डर पर छुड़वा दिया। तब लोगों को गांव और परिवार याद आए। ठुकराए जाने से दिल इस कदर आहत हुए कि साधन की परवाह किए बिना लोगों ने हाईवे पकड़ लिए और सैकड़ों किलोमीटर के सफर पर पैदल ही चल दिए।

[स्थानीय संपादक, उत्तर प्रदेश]

Posted By: Sanjay Pokhriyal

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